रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमस्तरङ्गः २३७ होता है। लौंग के चूर्ण में अभ्रकभस्म मिला शहद के साथ चटाने से धातुवृद्धि करती है। अभ्रकभस्म को जायफलचूर्ण के साथ मिला भांग के स्वरस से लेने पर शुक्रस्तम्भन शक्ति बढ़ती है। सुण्ठी, पुष्करमूल, भारंगी तथा वंशलोचन- चूर्ण में अभ्रकभस्म मिला शहद के साथ सेवन करने से शीघ्र ही वातरोग शान्त हो जाते हैं। अभ्रकभस्म और पारदगन्धक की कज्जली को समभाग में लेकर अर्जुन के क्वाथ में सात भावना देकर प्रयोग किया जाय तो कफप्रकोपजन्य अथवा कृमिजन्य हृदय रोग दूर होता है। पित्तरोगों की शान्ति के लिये अभ्रकभस्म को चतुर्जातकचूर्ण और खांड मिलकर सेवन करना चाहिए। अथवा केवल खांड में मिला गोदुग्ध अनुपान से सेवन करना चाहिये। सब प्रकार के कफरोगों के लिये अभ्रकभस्म को पिप्पली तथा कायफलचूर्ण में मिला शहद के साथ एक मास तक सेवन करना चाहिये ॥ ७४-८६ ॥ सत्त्वानां वैशिष्ट्यम् योगेषूपरसादीनां योगे सत्त्वयोजनम्। गुणोत्तरं भवेद्यस्मात्तस्मात्सत्त्वं विशिष्यते ॥ ९० ॥ भा.टी.—उपरस आदि के योगों के प्रयोग करने में उनका सत्त्व प्रयोग करना अधिक गुणशाली होता है। अतः अभ्रक आदि की भस्म की अपेक्षा उनका सत्त्व प्रयोग किया जाय तो विशेष गुणकारक होता है ॥ ९० ॥ अभ्रकसत्त्वपातनस्य प्रथमः प्रकारः पादांशसौभाग्यरज.समेतं पिष्टं मुसल्याः स्वरसेन सार्द्धम् । कोष्ठ्यां निधायाभ्रकमत्र गाढं त्ध्मामापितं मुञ्चति सत्त्वमच्छम्॥६१. सौभाग्यरजः टङ्कणचूर्णम् । स्पष्टमन्यत् ॥ ६१ ॥ भा.टी.—अभ्रक में चतुर्थांश सुहागा मिला इसको सफेद मूसली के स्वरस के साथ पीसकर मूषा में रखकर तपाने से अभ्रक का साफ सत्त्व निकल आता है ॥ ६१ ॥ वक्तव्य—अभ्रक से प्राप्त होनेवाला सत्त्व एलुमिनियम (Aluminium) कहा जाता है। परन्तु आयुर्वेदीय रसशास्त्र की विधि से प्राप्त अभ्रक सत्त्व एलुमिनियम से ठीक नहीं मिलता है। क्योंकि आजकल मिलने वाला सत्त्व (एलुमिनियम) श्वेत हल्की धातु है। और इस विधि से निकाला हुआ कांस्य के सदृश होता है। द्वितीयः सत्त्वपातनप्रकारः सम्पेषयेद् घनरजः खलु काञ्जिकस्थं पश्चात्तथैव खलु सूरणकन्दतोयैः ।