भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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२३६ रसतरङ्गिणी अथवा ससितं गव्यदुग्धेन परिशीलितम् ॥ ८८ ॥ पिप्पलीकट्फलक्षौद्रैर्मृष्टाभ्रं माससेवितम् । अतिमात्रं निहन्त्याशु सर्वानेव कफामयान् ॥ ८६ ॥ अथास्य रोगयोग्यः प्रयोगः—सवरं त्रिफलायुक्तम् । चन्द्रबाला स्थूलैला । क्षाराष्टकं “सुधापलाशशिखरीचिञ्चार्कतिलनालजाः । स्वर्जिकायावशूकश्च क्षाराष्टकमुदाहृतम् ॥” इत्युक्तम् । पयस्या क्षीरकाकोली क्षीरविदारी वा । विप्र- यष्टी भारंगी, तुरगी अश्वगन्धा । कज्जलिका समपारदगन्धा अतिमात्रं अत्यर्थं कफामयान् हन्ति ॥ ७४–८६ ॥ भा.टी.—साधारणतः ज्वरों में अभ्रकभस्म को रससिन्दूर के साथ प्रयोग करना चाहिये । जीर्णज्वर के लिये इसे पिप्पलीचूर्ण में मिला शहद के साथ चाटना चाहिये । नेत्रों की ज्योति बढ़ाने के लिये अभ्रक को त्रिफलाचूर्ण में मिला शहद के साथ चाटना चाहिये । पुरातन और वातप्रकोपाधिक ग्रहणी रोग में इसे त्रिकटुचूर्ण और घृत मिलाकर सेवन करना चाहिये । रक्तपित्त रोग के लिये इसको हरीतकी, गुड़, खांड और इलायचीबीजचूर्ण के साथ अथवा वासास्वरस के साथ सेवन कराना चाहिये । अर्श, पाण्डु, क्षय तथा हलीमक रोगों में इसको त्रिकटुचूर्ण, त्रिफला चूर्ण और चातुर्जातकचूर्ण में मिला शहद से सेवन कराना चाहिये । अभ्रकभस्म, हरिद्राचूर्ण और पिप्पलीचूर्ण को शहद के साथ एक मास तक सेवन करने से प्रमेहरोग नष्ट हो जाता है । स्वर्णभस्म और अभ्रकभस्म को मिला उचित सहपान-अनुपान के साथ एक मास तक सेवन करने से धातुओं की वृद्धि होती है और क्षयरोग नष्ट हो जाता है । गडूची- सत्त्व के साथ प्रयोग करनेपर सब प्रकार के प्रमेह नष्ट हो जाते हैं । रजत और स्वर्णभस्म के साथ अभ्रक का सेवन करने से शुक्रवृद्धि होकर सन्तानोत्पादन- शक्ति उत्पन्न होती है । भयंकर मूत्रकृच्छ्र रोग में अभ्रकभस्म को, भुंई-आंवला, गोखरू, बड़ी इलायचीबीज और खांड के साथ घृत में मिलाकर चटाना चाहिये । आठों क्षारों के साथ मिलाकर अभ्रकभस्म का सेवन करने से मूत्रा- घात (पेशाब रुकना) नष्ट होता है । और अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र रोग भी नष्ट होते हैं तथा पाचकअग्नि की वृद्धि होती है। व्रणदोषों को दूर करने के लिये इसे मूर्वाकषाय के साथ प्रयोग करना चाहिये । शरीर में बलवृद्धि के लिये इसको क्षीरकाकोलीचूर्ण के साथ गोदुग्धानुपान सेवन करना चाहिये । शुद्धभल्लातक- चूर्ण या भल्लातक योगों के साथ अभ्रकभस्म प्रयोग करने से बवासीर में लाभ २