भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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एकादशस्तरङ्गः २५३ विधान बताया गया है। प्रथम इसको भस्म करके, दूसरा इसको शुद्ध करके योगों में डालकर प्रयोग करना । भस्मावस्था में हरिताल का सोमल ( संखिया ) का भाग ही शेष रहने से उसका अन्तः प्रयोग करने से सोमल के सदृश ही आमा- शयान्तःकला में रक्तसञ्चार बढ़ता है जिससे अग्नि दीप्त होती और भूख लगती है । परन्तु अधिक मात्रा में देने से इससे उलटा क्षोभ होने लगता है। जो चिकित्सक औषधि द्वारा अधिक मात्रा में घी, दूध, मक्खन आदि स्निग्ध पदार्थों को अधिक खिलाने का दावा करते हैं वे ऐसे सोमल आदि औषधियों के बल पर ही करते हैं। तीव्र पाण्डुरोग पर हरतालभस्म या सोमल देने से रक्त में रक्ताणुओं की संख्या बढ़ती है जिससे पाण्डु के चिह्न शान्त होने लगते हैं। हृदय पर इस भस्म का बल तथा उत्तेजक प्रभाव होने से हृदय की दुर्बल गति बलवती हो जाती है। श्वाससंस्थान पर तालभस्म या सोमल का बल्य प्रभाव होता है। इसके सेवन से श्वास-काठिन्य हट जाता है। लसीकार्बुद तथा लसीका ग्रन्थि अर्बुदों को नष्ट करने में सोमल-समांस हरतालभस्म का विशेष प्रभाव देखा जाता है। भोजन के बाद तुरन्त ही मलत्याग की प्रवृत्ति होने या पतला दस्त होने पर सोमल के योग विशेष लाभकारी सिद्ध होते हैं ॥ ५५ ॥ हरितालस्य मात्रा पादांशतो रक्तिकायाः रक्तिकार्द्धमितं परम् । विमलं च मृतं तालं प्रयुञ्जीत भिषग्वरः ॥५६॥ शुद्धस्य सुमृतस्य च तालस्य गुञ्जार्धं यावन्मात्रा नाधिका ॥ ५६ ॥ भा.टी.—शुद्धहरिताल या हरताल की भस्म को चौथाई रत्ती से आधी रत्ती की मात्रा तक सेवन कराया जा सकता है ॥ ५६ ॥ मृततालकस्य परीक्षणम् काचपात्रे क्षिपेत्तोयं लवणद्रावकान्वितम् । तस्मिञ्जले तु गुञ्जैकं मृतं तालं विनिक्षिपेत् ॥५७॥ सन्तापयत्तस्तीव्रं विधानज्ञो भिषग्वरः । पीतवर्णं यदा चूर्णं पतन् पात्रतलं विशेत् ॥५८॥ मृतं तालकमेवेदं जानीयात्तु तदा भिषक् । अन्यथाऽन्यस्य धात्वादेर्भस्मेदमिति निर्दिशेत् ॥५६॥ अथ मृततालकपरीक्षणं लवणद्रावको वक्ष्यमाणप्रकारः । अन्यथेति पीत- वर्णचूर्णाभावे सति अन्यस्य तालकाद् भिन्नस्य ॥५७-५६॥