रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५२ रसतरङ्गिणी हरतालभस्म को निकाल खरल में पीसकर कांच की शीशी में भर लें । इस प्रकार बनायी हुई हरताल की भस्म विषम ज्वर को नष्ट करती है । विषम ज्वर को रोकने के लिये इसको एक चावल भर मात्रा में दिन में एक ही बार देना चाहिये । इसको मेरे गुरुप्रवर नरेन्द्रनाथ जी ने आविष्कार एवं अनुभव किया था । मैं इसे प्रकाशित कर रहा हूँ ॥ ४५-५१ ॥ वक्तव्य—समुद्रफेन के चूर्ण में रखकर भस्म बनाने में हरताल की भस्म पृथक् नहीं बनती है, किन्तु समुद्रफेन चूर्ण के साथ पिंडाकार में मिली हुई होती है । परन्तु इसे जलते हुए कोयलों पर रखने पर धुंयाँ नहीं उठता है । मृततालकस्य गुणाः मृतं तालं हरेद् घोरं फिरङ्गं सुचिरोत्थितम् । वातरक्तं विसर्पञ्च विपादीञ्च विचर्चिकाम् ॥ ५२ ॥ विविधानि च कुष्ठानि ह्यर्शांसि विषमज्वरम् । रोगं फिरङ्गजं हन्यादपस्मारं भगन्दरम् ॥ ५३ ॥ व्रणं नाडीव्रणञ्चापि विस्फोटमतिदारुणम् । वातरक्तभवान् रोगानन्यानपि हरेद् भृशम् ॥ ५४ ॥ फिरङ्गं उपदंशविशेषम् । तस्योपद्रवांश्च ॥ ५२-५४ ॥ भा.टी.—हरताल की भस्म भयंकर और पुराने फिरङ्ग रोग को नष्ट करती है । इसके अतिरिक्त यह भस्म वातरक्त, वीसर्प, विपादिका, विचर्चिका तथा अनेक प्रकार के कुष्ठ रोग और विषमज्वर को नष्ट करती है । फिरंगजन्य रोग, अपस्मार और भगन्दर रोग को नष्ट करती है । इसी तरह पुराने व्रण, नाड़ीव्रण, भयंकर विस्फोट और वातरक्त प्रकोपजन्य अन्यान्य विकारों को भी दूर करती है॥५२-५४॥ शुद्धतालकस्य गुणाः विमलं तालकं स्निग्धं भूतज्वरविनाशनम् । त्वच्यं कुष्ठादिशमनं कथितं च रसायनम् ॥५५॥ भूतज्वरो जीवाणुसम्पर्कजो विषमज्वरः । त्वच्यं त्वग्रोगनाशनमित्यर्थः । रसायनं जराव्याधिहरम् ॥ ५५ ॥ भा.टी.—शुद्धहरताल स्निग्ध होती है, कृमिजन्य संक्रामक-ज्वरों को नष्ट करती है । इसे त्वचा की सब विकृतियाँ दूर होकर वह शुद्ध निर्मल हो जाती है । शुद्ध हरताल कुष्ठ आदि रोगों को शान्त करती है और रसायन है ॥५५॥ वक्तव्य—इसके अतिरिक्त हरताल को दो विधियों से सेवन करने का