रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४८ रसतरङ्गिणी दोलायंत्र द्वारा पकावें । इस प्रकार शाल्मलीमूलस्वरस में एक पहर तक स्वेदन करने से हरताल शुद्ध हो जाता है । अथवा शाल्मलीमूलस्वरस की सांत भावना देने से भी हरताल शुद्ध हो जाता है ॥ २३-२४ ॥ पञ्चमः शोधनप्रकारः चूर्णीकृतं पत्रतालं चूर्णानीरेण भावयेत् । सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ २५ ॥ चूर्णोदकेन प्रागुक्तपरिमाणेन सप्तधा भावनात् पञ्चमः ॥ २५ ॥ भा.टी.—वर्कीहरताल को चूने के जल की सात भावना देने से भी वह उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥ २५ ॥ तालकमारणस्य प्रथमः प्रकारः विमलं तालमादाय भिषक् पौनर्नवे रसे । दिनैकं खल्वयन्त्रे च पेषयित्वाऽथ शोषयेत् ॥ २६ ॥ घनीभूतं ततो ज्ञात्वा चक्रिकाः कारयेद्भिषक । सम्यक् ताः शोषयित्वा च भस्मयन्त्रेण वै पचेत् ॥ २७ ॥ क्षारैः पौनर्नवैश्चात्र स्थाल्यर्द्धं परिपूरयेत् । निधाय चक्रिकाश्चाथ क्षारैस्तैरेव पूरयेत् ॥ २८ ॥ वह्निं प्रदापयेत् यत्नाद्विधानज्ञो निरन्तरम् । मल्लगन्धजमेवन्तु म्रियते नात्र संशयः ॥ २९ ॥ अथ मारणप्रकारः प्रथमः—पुनर्नवारसैर्घृष्टं तत्क्षारान्तर्निवेशितं क्रमवृद्धाग्निना पश्चात् पचेच्च दिवसत्रयम् । भावप्रकाशमते सततं पञ्चदिनानि पाकः कार्यः । उक्तं तत्र—"दिनान्यन्तरशून्यानि पञ्च वह्निं प्रदापयेदिति ।” ॥ २६-२९ ॥ भा.टी.—शुद्ध हरताल को खरल में डालकर उसमें पुनर्नवा स्वरस मिला खूब मर्दन करके जब गाढ़ा-सा कल्क हो जाय तो इसकी टिकिया बना लें और अच्छी तरह सुखाकर भस्मयंत्र में आधा भाग पुनर्नवाक्षार भर के टिकियाओं को रखकर पुनः ऊपर से पुनर्नवाक्षार को दबा-दबाकर मुख तक भर दें । अब चूल्हे पर रखकर विधिपूर्वक अग्नि देवें तो निःसन्देह हरताल की भस्म हो जाती है ॥ २६-२९ ॥ वक्तव्य—यहाँ पर पुनः यह बात स्मरण करनी चाहिये कि पुनर्नवा की यदि भस्म ली जाय तो वह अच्छी तरह कपड़छान की हुई होनी चाहिये । अन्यथा हरताल उड़ जायगी । अग्नि के विषय से दो मत देखने में आते हैं—भाव- प्रकाश में पाँच दिन तक निरन्तर मध्यम अग्नि देने को लिखा है; और कोई