भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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एकादशस्तरङ्गः २४६ कहते हैं कि भस्म के उपर रखे सूखे तिनके यदि भस्म हो जाँय तो अग्नि देना बन्द कर देना चाहिये । ऐसी अवस्था में गुरु उपदेश ही परम सहायक होता है । द्वितीयो मारणप्रकारः विमलं हरितालन्तु पञ्चतोलकसंमितम् । पिप्पलत्वक्कषायेण वस्त्रपूतेन भावयेत् ॥ ३० ॥ एकविंशतिवाराणि कुर्यादेवं प्रयत्नतः । चक्रिकां कारयित्वा च भस्मयन्त्रेण पाचयेत् ॥ ३१ ॥ पिप्पलत्वग्भवेनात्र वस्त्रपूतेन भस्मना । स्थाल्यर्द्धं पूरयित्वा च चक्रिकां स्थापयेद्भिषक् ॥ ३२ ॥ तेनैव भस्मना चाथ शेषं भागं प्रपूरयेत् । स्थालीं चुल्ल्यां निधायाथ पचेद्यामचतुष्टयम् ॥ ३३ ॥ मल्लगन्धजमेवन्तु मृतिमाप्नोति निश्चितम् । एवं मृतं तालकन्तु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ ३४ ॥ वस्त्रपूतेन भस्मना इति अत्र वक्तव्यं यद्यपि तथापि सौकर्य्यार्थं स्मारयामः । भस्म चेद्वस्त्रपूतं न क्रियेत असृणं स्थूलं तत् धमनिरोधायालं न स्यात्, तस्मात् श्लक्ष्णमसृणं वस्त्रपूतं विधेयमिति ॥ ३०-३४ ॥ भा.टी.—शुद्ध हरताल पाँच तोला लेकर उसे कपड़े में अच्छी तरह छुने हुए पीपलवृक्षत्वक्कषाय में क्रमशः इक्कीस भावना दें । अन्त में इसकी टिकिया बनाकर अच्छी तरह सुखा लें । अब भस्मयंत्र में पीपलवृक्ष-त्वक् की शुद्ध तथा कपड़छन भस्म को आधे भाग में दबा-दबाकर भरें और इसके ऊपर उक्त टिकि- याओं को रख अच्छी तरह जमा दें और फिर अन्त के अवशिष्ट भाग को उसी भस्म से दबा-दबाकर मुख तक भर दें । यन्त्र को चूल्हे पर रखकर चार पहर की अग्नि देवें । इस विधि से अवश्य ही हरताल की भस्म हो जाती है ॥३०-३४॥ तृतीयो मारणप्रकारः विमलं हरितालन्तु पञ्चतोलकसंमितम् । अर्कक्षीरे दशगुणे पेषयेद्भिषजां वरः ॥ ३५ ॥ चक्रिकां कारयित्वा च शोषयेदातपे पुनः । भस्मयन्त्रेण मतिमान् पचेद्युक्तिपुरःसरम् ॥ ३६ ॥ पलाशभस्मना चात्र वस्त्रपूतेन पूरयेत् । स्थाल्यर्द्धञ्च ततो मध्ये चक्रिकां स्थापयेद्भिषक् ॥ ३७ ॥

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