भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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२२८ रसतरङ्गिणी चपल स्फटिक मणि की तरह होता है। इसी बात का वर्णन शलाकाकार या गन्दे कपड़े की तरह इत्यादि है। यह सेलिनियम—एक गाढ़े रक्तवर्ण का भी होता है जो अरुण चपल के तुल्य है, यह पुष्प चूर्ण की तरह भी होता है १७० या १८० अंश ताप पर द्रव या तरल हो जाता है। गलने पर रक्ततेज में नीलरंग मिश्रित होता है जो वायु में हाइड्रोजन (ओषजन) के रूप में मिल जाता है। इसमें चपल की तरह द्रुति शीलन भी गुण साफ ही है। सेलिनियम का २१७ ताप अंश पर द्रव होना और ६६० ताप अंश पर आवर्त होना यह स्थिर गुण है। यह जलरहित तीक्ष्ण गन्धक द्राव में घुल जाता है और जलयुक्त अलकोहल में नहीं घुलता है। चपल, वङ्ग (रांगा) की तरह द्रुतिशील . है, शीघ्र द्रव होने से ही इसका नाम चपल रखा गया है। १—(क) मेदिनी ग्रंथ में और रसरत्नसमुच्चय में भी चपल को काचाकृति बताया है तथा 'वर्णेन कृष्णः' यह भी बताया है। इससे स्पष्ट है कि कृष्ण चपल, प्रथम भेद सेलिनियम ही है। (ख) घनद्रव स्वरूप रक्तवर्ण का होता है, जल और गन्धक इत्यादि के मिश्रण से हाइड्रोजन द्वारा इसका द्रवभाग प्राप्त होता है। (ग) इसके ही द्वारा अधः पतित रक्तवर्ण का चूर्ण रूप में प्राप्त होता है। २—इसके दो भेद हैं—प्रधान जो रक्तवर्ण है वह स्थिर है, २०० तापांश पर तरल होता है और धातुरूप में परिवर्तित हो जाता है। पुष्पाकार सेलिनियम के द्रुति होने के लिए तापांश १३० या १८० की आवश्यकता होती है। ३—धातुरूप में प्राप्त होता है, २०० तापांश के ऊपर २२० तापांश तक यह उष्ण होता है। श्वेत पिंडाकार होता है। इसका वर्ण काला चिकना होते हुए लाल होता है। रक्त चपल द्वितीय श्रेणी में और श्वेत चपल ३ श्रेणी में आता है और उसका साम्य है। चपल षट्कोण है सेलिनियम भी षट्कोण होता है। इसमें १३० से अधिक ताप पर टेलुरिङ्गम पदार्थ पुष्पाकृति का षट्कोण प्राप्त होता है। और जो घनद्रवरूप सेलिनियम प्राप्त होता है वह लाख की तरह शीघ्र द्रावी चपल है, लक्षण से साम्यता स्पष्ट मिलती है।