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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

२२८ रसतरङ्गिणी चपल स्फटिक मणि की तरह होता है। इसी बात का वर्णन शलाकाकार या गन्दे कपड़े की तरह इत्यादि है। यह सेलिनियम—एक गाढ़े रक्तवर्ण का भी होता है जो अरुण चपल के तुल्य है, यह पुष्प चूर्ण की तरह भी होता है १७० या १८० अंश ताप पर द्रव या तरल हो जाता है। गलने पर रक्ततेज में नीलरंग मिश्रित होता है जो वायु में हाइड्रोजन (ओषजन) के रूप में मिल जाता है। इसमें चपल की तरह द्रुति शीलन भी गुण साफ ही है। सेलिनियम का २१७ ताप अंश पर द्रव होना और ६६० ताप अंश पर आवर्त होना यह स्थिर गुण है। यह जलरहित तीक्ष्ण गन्धक द्राव में घुल जाता है और जलयुक्त अलकोहल में नहीं घुलता है। चपल, वङ्ग (रांगा) की तरह द्रुतिशील . है, शीघ्र द्रव होने से ही इसका नाम चपल रखा गया है। १—(क) मेदिनी ग्रंथ में और रसरत्नसमुच्चय में भी चपल को काचाकृति बताया है तथा 'वर्णेन कृष्णः' यह भी बताया है। इससे स्पष्ट है कि कृष्ण चपल, प्रथम भेद सेलिनियम ही है। (ख) घनद्रव स्वरूप रक्तवर्ण का होता है, जल और गन्धक इत्यादि के मिश्रण से हाइड्रोजन द्वारा इसका द्रवभाग प्राप्त होता है। (ग) इसके ही द्वारा अधः पतित रक्तवर्ण का चूर्ण रूप में प्राप्त होता है। २—इसके दो भेद हैं—प्रधान जो रक्तवर्ण है वह स्थिर है, २०० तापांश पर तरल होता है और धातुरूप में परिवर्तित हो जाता है। पुष्पाकार सेलिनियम के द्रुति होने के लिए तापांश १३० या १८० की आवश्यकता होती है। ३—धातुरूप में प्राप्त होता है, २०० तापांश के ऊपर २२० तापांश तक यह उष्ण होता है। श्वेत पिंडाकार होता है। इसका वर्ण काला चिकना होते हुए लाल होता है। रक्त चपल द्वितीय श्रेणी में और श्वेत चपल ३ श्रेणी में आता है और उसका साम्य है। चपल षट्कोण है सेलिनियम भी षट्कोण होता है। इसमें १३० से अधिक ताप पर टेलुरिङ्गम पदार्थ पुष्पाकृति का षट्कोण प्राप्त होता है। और जो घनद्रवरूप सेलिनियम प्राप्त होता है वह लाख की तरह शीघ्र द्रावी चपल है, लक्षण से साम्यता स्पष्ट मिलती है।

दशमस्तरङ्गः २२१ अत्र प्रयोग होने पर गुणतः साम्य होना आवश्यक है। चपल में प्रधान गुण—अतिवृष्य और शरीर को लौह सदृश करना है, सेलेनियम का प्रयोग निम्नावस्था में किया जाता है— पौरुष ग्रन्थि दाह में, नपुंसकता में, दुर्बलता में, अत्यन्त दाह में, वृद्धावस्था में, मन में श्रम होने पर, धातुक्षयजन्य दुर्बलता में, शयनावस्था में शुक्रस्राव होने पर, पौरुष ग्रन्थि से रसस्राव में, मैथुन के बाद मन में ग्लानि होने पर आन्तरिक मैथुन की इच्छा होने पर भी लिङ्ग की शैथिल्यावस्था में, अति स्त्री- प्रसङ्ग से मन में दुःख होने पर, शुक्र का पतलापन और विगन्ध होने पर, शिरः- शूल में, लिङ्ग की दुर्बलता में, मैथुन इच्छा मात्र से ही शुक्रस्राव होने पर, पेशाब के पहले या बाद में शुक्रस्राव होने पर, रतिक्रिया में असामर्थ्य पर ध्वज- भङ्ग होने पर, इन लक्षणों के होने पर जो औषधि अतिवृष्य और देहलौहसम करनेवाला न होगा तो कार्य क्या करेगा और चपल में यही प्रधान गुण है। अतः सेलेनियम ही चपल है—ऐसा मेरा निर्णय है। अथ अभ्रकविज्ञानीयो दशमस्तरङ्गः अभ्रकस्य नामानि अभ्रकं गगनं भृङ्गमभ्रं खं व्योमनामकम् । वज्रं घनञ्च गिरिजं बहुपत्रमनन्तकम् ॥ १ ॥ आकाशमम्बरं शुभ्रं त्वमलं गरजध्वजम् । मेघाख्यमन्तरिक्षञ्च तदेव परिकीर्तितम् ॥ २ ॥ अभ्रकनामानि—अभ्रकमित्यादिना ॥ १–२ ॥ भा.टी.—अभ्रक, गगन, भृंग, अभ्र, ख, व्योम, वज्र, घन, गिरिज, बहु- पत्र, अनन्तक, आकाश, अम्बर, शुभ्र, अमल, गरजध्वज, मेघ, अन्तरिक्ष, ये सब अभ्रक के नाम कहे जाते हैं ॥ १–२ ॥ अभ्रकस्य चातुर्विध्यम् अभ्रं सितारुणश्यामपीतवर्णविभेदतः । चतुर्विधं समाख्यातं कृष्णं तत्र गदापहम् ॥ ३ ॥ अभ्रभेदाः—"कृष्णं तत्र गदापहम्" इत्यनेन कृष्णस्यैव रोगप्रयोगयोग्यता सूचिता—दाक्षिणात्यास्तु श्वेताभ्रमपि पित्तज्वरादिषु योजयन्ति, तन्नु स्वल्पगु- णत्वात्प्राचीनाचार्यैः प्रायश उपेक्षितमासीदिति ज्ञेयम् ॥ ३ ॥

२२२ रसतरङ्गिणी भा.टो.—श्वेताभ्र, रक्ताभ्र, कृष्णाभ्र, पीताभ्र, भेद से चार प्रकार का होता है। इन चारों में से कृष्णाभ्रक रोगनाशक होता है ॥ ३ ॥ वक्तव्य—आजकल यद्यपि श्वेताभ्रक का भी बहुत से वैद्य प्रयोग करने लगे हैं, परन्तु यह कृष्णाभ्रक की अपेक्षा बहुत अल्पगुण होने से प्राचीन काल में प्रसिद्ध नहीं था। अतएव इसके गुणादि का वर्णन शोधन का वर्णन पूर्ण रूप से नहीं मिलता है। कृष्णाभ्रकस्य भेदाः पिनाकनागमण्डूकवज्राह्वयविभेदतः। चतुर्विधन्तु कृष्णाभ्रं मतं रसविशारदैः ॥४॥ भा.टी.—पिनाक, नाग, मण्डूक तथा वज्र भेद से कृष्णाभ्रक के चार भेद होते हैं ॥ ४ ॥ अग्नौ सन्तापितं यत्तु दलानि परिमुञ्चति। रसतन्त्ररहस्यज्ञैस्तत् पिनाकं प्रकीर्तितम् ॥ ५ ॥ भा.टी.—जो अभ्रक अग्नि में तपाने से सूक्ष्म दलों (पत्र) को छोड़ने लगता है उसे रसतन्त्रकार पिनाक नामक कृष्णाभ्रक कहते हैं ॥ ५ ॥ तस्य दोषाः पिनाकाभ्रं मलं रुद्धवा कुरुते मरणं ध्रुवम्। कुष्ठादिकान्महारोगान् जनयत्यपि निश्चितम् ॥६॥ भा.टी.—पिनाक नामक कृष्णाभ्रक सेवन करने पर तीव्र मलबन्ध करके मृत्यु का कारण होता है। इसके अतिरिक्त कुष्ठ, भगन्दर, प्रमेह, अर्श आदि महारोगों को भी उत्पन्न करता है ॥ ६ ॥ नागाभ्रकस्य लक्षणम् पावकोत्तापितं यत्तु फूत्कारं परिमुञ्चति। क्रुद्धाहिश्वासवच्छीघ्रं नागाभ्रं तदिहोच्यते ॥७॥ भा.टी.—जो अभ्रक अग्नि में तपाने पर सहसा कुपित सर्प की भांति फूत्कार शब्द करने लगता है उसे नाग अभ्रक कहते हैं ॥ ७ ॥ तस्य दोषाः नागाभ्रं सेवितं कुर्यान्महाघोरं भगन्दरम्। मण्डलं वा महाकुष्ठं तद्द्वयं वा न संशयः ॥८॥

दशमस्तरङ्गः २२३ भा.टी.—नागाभ्रक का सेवन करने से भयंकर भगन्दर रोग उत्पन्न होता है और मण्डल कुष्ठ या महाकुष्ठ ( गलितकुष्ठ ) अथवा दोनों ही प्रकार के कुष्ठ उत्पन्न होते हैं ॥ ८ ॥ मण्डूकाभ्रस्य लक्षणम् अग्नौ सन्तापितं यत्तु भेकवत्कुरुते रवम् । उत्प्लुत्योत्प्लुत्य च पतेन्मण्डूकं तदिहोच्यते ॥६॥ भा.टी.—जो अभ्रक अग्नि में तपाने पर मेढक के समान शब्द करता है और चिटक चिटक कर बिखरने लगता है उसे मण्डूकाभ्रक कहते हैं ॥ ६ ॥ तस्य दोषाः मण्डूकसंज्ञकं त्वभ्रं सततं परिशीलितम् । अश्मरीं जनयत्याशु शस्त्रसाध्यमसंशयम् ॥१०॥ कृष्णाभ्रकस्यैव चत्वारो भेदाः पिनाकादयः । तेषां लक्षणानि दोषाश्च व्याख्याताः ॥ १० ॥ भा.टी.—मण्डूकाभ्रक का कुछ काल निरन्तर सेवन करने से निश्चित ही शस्त्रसाध्य भयंकर अश्मरी रोग हो जाता है ऐसा लिखा है ॥ १० ॥ वज्राभ्रकस्य लक्षणम् पावकोत्तापितं यत्तु विकृतिं नैव गच्छति । तिष्ठत्यग्नौ भिदुरवत् वज्राभ्रं तत्प्रकीर्तितम् ॥११॥ वज्राभ्रकलक्षणम्—भिदुरवत् वज्रवत् ॥ ११ ॥ भा.टी.—जो अभ्रक अग्नि में तपाने पर किसी प्रकार भी विकृत नहीं होता और वज्र के समान तद्रूप बना रहता है उसे वज्राभ्रक कहते हैं ॥ ११ ॥ तस्य गुणाः सर्वश्रेष्ठं तु वज्राभ्रं महाव्याधिहरं परम् । देहसिद्धिकरञ्चापि जरावैरूप्यनाशनम् ॥१२॥ भा.टी.—वज्राभ्रक सब अभ्रकों में श्रेष्ठ होता है । इसके सेवन से महा रोग नष्ट हो जाते हैं । यह शरीर को सर्वगुणसंपन्न करता है तथा इसके प्रयोग से बुढ़ापे से आने वाली कुरूपता भी नष्ट हो जाती है ॥ १२ ॥ जात्याभ्रकस्य स्वरूपम् नीलाञ्जनोपमं स्निग्धं भारपूर्णं महोज्ज्वलम् । निर्मोच्यपत्रं मृदुलं त्वभ्रं श्रेष्ठमिहोच्यते ॥१३॥

२२४ रसतरङ्गिणी जात्याभ्रस्वरूपं यथा—निर्मोच्यपत्रं सुखेन विभागयोग्यपत्रसञ्चयम् ॥ १३ ॥ भा.टी.—नीले सुरमे के सदृश काला, चमकीला, वजनदार, पृथक् पृथक् होने योग्य पत्रोंवाला और कोमल, अभ्रक श्रेष्ठ समझना चाहिये ॥ १३ ॥ देशभेदेनाभ्रकस्य वैशिष्ट्यम् अभ्रकं हिमशैलोत्थमुत्तमं परिकीर्तितम् । मध्यमं पूर्वशैलोत्थं त्वधमं दक्षिणाद्रिजम् ॥१४॥ भा.टी.—हिमालय पर्वत की खान से प्राप्त होनेवाला अभ्रक उत्तम माना जाता है और पूर्वीय देशों के पर्वतों से प्राप्त मध्यम, दक्षिणी पर्वतों से प्राप्त अधम अर्थात् निषिद्ध होता है ॥ १४ ॥ अभ्रकखननविधिः गजप्रमाणं पुरुषप्रमाणं वा खानयेद्वै खनिमामयज्ञः । ततो गुणाढ्यं खलु भारपूर्णं समाहरेदभ्रकमञ्जनाभम् ॥१५॥ गजप्रमाणमिति-अविनष्टसत्त्वगगनग्रहणाय । तथाहूः-“राजहस्तादधस्ताद् यत् समानीतं घनं खनेः । भवेत्तदुक्तफलदं निःसत्त्वं निष्फलं परम् ॥” इति ॥ १५ ॥ भा.टी.—अभ्रक की खानों में गजप्रमाण नीचा या पुरुषप्रमाण साढ़े तीन हाथ या चार हाथ नीचा खोदकर उसमें से काले अञ्जन के सदृश चमकीला, काला और भारो मान का अभ्रक लेना चाहिये । इसी में अभ्रक के उत्तम गुण होते हैं ॥ १५ ॥ अशोधिताभ्रकस्य दोषाः बाधां विदध्याद्विविधां शरीरे हृत्पार्श्वपीडां तनुते नितान्तम् । शोफं क्षयं पाण्डुगदञ्च कुष्ठं त्वशोधिताभ्रं खलु मारितं यत् ॥१६॥ धान्याभ्रकरणे चैव मारणे सत्त्वपातने । रसतन्त्रविशेषज्ञः शुद्धमभ्रं नियोजयेत् ॥१७॥ अशोधिताभ्रकदोषाः—विविधां नानाप्रकाराम् । हितत्वात् धान्याभ्रकरणे मारणे सत्त्वपातने च शुद्धाभ्रविनियोगः ॥ १६-१७ ॥ भा.टी.—अशोधित अभ्रक या चन्द्रिकायुक्त अभ्रक सेवन करने से शरीर में अनेक प्रकार के रोग और पार्श्वपीडा, शोथ, पाण्डुरोग और कुष्ठ रोग उत्पन्न होते हैं । अतः अभ्रक की भस्म करने अथवा सत्वपातन करने या धान्याभ्रक के बनाने के लिये शुद्ध अभ्रक का ही प्रयोग करना चाहिये ॥ १६-१७ ॥

२५ दशमस्तरङ्गः २२५ अभ्रकशोधनस्य प्रथमः प्रकारः वह्नौ सन्ताप्य गगनं काञ्जिके निक्षिपेद् बुधः । सप्तवारं प्रयत्नेन ततः खल्वे निधापयेत् ॥१८॥ अम्लेन केनचिद्वापि सुदृढं पेषयेत्ततः । एवं दिनैकं संपिष्टं त्वभ्रकं शुद्धिमाप्नुयात् ॥१९॥ भा.टी.—पूर्वोक्त प्रकार से सद्गुणयुक्त वज्राभ्रक लेकर उसको अग्नि में तपा- कर सात बार काञ्जी में बुझावें । इसके अनन्तर खरल में डाल किसी अम्लद्रव से खूब अच्छी तरह से एक दिनतक मर्दन करने से अभ्रक शुद्ध हो जाता है ॥१८-१९॥ वक्तव्य—काञ्जी में बुझाने पर अभ्रक के पत्र अलग-अलग हो जाने पर उनको इकट्ठा करके फिर किसी पतले टीन में रख तपायें तो सुभीता रहता है । इस तरह सात बार बुझाने से पत्रों के बीच में होनेवाली वालुका तथा मिट्टी या पत्थर सब नीचे काञ्जी में रह जाते हैं । द्वितीयः शोधनप्रकारः अभ्रकं वह्निसन्तप्तं सप्तवारं निषेचितम् । गोदुग्धे वा वराक्वाथे शुद्धिमायात्यनुत्तमम् ॥२०॥ भा.टी.—अभ्रक को अग्नि में खूब गरम करके सात बार गोदुग्ध अथवा त्रिफलांकषाय में बुझाने से वह शुद्ध हो जाता है ॥ २० ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः अभ्रकं दहनोत्तप्तं सप्तवारं निषेचितम् । बदरीकथिते पश्चात् पेषितं शुद्धिमाप्नुयात् ॥२१॥ धान्याभ्रकमकृत्वैव घनमेवं विशोधितम् । मारणार्थं प्रयुञ्जीत रसतन्त्रविचक्षणः ॥२२॥ तृतीये शोधनप्रकारे अग्नितप्तं कृत्वा सप्तवारं बदरीक्वाथे निर्वापयेत् । धान्या- भ्रकमकृत्वैवेति तु गुणातिशयदर्शनार्थम् । तथा चोक्तम्—“अथवा बदरीक्वाथे ध्मातमभ्रं विनिक्षिपेत् । मर्दितं पाणिना शुष्कं धान्याभ्रादतिरिच्यते ॥” इति । वस्तुतस्तु धान्याभ्रकरणं पाषाणांशनिरासाय मर्दनयोग्यतासम्पादनाय चेति ॥२१-२२ भा.टी.—अभ्रक को अग्नि में तपाकर सात बार बेर के पत्तों और छाल के कषाय में बुझाकर अन्त में पीस लें तो यह शुद्ध हो जाता है । इस विधि से शोधित अभ्रक को बिना धान्याभ्रक बनाये ही भस्म किया जाय तो कोई हानि नहीं होती है ॥ २१-२२ ॥

२२६ रसतरङ्गिणी वक्तव्य—धान्याभ्रक बनाने से वह सूक्ष्म कणों में विभक्त हो जाता है और उसमें पत्थर बालू आदि का कोई अंश नहीं रहता । अतः धान्याभ्रक कर लेना अधिक गुणदायक होता है । चतुर्थः शोधनप्रकारः अभ्रकं वह्निसन्तप्तं गव्ये पयसि निक्षिपेत् । सप्तवारं प्रयत्नेन लुङ्गाम्लगणेन तु ॥२३॥ पेषयेदथ तन्त्रज्ञस्तण्डुलीयद्रवेण च । एवं दिनत्रयेणैव त्वभ्रं शुद्धिमुपैत्यलम् ॥२४॥ भा.टी.—अभ्रक को अग्नि में तपा-तपा कर गाय के दूध में सात बार बुझा लें । अब इसके कंकड़ बालुका-रहित पात्रों को बिजौरानींबू आदि किसी अम्लद्रव के साथ एक दिन और चौलाई के स्वरस के साथ एक दिन तक अच्छी तरह मर्दन करें । इस तरह तीन दिन में वह शुद्ध हो जाता है ॥ २३–२४ ॥ धान्याभ्रकस्वरूपम् अभ्रं कम्बलमध्यस्थं सधान्यं परिमर्दनात् । धान्येभ्यो निर्गतं यस्मात्तस्माद्धान्याभ्रमुच्यते ॥२५॥ भा.टी.—अभ्रक के मोटे चूर्ण को धानों के साथ कम्बल में बाँधकर मर्दन करने से धानों की रगड़ से चूर्णारूप में होकर अभ्रक कम्बल के छिद्रों से बाहर निकलता है । अतः इसको धान्याभ्रक कहते हैं ॥ २५ ॥ धान्याभ्रकस्य निर्माणप्रकारः पादांशधान्यसंयुक्तं गगनं कम्बलोदरे । निक्षिप्य रोधयेत्सम्यक् मुखं सूत्रेण बुद्धिमान् ॥२६॥ दिनैकं स्थापयेन्नीरे क्लिन्नतां याति तद्यथा । सुक्लिन्नञ्चाथ यत्नेन पाणिभ्यां मर्दयेद् दृढम् ॥२७॥ तस्मिन्नेव जले त्वभ्रं यथा सर्वं परिस्रवेत् । संशोष्य चाथ सलिलं पुटयोगेन मारयेत् ॥२८॥ धान्याभ्रलक्षणं प्रकारश्च व्याख्यातः ॥ २६–२८ ॥ भा.टी.—एक कम्बल में अभ्रक एक भाग और धान चौथाई भाग रखकर इसको अच्छी तरह सूत्र या डोरी से बाँधकर एक दिन तक इस पोटली को पानी में डाल दें जिससे यह कुछ गीला हो जाय । गीला होने पर हाथों से इस पोटली को उसी पानी में रगड़ें जिससे सारा अभ्रक पानी में आ जाय । अब इस पानी

दशमस्तरङ्गः २२७ को सुखाकर अभ्रक को भस्म करने के लिये पुट में पकावें ॥ २६-२८ ॥ अभ्रकमारणे पुटसंख्यानियमः विंशत्यादिः शतान्तस्तु पुटो रोगनिवृत्तये । शतादिस्तु सहस्रान्तः प्रशस्तश्च रसायने ॥ २६ ॥ पुटसंख्यानियमः गुणव्यवस्थाहेतुः। विंशत्यादिरिति-एतेन दशपुटैकपुटितादि- मारणप्रकाराणां जघन्यता सूचिता । तस्मादुपेक्षितप्रायोऽयं मार्ग आचाय्यैः ॥ ६ ॥ भा.टी. - साधारण रोगों के नष्ट करने के लिये अभ्रकभस्म बनानी हो तो उसे बीस से लेकर सौ तक पुट देने चाहिये । किन्तु रसायन के रूप में सेवन करने के लिये इसे सौ से लेकर हजार तक पुट देने चाहिये ॥ २६ ॥ अभ्रकस्य प्रथमो मारणप्रकारः धान्याभ्रकं समादाय कासमर्दभवैर्द्रवैः । दिनैकं पेषयित्वाथ चक्रिकाकारतां नयेत् ॥ ३० ॥ ततो गजपुटं दद्यात् दशवारं विधानतः । रविक्षीरैस्ततो दद्यात्तद्वदेव पुटानि तु ॥ ३१ ॥ एवं तु विंशतिपुटैरेवाभ्रस्य मृतर्भवेत् । सिन्दूरसदृशं भस्म जायते नात्र संशयः ॥३२॥ तत्रायं तावत् प्रथमो गगनमारणप्रकारः - कासमर्दरसैर्दश पुटानि अर्क- दुग्धैश्च ततो दशेति विंशतिपुटानि । स्पष्टमन्यत् ॥ ३०-३२ ॥ भा.टी. - धान्याभ्रक को कसौंजी के स्वरस या क्वाथ में एक दिन तक मर्दन कर उसकी टिकिया बना सुखा करके सम्पुट में बन्द करें और गजपुट में फूँक दें । इस प्रकार दस पुट कसौंजी के स्वरस से दें । इसके अनन्तर उसी विधि से आक के दूध में भी दशपुट दें तो बीस पुटों में अभ्रक की रससिन्दूर के सदृश लाल भस्म बन जाती है ॥३०-३२ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः धान्याभ्रकं समादाय नागिनीदलजैर्द्रवैः । तद्वद्भासारसेनापि मीनाक्ष्याः स्वरसेन च ॥ ३३ ॥ न्यग्रोधपयसा चापि तद्वदेव पुटेद्भिषक् । एवं विंशतिवारेण गगनं पञ्चतां व्रजेत् ॥ ३४ ॥ अपरः प्रकारः-नागिनीदलादीनां चतुर्णां द्रव्याणां रसैः प्रत्येकं पञ्चपुटानि, एवं विंशतिपुटानि । नागिनीदलं ताम्बूलपत्रम् ॥ ३३, ३४ ॥

२३८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—धान्याभ्रक को लेकर उसे पान के पत्तों के रस में मर्दन कर कम से कम पाँच गजपुट दें । इसी तरह वासास्वरस, मछेछों तथा बड़ के दूध की क्रमशः पाँच-पाँच पुट देवें। इस प्रकार भी बीस पुट देने से अभ्रकभस्म हो जाता है ॥ ३३, ३४ ॥ तृतीयो मारणप्रकारः धान्याभ्रकं समादाय तण्डुलीयोद्भवैर्द्रवैः । दिनत्रयं पेषयित्वा ततश्च कृतचक्रिकम् ॥३५॥ पुटेद् गजपुटेनैव दशवारं प्रयत्नतः । ततः पुनर्नवानीरैस्तद्वदेव पुटेद्भिषक् ॥ ३ ॥ वटशुङ्गकषायेण तद्वदेव पुटेत्तथा । एवं त्रिंशत्पुटैरेव गगनस्य मृतिर्भवेत् ॥ ३७ ॥ तण्डुलीयादिमिस्त्रिभिर्द्रव्यैः प्रत्येकं दशधा पुटनात्त्रिंशद्भिः पुटैरपरः प्रकारः ॥ ३५-३७ ॥ भा.टी.—धान्याभ्रक को चौलाई के स्वरस में तीन दिन तक अच्छी तरह मर्दन करके टिकिया बनाकर गजपुट में फूँक दें । इस विधि से दस पुट दें । इसके बाद पुनर्नवास्वरस की दस पुट दें । अन्त में बड़ के कोपलों के स्वरस की दस पुट दें तो तीस पुटों में अभ्रक की भस्म हो जाती है ॥ ३५-३७ ॥ चतुर्थो मारणप्रकारः धान्याभ्रं पञ्चवारं प्रथममिह पुटेन्मुस्तकक्वाथयोगात् रम्भानीरेण तद्वत्तदनु च सलिलैस्तण्डुलीयप्रसूतेः । भृङ्गोत्थेनापि वारां तदनु खलु वरानीरपूरेण पिष्ट्वा दत्त्वा गन्धञ्च तुल्यं सकृदिह पुटितो वारिदो याति मृत्युम्॥३८॥ मुस्तकादिभिः पञ्चभिः प्रत्येकं पञ्चधा पुटनात् पञ्चविंशतिपुटानि । गन्धक- योगादेकमिति षड्विंशतिभिः पुटैश्चतुर्थः ॥ ३८ ॥ भा.टी.—धान्याभ्रक को पहिले मोथे के कषाय की पाँच गजपुट दें, इसके अनन्तर कदलीकन्दस्वरस की पाँच पुट, फिर चौलाईस्वरस की पाँच पुट, फिर भृङ्गराजस्वरस की पाँच पुट देकर, अन्त में त्रिफलाकषाय की पाँच पुट देकर सप्रसं अन्त में अभ्रक के समभाग शुद्ध गन्धक मिला एक पुट देनेसे अभ्रक की भस्म हो जाती है ॥ ३८ ॥ पञ्चमो मारणप्रकारः धान्याभ्रकं समादाय रविक्षीरैर्विमर्द्दयेत् ।

दशमस्तरङ्गः २२६ रविमूलद्रवैर्वापि दिनमेकं निरन्तरम् ॥३६॥ ततः संशोषयेद् घर्मे गगनं कृतचक्रिकम् । रविपत्रैश्च संवेष्ट्य सप्तवारं विधानतः ॥ ४० ॥ पुटेद् गजपुटेनैव रसतन्त्रविशारदः । ततो न्यग्रोधमूलोत्थैः क्वाथैर्दद्यात्पुटत्रयम् ॥ ४१ ॥ तद्वद्रम्भारसेनापि सप्तवारं पुटेद्भिषक् । एवं स्वल्पैः पुटैरेव गगनं मृतिमाप्नुयात् ॥ ४२ ॥ पञ्चमो मारणप्रकारः—सप्तदशपुटयोगात् सुगमः ॥ ३६–४२ ॥ भा.टी.—धान्याभ्रक को एक दिन आक के दूध के साथ या आक की जड़ के रस के साथ अच्छी तरह मर्दन कर टिकिया बनाकर धूप में अच्छी तरह सुखा लें । अब इन टिकियों को आक के पत्तों में लपेटकर सूत्र से बाँधकर गजपुट में फूँक दें, इस विधि से सात गजपुट दें । इसके बाद बड़ की जड़ के स्वरस की तीन पुट और अन्त में कदलीकन्द स्वरस की सात गजपुट दें तो अभ्रक की शीघ्र ही भस्म हो जाती है ॥ ३६–४२ ॥ षष्ठो मारणप्रकारः क्षीरत्रयं काकमाची गोक्षुरः खरमञ्जरी । वटप्ररोहो गोमूत्रं तुलसी कदलीशिफा ॥ ४३ ॥ एभिरभ्रं विमर्द्याथ दशवारं पृथक् पृथक् । पुटेत्पुटविधानज्ञः क्रमेणेत्र भिषग्वरः ॥ ४४ ॥ शतधा पुटनादेवं रक्तोत्पलसमप्रभम् । निश्चन्द्रं जायते भस्म सर्वदोषविर्जितम् ॥ ४५ ॥ क्षीरत्रयं रविशीरं वटक्षीरं स्नुहीक्षीरमिति प्रागुक्तम् । खरमञ्जरी अपामार्गः । कदलीशिफा रम्भामूलम् । एवं दशद्रव्यैर्दशधा पुटनात् शतं पुटानि ॥४३–४५॥ भा.टी.—आक का दूध, बड़ का दूध और थोहर का दूध, मकोय, गोखरू, अपामार्ग, बड़ की कोंपल, गोमूत्र, तुलसी, कदलीकन्द, इन दस औषधियों के साथ पृथक्-पृथक् मर्दन करके टिकिया बना संपुट में बन्द करके दस पुट देने से एक सौ पुटों में अभ्रक की रक्तकमलवर्ण, निश्चन्द्र तथा सर्वदोषरहित भस्म हो जाती है ॥ ४३–४५ ॥ सप्तमोमारणप्रकारः धान्याभ्रकं समादाय वत्स्वंशगुडसंयुतम् ।

२३० रसतर्ङ्गिणी वर्धमानदलद्रावैर्मर्दयित्वा द्वियामकम् ॥ ४६ ॥ वेष्टयेद् वटपत्रैश्च गगनं कृतचक्रिकम् । ततः कार्पाससूत्रेण पत्रप्रान्तेषु रोधयेत् ॥ ४७ ॥ ततो गजपुटं दद्याद्दशवारं विधानतः । निश्चन्द्रिकं भवेद् भस्म गगनस्य न संशयः ॥ ४८ ॥ अष्टमांशगुडक्षेपाद् एरण्डपत्ररसैर्मर्दनाद् दशपुटैरेव मारणमभ्रस्य भवतीति निःसंशयं वचनम् ॥ ४६-४८ ॥ भा.टी.—धान्याभ्रक में उसके आठवाँ भाग गुड़ डालकर इसको एरण्ड- पत्रस्वरस से अच्छी तरहसे ६ घण्टे तक मर्दन करके इसकी मोटी-मोटी टिकियाँ बना लें। अब इन टिकियाओं को बड़ के पत्तों से अच्छी तरह लपेट दें और सम्पुट में बन्दकर गजपुट में फूँक दें। इस विधि से दश ही पुटों में अभ्रक की निश्चन्द्र भस्म हो जाती है ॥ ४६-४८ ॥ अष्टमो मारणप्रकारः धान्याभ्रकं समादाय मूलिकाया द्रवैर्दृढम् । पेषयेद्दिनमेकन्तु द्विदिनं वा भिषग्वरः ॥ ४९ ॥ वेष्टयेद्वटपत्रैश्च गगनं कृतचक्रिकम् । एकविंशतिवाराणि पुटेदेवं प्रयत्नतः ॥ ५० ॥ निश्चन्द्रिकं भवेद्भस्म निर्विकारं गुणोत्तमम् । एवं मृतं तु गगनं वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ ५१ ॥ भा.टी.—धान्याभ्रक को एक या दो दिन तक मूली के रस से घोटकर मोटी टिकिया बनाकर सुखाकर बड़ के पत्तों से लपेटकर गजपुट में फूँक दें। इस प्रकार इक्कीस पुट देने से अभ्रक की उत्तम गुण करनेवाली निश्चंद्र (चमक- रहित ) तथा विकार-रहित भस्म हो जाती है। इसको योगों में बिना सन्देह के प्रयोग कर सकते हैं ॥ ४९-५१ ॥ नवमो मारणप्रकारः वटप्ररोहक्वाथेन धान्याभ्रं परिपेषितम् । एरण्डपत्रैरावेष्ट्य पुटयेत्कृतचक्रिकम् ॥ ५२ ॥ दशवारं पुटित्वैवं पुटेत्क्षुद्राकषायतः । वासया कलिवृक्षस्य क्वाथेन च तथा पुटेत् ॥ ५३ ॥ चत्वारिंशत्पुटैरेवं गगनं मृतिमाप्नुयात् ।

निश्चन्द्रिकं भवेद्भस्म क्षयकासादिनाशनम् ॥ ५४ ॥ नवमः प्रकारो मारकद्रव्यमहिम्ना क्षयकासादिनाशनः । स्पष्टमन्यत् ।५२-५४। भा.टी. - बड़ की कोंपलों के रससे धान्याभ्रक को एक दिन तक मर्दन करके टिकिया बना एरण्डपत्रों से लपेट दें और गजपुट में फूँक दें । इस प्रकार दस गजपुट दें । इसके बाद दस पुट छोटी कटेली के कषाय की, दस पुट अडूसास्वरस और दस पुट बहेड़ाकषाय की देने से अभ्रक की निश्चन्द्र भस्म हो जाती है । यह क्षय, कास आदि में लाभदायक होती है ॥ ५२-५४ ॥ मृताभ्रकस्य लक्षणम् निश्चन्द्रञ्चारुणं स्वच्छं सुसूक्ष्मं स्पर्शकोमलम् । अभ्रं मृतं विजानीयाद्रसतन्त्रविचक्षणः ॥ ५५ ॥ मृताभ्रकलक्षणे निश्चन्द्रत्वं लक्षणम् । अरुणत्वादिविशेषस्तु उत्कर्षाधान- हेतुः । तथा च आरुण्यादिगुणं भस्म उत्कृष्टम् । सचन्द्रन्तु तदप्यमृतमेवेति॥५५॥ भा.टी. - उत्तम प्रकार से बनायी हुई अभ्रकभस्म चन्द्रिकारहित होती है, उसका वर्ण लाल होता है, यह बहुत बारीक और स्पर्श में कोमल होती है । निश्चन्द्र होना इसका मुख्य लक्षण समझना चाहिये। अन्यथा यह सेवन करने पर विष के समान कार्य करती है ॥ ५५ ॥ अभ्रकस्य मारको गणः क्षीरत्रयं काकमाची मुस्ता घृतकुमारिका । वटप्ररोहो गोमूत्रं बिल्वमूलदले वृषः ॥ ५६ ॥ फलत्रिकमजारक्तं कण्टकारी कदम्बकः । अग्निमन्यः शालिपर्णी श्रीपर्णी पाटली गुडः ॥ ५७ ॥ तिलपर्णी पृश्निपर्णी गोक्षुरः खरमञ्जरी । शुक्लसिद्धार्थको लोध्रः बृहती हिलमोचिका ॥ ५८ ॥ धत्तूरः कासमर्दश्च मातुलानी गुडूचिका । मारिषस्तुलसी दूर्वा वाजिगन्धा च तिक्तका ॥ ५९ ॥ मण्डूकपर्णी मदनः पिण्डी तगरमेव च । शङ्खपुष्पी नागवल्ली घोट्टा श्वेतपुनर्नवा ॥ ६० ॥ आखुपर्णी सप्तपर्णः रम्भाकन्दरसस्तथा । भृङ्गराजो देवदारु तालमूली च मालती ॥ ६१ ॥ अगस्त्यपत्रं तालीशं चित्रकं जलकुम्भिका ।

२३२ रसतरङ्गिणी दाडिमस्य दलञ्चैव तण्डुलीयकमेव च ॥ ६२ ॥ एरण्डमूलपत्राणि श्योनाको वस्त्ररञ्जनी । पालङ्कया भद्रमुस्ता च मीनाक्षी कोकिलाक्षकः ॥६३॥ पूर्वाचार्यैः कीर्तितोऽयमभ्रस्य मारको गणः । यथारोगं यथालाभं भेषजैः पुटयेद् घनम् ॥६४॥ अथाभ्रकमारकगणः—बिल्वमूलं बिल्वदलञ्चेत्युभयम् । वृषः वासकः, श्रीपर्णी गम्भारी, मातुलानी भङ्गा, तिक्तका कटुकी, घोट्टा बदरी, वस्त्ररञ्जनी मञ्जिष्ठा । स्पष्टमन्यत् ॥५६-६४॥ भा.टी.—आक का दूध, बड़ का दूध, थोहर का दूध, मकोय, मोथा, कुमारी, बड़ की कोंपल ( अंकुर ), गोमूत्र, बेल की जड़ और पत्तो, अडूसा, त्रिफला, बकरी का रक्त, छोटी कटैली, कदम्ब, अरणि, शालपर्णी, गंभारी, पाढल, गुड़, तिलपर्णी, पृश्निपर्णी, गोखरू, अपामार्ग, सफेद सरसों, लोध, बड़ी कटैली, हुलहुल, धतूरा, कसौंदी, भांग, गिलोय, मरचा, तुलसी, दूब, अस- गन्ध, कुटकी, ब्राह्मी, मैनफल, तगर, शंखपुष्पी, पान, बेर, सफेदपुनर्नवा, मूसा- कानी, सप्तपर्ण, कदलीकन्द, भांगरा, देवदारु, मूसली, चमेली, अगस्त का पत्र, तालीशपत्र, चित्रक, दाड़िमफलछाल, चौलाई, एरण्ड की जड़ तथा पत्तो, अरलु, मंजीठ, नागरमोथा, मछेछी, तालमखाना, इन औषधियों के समुदाय को पूर्वाचार्यों ने अभ्रकमारकगण नाम से कहा है । इनमें से जिस-जिस रोग को जो-जो औषधियाँ नष्ट करती हैं आवश्यकतानुसार उनसे अभ्रक को घोट कर पुट देनी चाहिये । यदि गणोक्त सब औषधियाँ न मिल सकें तो जितनी मिलें उन्हीं से पुट देने चाहिये ॥ ५६–६४ ॥ अभ्रकभस्मनो लोहितीकरणम् गाङ्गेरुकी भद्रमुस्ता वटक्षीरन्तथैव च । वटमूलजलं वापि हरिद्राया द्रवस्तथा ॥ ६५ ॥ समङ्गाकथितञ्चैव घनमेभिः सुपेषयेत् । पुटद्वयं त्रयं वापि वितरेद्भिषजां वरः ॥ ६६ ॥ निश्चन्द्रिकञ्च मृदुलं रक्तात्पलसमप्रभम् । गगनस्य भवेद्भस्म ततः कार्येषु योजयेत् ॥ ६७ ॥ गाङ्गेरुकी नागबला । समङ्गा मञ्जिष्ठा ॥ ६५–६७ ॥ भा.टी.—अभ्रक मारक औषधियों के साथ पुट देने पर यदि अभ्रक की

दशमस्तरङ्गः २३३ भस्म लाल न हो तो उसे गंगेरन, नागरमोथा, बड़दूध और बड़मूल स्वरस, हरिद्रास्वरस और मञ्जिष्ठा या लज्जालु के कषाय में मर्दनकर दो तीन पुट देने से वह निश्चंद्र कोमल, लालकमलवर्ण हो जाती है ॥ ६५-६७ ॥ अभ्रकभस्मनः अमृतीकरणम् मारितं त्वतियत्नेन दशभागिकमभ्रकम् । त्रिफलाक्वथितं चैव नवं षोडशभागिकम् ॥ ६८ ॥ नागभागिकमुस्राज्य दत्वा लोहस्य भाजने । पाचनाज्जायते रम्यममृतीकरणं वरम् ॥ ६६ ॥ उस्राज्यं गोघृतं नागभागिकमष्टभागिकं ग्राह्यम् ॥ ६८, ६६ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह बनी हुई अभ्रकभस्म दस भाग, त्रिफलाकषाय सोलह भाग और गोघृत आठ भाग तीनों को एक लोहे की कड़ाही में एकत्र मिला कर पकाने से अभ्रकभस्म का अमृतीकरण हो जाता है ॥ ६८, ६६ ॥ वक्तव्य — त्रिफलाकषाय और घृत के जलने तक अभ्रकभस्म को पकाना चाहिए। अन्य रसग्रंथों में भी इसी प्रकार लिखा है कि—"तुल्यं घृतं मृताभ्रेण लोहपात्रे विपाचयेत् । घृते जीर्णे ततश्चूर्णं सर्वकार्येषु योजयेत् ॥” अभ्रकभस्म के अमृतीकरण करने से उसके गुणों में वृद्धि होती है। द्वितीयः प्रकारः कन्याम्बुमेघगव्याज्यं कलादिक् तपनांशकम् ! पचेन्मन्दानलेनैतदमृतीकरणं वरम् ॥ ७० ॥ तृतीयः प्रकारः मृताभ्रसंमितं गव्यमाज्यं दत्वाभ्रकं पचेत् । अमृतीकृतमेवन्तु घनं कार्येषु योजयेत् ॥ ७१ ॥ कन्या घृतकुमारी, तस्या जलं षोडशभागिकम् । मेघः अभ्रकं दशभागिकम् । गोघृतं द्वादशभागिकम् । अथवा केवलं गोघृतेन पाकादमृतीकरणम् । तथा चाहुः प्राचीनाः—“तुल्यं घृतं मृताभ्रेण लोहपात्रे विपाचयेत् । घृते जीर्णे ततश्चूर्णं सर्वकार्येषु योजयेद् ॥” इति । तथा चैवं मृताभ्रकस्यामृतीकरणसंस्कार उक्तः । भस्मनस्तु पुनरमृतीकरणेन गुणवृद्धिर्भवति । इति ॥ ७०, ७१ ॥ भा.टी.—कुमारीस्वरस, चौलाई या मोथा, गोघृत को क्रमशः सोलह, दस और बारहवाँ भाग अभ्रक का लेकर एकत्र करके अग्नि से पका लेने पर उत्तम अमृतीकरण होता है । अभ्रकभस्म और गोघृत दोनों को समभाग में लेकर

२३४ रसतरङ्गिणी लोहपात्र में घृत जल जाने तक पकाने से अभ्रक का अमृतीकरण हो जाता है ॥ ७०, ७१ ॥ मृताभ्रकस्य गुणाः अभ्रं स्निग्धं परमशिशिरं स्वादु चायुष्यमग्र्यं केश्यं वर्ण्यं रुचिकरमलं दीपनं चातिबल्यम् । नेत्र्यं मेधां जनयतितरां स्तन्यसंवर्द्धनञ्च क्षेत्त्रे स्थैर्य्यं वितरति परं दीपनं पुष्पकेतोः ॥ ७२ ॥ क्षिप्रं घोरां दलयति महारोगसंघातभीतिं स्वान्ते प्रीतिं जनयति परं नर्महासे च यूनः । देहे शक्तिं वितरतितरां बह्वपत्यप्रदात्री कार्याल्स्यं हरति सुतरामभ्रकं सेव्यमानम् ॥ ७३ ॥ मृताभ्रकगुणाः—परमशिशिरं अतिशीतवीर्य्यम् । अग्र्यं प्रधानम्, तथा च विशेषत आयुष्यं हितकरमित्यर्थः । पुष्पकेतोः कामस्य दीपनमित्यन्वयः । महारो- गाणां ज्वरराजयक्ष्मरक्तपित्तादीनां संघातः समूहस्तज्जां भीतिं परिहरति ॥७२, ७३ भा.टी.—अच्छी प्रकार से बनायी हुई अभ्रकभस्म स्निग्ध ( धातुओं में स्निग्धता उत्पन्न करनेवाली ), अत्यन्त शीतवीर्य, स्वादुरस, आयुवृद्धि के लिए उत्तम है । यह बालों का पोषक होने से केश्य, त्वचा का पोषक होने से वर्ण्य, रुचिकर, पाचक रस अधिक उत्पन्न करने से दीपन, सर्व धातुओं का पोषक होने से बलवर्धक, नेत्रज्योतिवर्धक, बुद्धिवर्धक, दुग्ध-वाहिनियों का पोषक होने से स्तनों में दूध को बढ़ाती है । शरीर में स्थिरता उत्पन्न करती है और काम- शक्ति का उत्पादक है । शरीर में होनेवाले महारोग ज्वर, यक्ष्मा रक्तपित्त आदि के भय को नष्ट करती है, मन में प्रसन्नता लाती है और सन्तानोत्पादन की शक्ति उत्पन्न करती है । आलस्य को दूर करके कार्यतत्परता को बढ़ाती है ॥ ७२–७३ ॥ वक्तव्य—इसके अतिरिक्त नवीन खोज यह बताती है कि अभ्रक वनस्प- तियों द्वारा हमारे शरीर में विशेषतः वातिकसूत्रों में प्रवेश करता है और शरीर के अवयवों में निम्नलिखित मात्रा में पाया जाता है । मांसपेशियों में ४१ प्रति- शत, यकृत् में २७ प्र. श., प्लीहा में भी २७ प्र. श., लसीका में ५ प्रतिशत पाया जाता है । सबसे अधिक मात्रा में यह फुफ्फुसों में पाया जाता है । अतः फुफ्फुस के रोग, राजयक्ष्मा, कास, श्वास रोगों में अभ्रक बहुत ही उत्तम औषधि है । इस तरह हृदय तथा वातिक सूत्रों के लिये भी यह परमोपयोगी औषधि है ।

दशमस्तरङ्गः २३५ अथ अभ्रकस्य आमयिकः प्रयोगः रससिन्दूरसंयुक्तं मृताभ्रं नाशयेज्ज्वरान् । सचौद्रं सकणञ्चापि जीर्णज्वरविनाशनम् ॥ ७४ ॥ सचौद्रं सवरं व्योम दृष्टिशक्तिकरं परम् । सव्योषं सघृतञ्चैतद् ग्रहणीं नाशयेत् क्षणात् ॥ ७५ ॥ हरीतकीगुडोपेतं शर्करैलासमन्वितम् । मृताभ्रं सेव्यमानन्तु रक्तपित्तहरं परम् ॥ ७६ ॥ सव्योषं सवरञ्चैव चातुर्जातकसंयुतम् । सचौद्रं क्षपयेदंशः पाण्डुक्षयहलीमकान् ॥ ७७ ॥ मृताभ्रं रजनायुक्तं कणया मधुनापि च । मासमेकं लिहेत्प्राज्ञो मेहरोगाद्विमुच्यते ॥ ७८ ॥ मृतकाञ्चनसंयुक्तं मृताभ्रं माससेवितम् । धातुवृद्धिकरं पुंसां विशेषात्क्षयनाशनम् ॥ ७९ ॥ गुडूचीसत्त्वसंयुक्तं मेहवर्गप्रणाशनम् । तारस्वर्णयुतं त्वभ्रं शुक्रसन्तानकारकम् ॥ ८० ॥ भूधात्रिकागोक्षुरचन्द्रवालारुतान्वितं गव्यघृतेन लीढम् । संसेव्यमानं गगनं तु तूर्णं विनाशयेद् दारुणमूत्रकृच्छ्रम् ॥ ८१ ॥ क्षाराष्टकयुतं त्वभ्रं मूत्राघातं विनाशयेत् । अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रञ्च विशेषादग्निदीपनम् ॥ ८२ ॥ मूर्वाक्वाथसमायुक्तं मृताभ्रं व्रणनाशनम् । पयस्यागव्यदुग्धाभ्यां परमं बलवर्द्धनम् ॥ ८३ ॥ भल्लातकान्वितं व्योम त्वर्शांस क्षपयेद् ध्रुवम् । लवङ्गक्षौद्रसंयुक्तं धातुवृद्धिकरं परम् ॥ ८४ ॥ विजयास्वरसोपेतं जात फलसमन्वितम् । मृताभ्रं जुषतां पुंसां शुक्रस्तम्भः प्रजायते ॥ ८५ ॥ विश्वभेषजपौष्करान्वितं विप्रयष्टितुरगासमन्वितम् । सेवितं समधु मारिताभ्रकं नाशयेज्झटिति मारुतामयम् ॥ ८६ ॥ अभ्रं कज्जलिकोपेतमर्जुनक्वाथभावितम् । कृमजं श्लैष्मिकं वापि विनिहन्ति हृदामयम् ॥ ८७ ॥ ससितं सचतुर्जातं त्वभ्रं पित्तामयापहम् ।

२३६ रसतरङ्गिणी अथवा ससितं गव्यदुग्धेन परिशीलितम् ॥ ८८ ॥ पिप्पलीकट्फलक्षौद्रैर्मृष्टाभ्रं माससेवितम् । अतिमात्रं निहन्त्याशु सर्वानेव कफामयान् ॥ ८६ ॥ अथास्य रोगयोग्यः प्रयोगः—सवरं त्रिफलायुक्तम् । चन्द्रबाला स्थूलैला । क्षाराष्टकं “सुधापलाशशिखरीचिञ्चार्कतिलनालजाः । स्वर्जिकायावशूकश्च क्षाराष्टकमुदाहृतम् ॥” इत्युक्तम् । पयस्या क्षीरकाकोली क्षीरविदारी वा । विप्र- यष्टी भारंगी, तुरगी अश्वगन्धा । कज्जलिका समपारदगन्धा अतिमात्रं अत्यर्थं कफामयान् हन्ति ॥ ७४–८६ ॥ भा.टी.—साधारणतः ज्वरों में अभ्रकभस्म को रससिन्दूर के साथ प्रयोग करना चाहिये । जीर्णज्वर के लिये इसे पिप्पलीचूर्ण में मिला शहद के साथ चाटना चाहिये । नेत्रों की ज्योति बढ़ाने के लिये अभ्रक को त्रिफलाचूर्ण में मिला शहद के साथ चाटना चाहिये । पुरातन और वातप्रकोपाधिक ग्रहणी रोग में इसे त्रिकटुचूर्ण और घृत मिलाकर सेवन करना चाहिये । रक्तपित्त रोग के लिये इसको हरीतकी, गुड़, खांड और इलायचीबीजचूर्ण के साथ अथवा वासास्वरस के साथ सेवन कराना चाहिये । अर्श, पाण्डु, क्षय तथा हलीमक रोगों में इसको त्रिकटुचूर्ण, त्रिफला चूर्ण और चातुर्जातकचूर्ण में मिला शहद से सेवन कराना चाहिये । अभ्रकभस्म, हरिद्राचूर्ण और पिप्पलीचूर्ण को शहद के साथ एक मास तक सेवन करने से प्रमेहरोग नष्ट हो जाता है । स्वर्णभस्म और अभ्रकभस्म को मिला उचित सहपान-अनुपान के साथ एक मास तक सेवन करने से धातुओं की वृद्धि होती है और क्षयरोग नष्ट हो जाता है । गडूची- सत्त्व के साथ प्रयोग करनेपर सब प्रकार के प्रमेह नष्ट हो जाते हैं । रजत और स्वर्णभस्म के साथ अभ्रक का सेवन करने से शुक्रवृद्धि होकर सन्तानोत्पादन- शक्ति उत्पन्न होती है । भयंकर मूत्रकृच्छ्र रोग में अभ्रकभस्म को, भुंई-आंवला, गोखरू, बड़ी इलायचीबीज और खांड के साथ घृत में मिलाकर चटाना चाहिये । आठों क्षारों के साथ मिलाकर अभ्रकभस्म का सेवन करने से मूत्रा- घात (पेशाब रुकना) नष्ट होता है । और अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र रोग भी नष्ट होते हैं तथा पाचकअग्नि की वृद्धि होती है। व्रणदोषों को दूर करने के लिये इसे मूर्वाकषाय के साथ प्रयोग करना चाहिये । शरीर में बलवृद्धि के लिये इसको क्षीरकाकोलीचूर्ण के साथ गोदुग्धानुपान सेवन करना चाहिये । शुद्धभल्लातक- चूर्ण या भल्लातक योगों के साथ अभ्रकभस्म प्रयोग करने से बवासीर में लाभ २

दशमस्तरङ्गः २३७ होता है। लौंग के चूर्ण में अभ्रकभस्म मिला शहद के साथ चटाने से धातुवृद्धि करती है। अभ्रकभस्म को जायफलचूर्ण के साथ मिला भांग के स्वरस से लेने पर शुक्रस्तम्भन शक्ति बढ़ती है। सुण्ठी, पुष्करमूल, भारंगी तथा वंशलोचन- चूर्ण में अभ्रकभस्म मिला शहद के साथ सेवन करने से शीघ्र ही वातरोग शान्त हो जाते हैं। अभ्रकभस्म और पारदगन्धक की कज्जली को समभाग में लेकर अर्जुन के क्वाथ में सात भावना देकर प्रयोग किया जाय तो कफप्रकोपजन्य अथवा कृमिजन्य हृदय रोग दूर होता है। पित्तरोगों की शान्ति के लिये अभ्रकभस्म को चतुर्जातकचूर्ण और खांड मिलकर सेवन करना चाहिए। अथवा केवल खांड में मिला गोदुग्ध अनुपान से सेवन करना चाहिये। सब प्रकार के कफरोगों के लिये अभ्रकभस्म को पिप्पली तथा कायफलचूर्ण में मिला शहद के साथ एक मास तक सेवन करना चाहिये ॥ ७४-८६ ॥ सत्त्वानां वैशिष्ट्यम् योगेषूपरसादीनां योगे सत्त्वयोजनम्। गुणोत्तरं भवेद्यस्मात्तस्मात्सत्त्वं विशिष्यते ॥ ९० ॥ भा.टी.—उपरस आदि के योगों के प्रयोग करने में उनका सत्त्व प्रयोग करना अधिक गुणशाली होता है। अतः अभ्रक आदि की भस्म की अपेक्षा उनका सत्त्व प्रयोग किया जाय तो विशेष गुणकारक होता है ॥ ९० ॥ अभ्रकसत्त्वपातनस्य प्रथमः प्रकारः पादांशसौभाग्यरज.समेतं पिष्टं मुसल्याः स्वरसेन सार्द्धम् । कोष्ठ्यां निधायाभ्रकमत्र गाढं त्ध्मामापितं मुञ्चति सत्त्वमच्छम्॥६१. सौभाग्यरजः टङ्कणचूर्णम् । स्पष्टमन्यत् ॥ ६१ ॥ भा.टी.—अभ्रक में चतुर्थांश सुहागा मिला इसको सफेद मूसली के स्वरस के साथ पीसकर मूषा में रखकर तपाने से अभ्रक का साफ सत्त्व निकल आता है ॥ ६१ ॥ वक्तव्य—अभ्रक से प्राप्त होनेवाला सत्त्व एलुमिनियम (Aluminium) कहा जाता है। परन्तु आयुर्वेदीय रसशास्त्र की विधि से प्राप्त अभ्रक सत्त्व एलुमिनियम से ठीक नहीं मिलता है। क्योंकि आजकल मिलने वाला सत्त्व (एलुमिनियम) श्वेत हल्की धातु है। और इस विधि से निकाला हुआ कांस्य के सदृश होता है। द्वितीयः सत्त्वपातनप्रकारः सम्पेषयेद् घनरजः खलु काञ्जिकस्थं पश्चात्तथैव खलु सूरणकन्दतोयैः ।

१३८ रसतरङ्गिणी रम्भाद्र्कन्दजरसैरपि भावयित्वा तुर्यांशटङ्कणकणालपकर्मानयुक्तम् ॥६२॥ संमेल्य सैरिभमलञ्च विधाय पिण्डान कोष्ठ्यां निधाय च ततः प्रथमेद् दृढाग्नौ । अभ्रं विमुञ्चति ततो निजसत्त्वमाशु प्रायः प्रयोगनिवहेषु नियोजयेद्वै ॥ ६३ ॥ अथान्यः प्रकारः-अभ्रचूर्णं काञ्जिकेन सूरणतोयेन कदलीकन्दलेन च पिष्ट्वा टङ्कणं पिप्पलीं क्षुद्रमत्स्यांश्चैकीकृत्य तच्चतुर्थांशं मेलयेत् । सैरिभमलं महिषी- मलम् ॥ ६२, ६३ ॥ भा.टी.-अभ्रकचूर्ण को काञ्जी, जिमीकन्दस्वरस, कदलीकन्दस्वरस से पृथक् मर्दन करके अन्त में इसमें चतुर्थांश सुहागा, पिप्पलीचूर्ण और छोटी- छोटी सुखाई हुई मछलियों का चूर्ण, और भैंस का गोबर मिलाकर गोले से बनाकर सुखा लें ।

दशमस्तरङ्गः २३६ अथ चतुर्थः सत्त्वपातनप्रकारः सौभाग्यं देवधूपश्च गुडः सर्जरसस्तथा । ऊर्णा लाक्षा च पिण्याकं क्षुद्रमीनन्तथैव च ॥९८॥ छागीदुग्धेन सम्पेष्य विदध्याद् गोलकान् भिषक् । स्थापयेद् वज्रमूषायां गगनं कृतगोलकम् ॥ ९६ ॥ कोष्ठिकायां निधायाथ तीव्राग्नौ प्रधमेद् घनम् । अनेन विधिना सत्त्वं द्रुतमेव प्रजायते ॥ १०० ॥ देवधूपः गुग्गुलुः, पिण्याकं तिलकल्कः ॥ ९८-१०० ॥ भा.टी.—सुहागा, गुग्गुल, गुड़, राल, ऊन, लाख, तिल की खली और छोटी मछली को छागदुग्ध के साथ अभ्रक को पीसकर छोटे-छोटे गोले बना लें, अब इसको भट्ठी में रखकर तीव्र अग्नि से तपायें तो शीघ्र ही सत्त्व निकल आता है ॥ ९८-१०० ॥ अभ्रकसत्त्वस्य पिण्डीकरणम् मित्रपञ्चकसंयुक्तं खसत्त्वं चूर्णसन्निभम् । मूषायां विनिधायाथ प्रधमेत्कोकलानले ॥ १०१ ॥ इत्थं तीक्ष्णतरं ध्मातमेकतां याति कांस्यवत् । पिण्डीभूतं ततः सत्त्वं शोधनार्थं प्रयोजयेत् ॥ १०२ ॥ मित्रपञ्चकं आज्यं गुंजा सौभाग्यं क्षौद्रं गुग्गुलुश्चेति । आहुश्च—“कणशो यद् भवेत् सत्त्वं मूषायां प्रणिधाय तत् । मित्रपञ्चकयुग्ध्मातमेकी भवति घोषवत् ॥” इति ॥ १०१-१०२ ॥ भा.टी.—उक्त विधि से प्राप्त अभ्रक सत्त्व पूर्वोक्त मित्रपञ्चक के साथ मिला कर मूषा में रख कोयलों की अग्नि में तेज रूप से तपायें तो कांसा धातु की तरह यह सत्त्व एकत्रित हो जाता है, अब इसे शुद्धकर लेना चाहिये ॥१०१-१०२॥ अभ्रकसत्त्वस्य सामान्यशोधनम् त्रिफलासलिले वापि वटमूलकषायतः । अम्लेन काञ्जिकैर्वापि खसत्त्वं शोधयेद्भिषक् ॥ १०३ ॥ त्रिफलासलिलादिषु निर्वापणात् सामान्या शुद्धिरस्य ॥ १०३ ॥ भा.टो.—अभ्रक को गरम करके त्रिफलाकषाय अथवा बड़मूलकषाय में अथवा अम्ल नीबूरस आदि या काञ्जी में सात बार बुझा लेने से वह शुद्ध हो जाता है ॥ १०३ ॥