भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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२५० रसतरङ्गिणी भस्मना चाथ तेनैव भागं शेषं प्रपूरयेत् । चतुर्यामं पचेद्धीमान् श्वेतं भस्म समाहरेत् ॥ ३८ ॥ अर्कदुग्धेन पिष्टं श्लक्ष्णीभूतं साधु भस्मीभवतीति व्याचष्टे । अर्कक्षीरे दशगुणे इति । सर्वमन्यत् पारिभाषिकं पूर्ववदेव ॥ ३५–३८ ॥ भा.टी.—पाँच तोला शुद्ध हरताल लेकर उसे दसगुने आक के दूध के साथ खरल में डालकर अच्छी तरह मर्दन करें और टिकिया बना उसको अच्छी तरह धूप में सुखा लें। अब भस्मयन्त्र के आधे भाग में कपड़छन ढाक की छाल की भस्म भरें। और उस पर उक्त टिकियाओं को रखकर पुनः अवशिष्ट यंत्रभाग को उसी भस्म से अच्छी तरह भर दें और यंत्र को चूल्हे पर रखकर चार पहर की अग्नि दें तो हरताल की श्वेतवर्ण भस्म हो जाती है ॥ ३५–३८ ॥ चतुर्थो मारणप्रकारः विमलं पत्रतालन्तु तत्तुल्या मृतशुक्तिका । खल्वे सम्पेषयेद्यामं कुमारीस्वरसेन वै ॥ ३९ ॥ निर्माय चक्रिकां तस्य शोषयेदातपे भिषक् । शरावसम्पुटे न्यस्य ततो लघुपुटे पचेत् ॥ ४० ॥ स्वाङ्गशीतं ततो ज्ञात्वा भस्म निश्चन्द्रिकं हरेत् । इत्थं मृतं तालकन्तु कुष्ठरोगहरं परम् ॥ ४१ ॥ चतुर्थो मारणप्रकारो मृतशुक्तिकया, अस्मिन् गुणविशेषः कुष्ठनाशन इति । भा. टी.—शुद्ध वर्कीहरताल के बराबर भाग शुक्ति (सीप) भस्म ले कर दोनों को खरल में कुमारी स्वरस से एक पहर तक अच्छी तरह मर्दन करें। टिकिया बनाने योग्य होने पर टिकिया बना उसको धूप में अच्छी तरह सुखा लें। अब इसको एक शरावसम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके लघुपुट में फूँक दें। सम्पुट के स्वांगशीत होने पर उसे खोल निश्चन्द्र भस्म निकाल लें। इस प्रकार बनायी हुई हरताल की भस्म विशेषरूप से कुष्ठनाशक होती है ॥३९-४१॥ पञ्चमो मारणप्रकारः विमलं पत्रतालन्तु त्रिवारं भावयेद्भिषक् । पलाशमूलजैः क्वाथैर्घनीभूतैर्विधानतः ॥ ४२ ॥ माहिषेण च मूत्रेण भावयेच्च ततः परम् । कपोताख्यपुटेनैव पचेत्तालं भिषग्वरः ॥ ४३ ॥ एवं पुटैर्द्वादशभिस्तालकं मृतिमाप्नुयात् । इत्थं मृतं तालकन्तु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ ४४ ॥