रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचपलनिर्णयः २१६ रसमङ्गल नामक ग्रन्थ में तो—श्वेत, रक्त, पीत, श्याम, कृष्ण, कर्बुर (चित्राङ्ग), चपल होता है, किन्तु एक वर्णवाला पूर्व पूर्व श्रेष्ठ होता है ऐसा वर्णन मिलता है। पाश्चात्य विद्वान् लोग सेलिनियम का ठीक स्वरूप निम्न प्रकार से वर्णन किये हैं। सेलिनियम—३ प्रकार का होता है। पहला पुष्पाकृति होता है। इसमें ३ भेद हैं— पहला काँच की तरह दीप्तिमान्, समुदाय रूप, अपेक्षाकृत भारयुक्त ४२८ होता है, वर्ण काला होता है, परन्तु चूर्ण करने पर रक्त हो जाता है। द्रव होने पर जब शीत करते हैं तो ताप यन्त्र के ५० अंश पर मृदु हो जाता है। यदि अतिरिक्त द्रुत को अधिक गरम करते हैं तब २२० तापांश पर गल जाता है और इसमें पिच्छिलता रहती है। यह ६० और ८० अंश पर शीघ्र धातु स्वरूप हो जाता है। और भी पुस्तकों में ऐसा ही पाया जाता है। रसरत्नसमुच्चय में अभ्रक, वैक्रान्त, माक्षिक, विमल, शिलाजीत, सस्यक, चपल, रसक, इन आठों का नाम महारस में दिया है। इन सब बातों से स्पष्ट है कि इसका पाठ किसी के मत में महारस में है और किसी के मत से साधारण रस में है। यह सब वर्णन रस ग्रन्थों से ज्यों का त्यों किया गया है, किन्तु मुझे यहाँ महारस या साधारण रस इसमें न पड़कर चपल का निर्णय करना है। इसका लक्षण आयुर्वेद में निम्न प्रकार का बताया गया है। स्वर्ण की तरह गौर, चाँदी की तरह श्वेत, लाख की तरह शीघ्र गलनेवाला, कृष्ण, लाल, षट्कोण, चिकना, भारयुक्त, स्फटिकमणि की तरह चपल होता है। इस लक्षण में आयुर्वेदज्ञ वैद्यों का एक ही मत है तो इन लक्षणों का समा- वेश “बिस्मथ” में कुछ भी नहीं पाया जाता है। किन्तु सेलिनियम Selenium में इसका स्वरूप मिलता है। इसलिए चपल नामक द्रव्य जो आयुर्वेद में पाया जाता है। वह निश्चय ही सेलिनियम है। सेलिनियम का लक्षण पाश्चात्य विद्वानों ने इस प्रकार किया है। तीक्ष्ण नामक लोह की तरह धूम्रवर्ण, शलाका की तरह या गन्दे कपड़े की तरह चकमदार, तोड़ने पर ऊपर का भाग पुष्प के आकार का होता है। इनमें समानता—गौर चपल में तीक्ष्ण लोह की तरह धूम्रवर्ण गुण पाया जाता है। धूम्रवर्ण की उत्पत्ति श्वेत कृष्णवर्ण के संयोग से होती है और गौर श्वेत नहीं होता है।