रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशस्तरङ्गः २५१ पञ्चमः द्वादशपुटैः शनैः शनैः भस्मीकरणोपयोगी। घनीभूतैरिति मधुनिभैः॥ भा.टी.—शुद्ध वर्कीहरताल को पलाशमूल के गाढ़े क्वाथ की तीन भावना देकर फिर इसको भैंस के मूत्र की तीन भावना दें। धूप में सुखाकर सम्पुट में बन्द करके कपोतपुट में फूँक लें। इस प्रकार बारह पुट देने से हरताल की भस्म हो जाती है। इसको भी निःशंक होकर प्रयोग में लायें ॥ ४२–४४ ॥ षष्ठो मारणप्रकारः विमलं पत्रतालन्तु कन्यकाद्भिर्विमर्दयेत् । चक्रिकां कारयित्वा च शोषयेदातपे भिषक् ॥ ४५ ॥ विधाय गोमये गर्तं तस्मिन् डिण्डीरचूर्णकम् । तालोन्मितं तु विन्यस्य चक्रिकां स्थापयेत्ततः ॥४६ ॥ पुनस्तेनैव चूर्णेन सम्यगाच्छाद्य चक्रिकाम् । पुटेन्महापुटेनैव भूमौ गर्तेऽथवा भिषक् ॥ ४७ ॥ स्वाङ्गशीतं ततो ज्ञात्वा गोमयान्यपसारयेत् । शरदिन्दुनिभं पश्चान्मृतं तालं समाहरेत् ॥४८॥ तालं सञ्चूर्ण्य खल्वे च काचकुप्यां तु विन्यसेत् । इत्थं मृतं तालकन्तु नाशयेद्विषमज्वरम् ॥ ४९ ॥ तण्डुलैकमितं दद्यादेकवारं तु वासरे। श्रीमन्नरेन्द्रनाथाख्यैः गुरुवर्यमहोदयैः ॥ ५० ॥ आविष्कृतोऽनुभूतश्च सुगमोऽयं विधिवरः । प्रकाशितः खलु मया लोकानुग्रहकाम्यया ॥ ५१॥ अथानुभूतचरः षष्ठो मारणप्रकारः—डिण्डीरैः समुद्रफेनैः, भूमौ इति गर्ता- भावेऽपि इत्यर्थः । अत्र विशेषः समुद्रफेनचूर्णकमपि वह्नियोगात् पिण्डितमत्र मिलतीति तत्संयुक्तमेव तालभस्म सम्पद्यते न वियुक्तम् । निर्धूमन्तु भवत्येव । सुगमोऽयं प्रकारः ॥ ४५–५१ ॥ भा.टी.—शुद्ध हरताल को कुमारीस्वरस से अच्छी तरह मर्दन कर उसकी टिकिया बनाकर धूप में सुखा लें। अब एक मोटे और सूखे हुए उपले में गाढ़ा बनाकर हरताल के बराबर भाग समुद्रफेन का चूर्ण भर दें और इसके ऊपर हरताल की टिकिया रखकर फिर इसके अविशिष्ट भाग को समुद्रफेनचूर्ण से भर दें। अब इस चक्रिकायुक्त उपले को जमीन में या गड्ढे में महापुट की अग्नि से फूंक दें। पुट के स्वांगशीत होने पर धीरे-धीरे उपलों की राख को अलग करते हुए निश्चित स्थान में बनी हुई शरच्चन्द्रमा के समान सफ़ेद वर्ण