रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
२४८ रसतरङ्गिणी दोलायंत्र द्वारा पकावें । इस प्रकार शाल्मलीमूलस्वरस में एक पहर तक स्वेदन करने से हरताल शुद्ध हो जाता है । अथवा शाल्मलीमूलस्वरस की सांत भावना देने से भी हरताल शुद्ध हो जाता है ॥ २३-२४ ॥ पञ्चमः शोधनप्रकारः चूर्णीकृतं पत्रतालं चूर्णानीरेण भावयेत् । सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ २५ ॥ चूर्णोदकेन प्रागुक्तपरिमाणेन सप्तधा भावनात् पञ्चमः ॥ २५ ॥ भा.टी.—वर्कीहरताल को चूने के जल की सात भावना देने से भी वह उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥ २५ ॥ तालकमारणस्य प्रथमः प्रकारः विमलं तालमादाय भिषक् पौनर्नवे रसे । दिनैकं खल्वयन्त्रे च पेषयित्वाऽथ शोषयेत् ॥ २६ ॥ घनीभूतं ततो ज्ञात्वा चक्रिकाः कारयेद्भिषक । सम्यक् ताः शोषयित्वा च भस्मयन्त्रेण वै पचेत् ॥ २७ ॥ क्षारैः पौनर्नवैश्चात्र स्थाल्यर्द्धं परिपूरयेत् । निधाय चक्रिकाश्चाथ क्षारैस्तैरेव पूरयेत् ॥ २८ ॥ वह्निं प्रदापयेत् यत्नाद्विधानज्ञो निरन्तरम् । मल्लगन्धजमेवन्तु म्रियते नात्र संशयः ॥ २९ ॥ अथ मारणप्रकारः प्रथमः—पुनर्नवारसैर्घृष्टं तत्क्षारान्तर्निवेशितं क्रमवृद्धाग्निना पश्चात् पचेच्च दिवसत्रयम् । भावप्रकाशमते सततं पञ्चदिनानि पाकः कार्यः । उक्तं तत्र—"दिनान्यन्तरशून्यानि पञ्च वह्निं प्रदापयेदिति ।” ॥ २६-२९ ॥ भा.टी.—शुद्ध हरताल को खरल में डालकर उसमें पुनर्नवा स्वरस मिला खूब मर्दन करके जब गाढ़ा-सा कल्क हो जाय तो इसकी टिकिया बना लें और अच्छी तरह सुखाकर भस्मयंत्र में आधा भाग पुनर्नवाक्षार भर के टिकियाओं को रखकर पुनः ऊपर से पुनर्नवाक्षार को दबा-दबाकर मुख तक भर दें । अब चूल्हे पर रखकर विधिपूर्वक अग्नि देवें तो निःसन्देह हरताल की भस्म हो जाती है ॥ २६-२९ ॥ वक्तव्य—यहाँ पर पुनः यह बात स्मरण करनी चाहिये कि पुनर्नवा की यदि भस्म ली जाय तो वह अच्छी तरह कपड़छान की हुई होनी चाहिये । अन्यथा हरताल उड़ जायगी । अग्नि के विषय से दो मत देखने में आते हैं—भाव- प्रकाश में पाँच दिन तक निरन्तर मध्यम अग्नि देने को लिखा है; और कोई
एकादशस्तरङ्गः २४६ कहते हैं कि भस्म के उपर रखे सूखे तिनके यदि भस्म हो जाँय तो अग्नि देना बन्द कर देना चाहिये । ऐसी अवस्था में गुरु उपदेश ही परम सहायक होता है । द्वितीयो मारणप्रकारः विमलं हरितालन्तु पञ्चतोलकसंमितम् । पिप्पलत्वक्कषायेण वस्त्रपूतेन भावयेत् ॥ ३० ॥ एकविंशतिवाराणि कुर्यादेवं प्रयत्नतः । चक्रिकां कारयित्वा च भस्मयन्त्रेण पाचयेत् ॥ ३१ ॥ पिप्पलत्वग्भवेनात्र वस्त्रपूतेन भस्मना । स्थाल्यर्द्धं पूरयित्वा च चक्रिकां स्थापयेद्भिषक् ॥ ३२ ॥ तेनैव भस्मना चाथ शेषं भागं प्रपूरयेत् । स्थालीं चुल्ल्यां निधायाथ पचेद्यामचतुष्टयम् ॥ ३३ ॥ मल्लगन्धजमेवन्तु मृतिमाप्नोति निश्चितम् । एवं मृतं तालकन्तु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ ३४ ॥ वस्त्रपूतेन भस्मना इति अत्र वक्तव्यं यद्यपि तथापि सौकर्य्यार्थं स्मारयामः । भस्म चेद्वस्त्रपूतं न क्रियेत असृणं स्थूलं तत् धमनिरोधायालं न स्यात्, तस्मात् श्लक्ष्णमसृणं वस्त्रपूतं विधेयमिति ॥ ३०-३४ ॥ भा.टी.—शुद्ध हरताल पाँच तोला लेकर उसे कपड़े में अच्छी तरह छुने हुए पीपलवृक्षत्वक्कषाय में क्रमशः इक्कीस भावना दें । अन्त में इसकी टिकिया बनाकर अच्छी तरह सुखा लें । अब भस्मयंत्र में पीपलवृक्ष-त्वक् की शुद्ध तथा कपड़छन भस्म को आधे भाग में दबा-दबाकर भरें और इसके ऊपर उक्त टिकि- याओं को रख अच्छी तरह जमा दें और फिर अन्त के अवशिष्ट भाग को उसी भस्म से दबा-दबाकर मुख तक भर दें । यन्त्र को चूल्हे पर रखकर चार पहर की अग्नि देवें । इस विधि से अवश्य ही हरताल की भस्म हो जाती है ॥३०-३४॥ तृतीयो मारणप्रकारः विमलं हरितालन्तु पञ्चतोलकसंमितम् । अर्कक्षीरे दशगुणे पेषयेद्भिषजां वरः ॥ ३५ ॥ चक्रिकां कारयित्वा च शोषयेदातपे पुनः । भस्मयन्त्रेण मतिमान् पचेद्युक्तिपुरःसरम् ॥ ३६ ॥ पलाशभस्मना चात्र वस्त्रपूतेन पूरयेत् । स्थाल्यर्द्धञ्च ततो मध्ये चक्रिकां स्थापयेद्भिषक् ॥ ३७ ॥
२५० रसतरङ्गिणी भस्मना चाथ तेनैव भागं शेषं प्रपूरयेत् । चतुर्यामं पचेद्धीमान् श्वेतं भस्म समाहरेत् ॥ ३८ ॥ अर्कदुग्धेन पिष्टं श्लक्ष्णीभूतं साधु भस्मीभवतीति व्याचष्टे । अर्कक्षीरे दशगुणे इति । सर्वमन्यत् पारिभाषिकं पूर्ववदेव ॥ ३५–३८ ॥ भा.टी.—पाँच तोला शुद्ध हरताल लेकर उसे दसगुने आक के दूध के साथ खरल में डालकर अच्छी तरह मर्दन करें और टिकिया बना उसको अच्छी तरह धूप में सुखा लें। अब भस्मयन्त्र के आधे भाग में कपड़छन ढाक की छाल की भस्म भरें। और उस पर उक्त टिकियाओं को रखकर पुनः अवशिष्ट यंत्रभाग को उसी भस्म से अच्छी तरह भर दें और यंत्र को चूल्हे पर रखकर चार पहर की अग्नि दें तो हरताल की श्वेतवर्ण भस्म हो जाती है ॥ ३५–३८ ॥ चतुर्थो मारणप्रकारः विमलं पत्रतालन्तु तत्तुल्या मृतशुक्तिका । खल्वे सम्पेषयेद्यामं कुमारीस्वरसेन वै ॥ ३९ ॥ निर्माय चक्रिकां तस्य शोषयेदातपे भिषक् । शरावसम्पुटे न्यस्य ततो लघुपुटे पचेत् ॥ ४० ॥ स्वाङ्गशीतं ततो ज्ञात्वा भस्म निश्चन्द्रिकं हरेत् । इत्थं मृतं तालकन्तु कुष्ठरोगहरं परम् ॥ ४१ ॥ चतुर्थो मारणप्रकारो मृतशुक्तिकया, अस्मिन् गुणविशेषः कुष्ठनाशन इति । भा. टी.—शुद्ध वर्कीहरताल के बराबर भाग शुक्ति (सीप) भस्म ले कर दोनों को खरल में कुमारी स्वरस से एक पहर तक अच्छी तरह मर्दन करें। टिकिया बनाने योग्य होने पर टिकिया बना उसको धूप में अच्छी तरह सुखा लें। अब इसको एक शरावसम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके लघुपुट में फूँक दें। सम्पुट के स्वांगशीत होने पर उसे खोल निश्चन्द्र भस्म निकाल लें। इस प्रकार बनायी हुई हरताल की भस्म विशेषरूप से कुष्ठनाशक होती है ॥३९-४१॥ पञ्चमो मारणप्रकारः विमलं पत्रतालन्तु त्रिवारं भावयेद्भिषक् । पलाशमूलजैः क्वाथैर्घनीभूतैर्विधानतः ॥ ४२ ॥ माहिषेण च मूत्रेण भावयेच्च ततः परम् । कपोताख्यपुटेनैव पचेत्तालं भिषग्वरः ॥ ४३ ॥ एवं पुटैर्द्वादशभिस्तालकं मृतिमाप्नुयात् । इत्थं मृतं तालकन्तु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ ४४ ॥
एकादशस्तरङ्गः २५१ पञ्चमः द्वादशपुटैः शनैः शनैः भस्मीकरणोपयोगी। घनीभूतैरिति मधुनिभैः॥ भा.टी.—शुद्ध वर्कीहरताल को पलाशमूल के गाढ़े क्वाथ की तीन भावना देकर फिर इसको भैंस के मूत्र की तीन भावना दें। धूप में सुखाकर सम्पुट में बन्द करके कपोतपुट में फूँक लें। इस प्रकार बारह पुट देने से हरताल की भस्म हो जाती है। इसको भी निःशंक होकर प्रयोग में लायें ॥ ४२–४४ ॥ षष्ठो मारणप्रकारः विमलं पत्रतालन्तु कन्यकाद्भिर्विमर्दयेत् । चक्रिकां कारयित्वा च शोषयेदातपे भिषक् ॥ ४५ ॥ विधाय गोमये गर्तं तस्मिन् डिण्डीरचूर्णकम् । तालोन्मितं तु विन्यस्य चक्रिकां स्थापयेत्ततः ॥४६ ॥ पुनस्तेनैव चूर्णेन सम्यगाच्छाद्य चक्रिकाम् । पुटेन्महापुटेनैव भूमौ गर्तेऽथवा भिषक् ॥ ४७ ॥ स्वाङ्गशीतं ततो ज्ञात्वा गोमयान्यपसारयेत् । शरदिन्दुनिभं पश्चान्मृतं तालं समाहरेत् ॥४८॥ तालं सञ्चूर्ण्य खल्वे च काचकुप्यां तु विन्यसेत् । इत्थं मृतं तालकन्तु नाशयेद्विषमज्वरम् ॥ ४९ ॥ तण्डुलैकमितं दद्यादेकवारं तु वासरे। श्रीमन्नरेन्द्रनाथाख्यैः गुरुवर्यमहोदयैः ॥ ५० ॥ आविष्कृतोऽनुभूतश्च सुगमोऽयं विधिवरः । प्रकाशितः खलु मया लोकानुग्रहकाम्यया ॥ ५१॥ अथानुभूतचरः षष्ठो मारणप्रकारः—डिण्डीरैः समुद्रफेनैः, भूमौ इति गर्ता- भावेऽपि इत्यर्थः । अत्र विशेषः समुद्रफेनचूर्णकमपि वह्नियोगात् पिण्डितमत्र मिलतीति तत्संयुक्तमेव तालभस्म सम्पद्यते न वियुक्तम् । निर्धूमन्तु भवत्येव । सुगमोऽयं प्रकारः ॥ ४५–५१ ॥ भा.टी.—शुद्ध हरताल को कुमारीस्वरस से अच्छी तरह मर्दन कर उसकी टिकिया बनाकर धूप में सुखा लें। अब एक मोटे और सूखे हुए उपले में गाढ़ा बनाकर हरताल के बराबर भाग समुद्रफेन का चूर्ण भर दें और इसके ऊपर हरताल की टिकिया रखकर फिर इसके अविशिष्ट भाग को समुद्रफेनचूर्ण से भर दें। अब इस चक्रिकायुक्त उपले को जमीन में या गड्ढे में महापुट की अग्नि से फूंक दें। पुट के स्वांगशीत होने पर धीरे-धीरे उपलों की राख को अलग करते हुए निश्चित स्थान में बनी हुई शरच्चन्द्रमा के समान सफ़ेद वर्ण
२५२ रसतरङ्गिणी हरतालभस्म को निकाल खरल में पीसकर कांच की शीशी में भर लें । इस प्रकार बनायी हुई हरताल की भस्म विषम ज्वर को नष्ट करती है । विषम ज्वर को रोकने के लिये इसको एक चावल भर मात्रा में दिन में एक ही बार देना चाहिये । इसको मेरे गुरुप्रवर नरेन्द्रनाथ जी ने आविष्कार एवं अनुभव किया था । मैं इसे प्रकाशित कर रहा हूँ ॥ ४५-५१ ॥ वक्तव्य—समुद्रफेन के चूर्ण में रखकर भस्म बनाने में हरताल की भस्म पृथक् नहीं बनती है, किन्तु समुद्रफेन चूर्ण के साथ पिंडाकार में मिली हुई होती है । परन्तु इसे जलते हुए कोयलों पर रखने पर धुंयाँ नहीं उठता है । मृततालकस्य गुणाः मृतं तालं हरेद् घोरं फिरङ्गं सुचिरोत्थितम् । वातरक्तं विसर्पञ्च विपादीञ्च विचर्चिकाम् ॥ ५२ ॥ विविधानि च कुष्ठानि ह्यर्शांसि विषमज्वरम् । रोगं फिरङ्गजं हन्यादपस्मारं भगन्दरम् ॥ ५३ ॥ व्रणं नाडीव्रणञ्चापि विस्फोटमतिदारुणम् । वातरक्तभवान् रोगानन्यानपि हरेद् भृशम् ॥ ५४ ॥ फिरङ्गं उपदंशविशेषम् । तस्योपद्रवांश्च ॥ ५२-५४ ॥ भा.टी.—हरताल की भस्म भयंकर और पुराने फिरङ्ग रोग को नष्ट करती है । इसके अतिरिक्त यह भस्म वातरक्त, वीसर्प, विपादिका, विचर्चिका तथा अनेक प्रकार के कुष्ठ रोग और विषमज्वर को नष्ट करती है । फिरंगजन्य रोग, अपस्मार और भगन्दर रोग को नष्ट करती है । इसी तरह पुराने व्रण, नाड़ीव्रण, भयंकर विस्फोट और वातरक्त प्रकोपजन्य अन्यान्य विकारों को भी दूर करती है॥५२-५४॥ शुद्धतालकस्य गुणाः विमलं तालकं स्निग्धं भूतज्वरविनाशनम् । त्वच्यं कुष्ठादिशमनं कथितं च रसायनम् ॥५५॥ भूतज्वरो जीवाणुसम्पर्कजो विषमज्वरः । त्वच्यं त्वग्रोगनाशनमित्यर्थः । रसायनं जराव्याधिहरम् ॥ ५५ ॥ भा.टी.—शुद्धहरताल स्निग्ध होती है, कृमिजन्य संक्रामक-ज्वरों को नष्ट करती है । इसे त्वचा की सब विकृतियाँ दूर होकर वह शुद्ध निर्मल हो जाती है । शुद्ध हरताल कुष्ठ आदि रोगों को शान्त करती है और रसायन है ॥५५॥ वक्तव्य—इसके अतिरिक्त हरताल को दो विधियों से सेवन करने का
एकादशस्तरङ्गः २५३ विधान बताया गया है। प्रथम इसको भस्म करके, दूसरा इसको शुद्ध करके योगों में डालकर प्रयोग करना । भस्मावस्था में हरिताल का सोमल ( संखिया ) का भाग ही शेष रहने से उसका अन्तः प्रयोग करने से सोमल के सदृश ही आमा- शयान्तःकला में रक्तसञ्चार बढ़ता है जिससे अग्नि दीप्त होती और भूख लगती है । परन्तु अधिक मात्रा में देने से इससे उलटा क्षोभ होने लगता है। जो चिकित्सक औषधि द्वारा अधिक मात्रा में घी, दूध, मक्खन आदि स्निग्ध पदार्थों को अधिक खिलाने का दावा करते हैं वे ऐसे सोमल आदि औषधियों के बल पर ही करते हैं। तीव्र पाण्डुरोग पर हरतालभस्म या सोमल देने से रक्त में रक्ताणुओं की संख्या बढ़ती है जिससे पाण्डु के चिह्न शान्त होने लगते हैं। हृदय पर इस भस्म का बल तथा उत्तेजक प्रभाव होने से हृदय की दुर्बल गति बलवती हो जाती है। श्वाससंस्थान पर तालभस्म या सोमल का बल्य प्रभाव होता है। इसके सेवन से श्वास-काठिन्य हट जाता है। लसीकार्बुद तथा लसीका ग्रन्थि अर्बुदों को नष्ट करने में सोमल-समांस हरतालभस्म का विशेष प्रभाव देखा जाता है। भोजन के बाद तुरन्त ही मलत्याग की प्रवृत्ति होने या पतला दस्त होने पर सोमल के योग विशेष लाभकारी सिद्ध होते हैं ॥ ५५ ॥ हरितालस्य मात्रा पादांशतो रक्तिकायाः रक्तिकार्द्धमितं परम् । विमलं च मृतं तालं प्रयुञ्जीत भिषग्वरः ॥५६॥ शुद्धस्य सुमृतस्य च तालस्य गुञ्जार्धं यावन्मात्रा नाधिका ॥ ५६ ॥ भा.टी.—शुद्धहरिताल या हरताल की भस्म को चौथाई रत्ती से आधी रत्ती की मात्रा तक सेवन कराया जा सकता है ॥ ५६ ॥ मृततालकस्य परीक्षणम् काचपात्रे क्षिपेत्तोयं लवणद्रावकान्वितम् । तस्मिञ्जले तु गुञ्जैकं मृतं तालं विनिक्षिपेत् ॥५७॥ सन्तापयत्तस्तीव्रं विधानज्ञो भिषग्वरः । पीतवर्णं यदा चूर्णं पतन् पात्रतलं विशेत् ॥५८॥ मृतं तालकमेवेदं जानीयात्तु तदा भिषक् । अन्यथाऽन्यस्य धात्वादेर्भस्मेदमिति निर्दिशेत् ॥५६॥ अथ मृततालकपरीक्षणं लवणद्रावको वक्ष्यमाणप्रकारः । अन्यथेति पीत- वर्णचूर्णाभावे सति अन्यस्य तालकाद् भिन्नस्य ॥५७-५६॥
२५४ रसतरङ्गिणी भा.टी.—एक कांच की चौड़ी प्याली में और लवणद्राव डालकर उसमें एक रत्ती हरताल की भस्म भी डाल दें, अब इस कांचपात्र को सुरादीप के ऊपर त्रिपादिका पर रखकर गरम करें तो इस जल में से पीतवर्ण का निक्षेप पात्र के तल में बैठना आरम्भ हो जायगा । ऐसी अवस्था में यह हरताल की भस्म ही है ऐसा निश्चय करना चाहिये । यदि ऐसा निक्षेप नीचे न आये तो अन्य किसी धातु आदि की भस्म समझनी चाहिये ॥ ५७–५६ ॥ अथ तालकस्य आमयिकः प्रयोगः वासायाः कण्टकार्या वा रसेन परिशीलितम् । तालकं नाशयेत्कासं श्वासं परमदारुणम् ॥६०॥ आम्रगन्धहरिद्रायाः स्वरसेन च शीलितम् । सर्वरक्तविकाराणां तालकं परमौषधम् ॥६१॥ वचाजीरकचूर्णाभ्यामपस्मारहरं परम् । पञ्चतिक्तकषायेण कुष्ठरोगं विनाशयेत् ॥६२॥ देवदालीद्रवेणोह तालकं परिशीलितम् । वातरक्तकृतान् रोगान् सर्वानैव विनाशयेत् ॥६३॥ वन्ध्याकर्कोटकीद्रावैर्विंसर्पं दारुणं हरेत् । कुमारीस्वरसेनेह त्वग्रोगानाशु नाशयेत् ॥६४॥ चेतकीचूर्णयोगेन हरेदर्शांसि सत्वरम् । हरिद्रास्वरसेनाशु पाण्डुरोगं विनाशयेत् ॥६५॥ गुडूचीसत्त्वसंयुक्तं तालं वातास्रनाशनम् । ताम्बूलेन क्षयं हन्यात्प्रमेहं सुरसारसैः ॥६६॥ अजामूत्रेण संयुक्तं हरेत्तूर्णं जलोदरम् । पिप्पलीमधुसंयुक्तं वह्निमान्द्यं विनाशयेत् ॥६७॥ मरिचकज्जलीयुतं विषान्वितं च तालकम् । समं विमर्द्य वारिणा वटी तु गुञ्जासंमिता ॥६८॥ कृता निषेविता ततः प्रलापमोहसंयुतम् । निहन्ति दुर्जयज्वरं ज्वरं च सान्निपातिकम् ॥६६॥ सतुत्थशंखतालकं यथोत्तरं विवर्द्धितम् । सहारसेन पेषितं विपाचितं विधानतः ॥७०॥ यवोन्मितं तु सेवितं यथानुपानयोगतः । निहन्ति दुर्जयज्वरं ज्वरं च भूतसङ्गजम् ॥७१॥
सताम्रकज्जलीयुतं तु तालकं विशोधितम् । विभाव्य निम्बवारिणा नवेन चेन्द्रवारकम् ॥७२॥ निषेवितं तु गुञ्जकं ज्वरस्य यामपूर्वकम् । निहन्ति भूतसङ्गजं ज्वरं परं सुदारुणम् ॥७३॥ नवसादरचूर्णेन तालकं परिपेषितम् । लेपेन नाशयत्येव वृश्चिकार्तिं सुदारुणाम् ॥७४॥ लवङ्गचोचकपूरसंयुक्तं शुक्रमहेहृत् । जातिपत्रीकुङ्कुमाभ्यां प्रतिश्यायं व्यपोहति ॥७५॥ अपामार्गशिखाक्षारयुतं तु हरितालकम् । प्रलिप्तं चिरसञ्जातं हन्ति लिङ्गार्शसं द्रुतम् ॥७६॥ सन्योषताम्रं तालं तु वातशूलहरं परम् । जातीफलसमायुक्तं बलवृद्धिकरं मतम् ॥७७॥ अथास्य रोगयोग्यः प्रयोगः—आम्म्रगन्धहरिद्रा आँवाहलदीत्याख्या, पञ्चतिक्तं गुडूची, निम्बमूलत्वक् , वासकः, निदिग्धिका, पटोलपत्रमित्येतदुक्तम् । ताम्बूलेन क्षयमिति—यद्यपि ताम्बूलं शोषिणामपथ्यं तथापि भेषजसंयोगप्रभावात् ज्ञेयम् । अथवा चूर्णखादिरादिवर्जितं ताम्बूलपत्रमादेयमिति विशेषः । दुर्ज्वलज्वरः वर्षासु जातो विषमज्वरः । चतुर्दशवारं नवीनेन निम्बजलेन भावना ॥ ६०–७७ ॥ भा.टी.—वासास्वरस अथवा कंटकारीस्वरस के साथ हरताल का सेवन करने से भयंकर श्वास रोग दूर हो जाता है। सब प्रकार के रक्तविकृतिजन्य रोगों के लिये हरताल को आँवाहल्दी के स्वरस के साथ सेवन कराया जाता है। अपस्मार रोग में इसको वच और जीरे के चूर्ण के साथ प्रयोग करना चाहिये। पूर्वोक्त पञ्चतिक्त द्रव्यों के कषाय के साथ सेवन करने से यह कुष्ठ रोग को नष्ट करती है। देवदालीस्वरस के साथ हरताल का सेवन करने से यह वातरक्त रोग- जन्य उपद्रवों को शांत करती है। भयंकर वीसर्प रोग के लिये बांझककोड़े के रस के साथ हरताल का सेवन करना चाहिये। त्वचा के रोगों में इसको कुमारीस्वरस के साथ सेवन करने से लाभ होता है। हरड़ के चूर्ण के साथ कुछ दिन हरताल का सेवन करने से अर्शोंरोग शीघ्र ही शांत हो जाता है। पाण्डुरोग में इसको हल्दी के रस के साथ सेवन करना चाहिये। वातरक्त रोग में इसको गिलोयसत्त्व के साथ सेवन करना चाहिये। पान के साथ इसको क्षयरोग में दिया जाता है।
२५६ रसतरङ्गिणी प्रमेह में इसे तुलसीस्वरस के साथ प्रयोग करना चाहिये। जलोदर में हरताल को बकरी के मूत्र के साथ प्रयोग करना चाहिये। अग्निमांद्य में इसको पिप्पली- चूर्ण और मधु में मिलाकर सेवन करना चाहिए। कालीमिर्च कजली, शुद्ध वत्सनाभविष और शुद्धहरताल; प्रत्येक समभाग लेकर खरल में जल के साथ घोटकर एक-एक रत्ती की गोली बना लें। इन वटियों के सेवन से प्रलाप और मोहयुक्त दुर्जलज्वर मलेरिया तथा सन्निपातिकज्वर में लाभ होता है। शुद्ध तूतिया एक भाग, शंखभस्म दो भाग, शुद्ध हरताल तीन भाग लेकर इनको कुमारीस्वरस से मर्दनकर संपुट में बन्द करके लघु पुट में पका लेवें। अब इसमें से एक यवमात्रा में लेकर उचित अनुपान के साथ सेवन करायें तो इससे विषम- ज्वर तथा विषकृमिजन्य ज्वर नष्ट हो जाते हैं। ताम्रभस्म, पारद गन्धक की सम- भाग कजली, तथा शुद्धहरताल, प्रत्येक समभाग लेकर खरल में एकत्र करके इनको नीम के स्वरस की चौहद बार भावना देकर सुखाकर रख लें। इनमें से मलेरिया ज्वर आने के तीन घंटे पहिले एक रत्ती रोगी को खिला दें तो भयानक विषमज्वर नष्ट हो जाता है। हरताल को नौसादर चूर्ण के साथ पीसकर बिच्छू के काटे हुए स्थान पर जल से लेप करने से बिच्छू का विष उतर जाता है। शुक्र- प्रमेह में इसका लौंग, दालचीनी और केसर के साथ प्रयोग करने से आराम आता है। प्रतिश्याय (जुकाम) में इसको जावित्री और केसर के साथ मिलाकर देना चाहिये। लिंगार्श रोग में अपामार्ग की जड़ की छाल और हरताल को जल से पीसकर लेप करने से पुराना लिंगार्श भी नष्ट हो जाता है। वातनाड़ीशूल में हरताल को त्रिकटुचूर्ण और ताम्रभस्म में मिलाकर देना चाहिये। शरीर में बल बढ़ाने के लिये हरताल को जायफलचूर्ण के साथ प्रयोग करना चाहिये॥६०-७७॥ तालकोदयमलहरः सिक्थतैलं तु विमलं त्रिंशत्तोलकसंमितम्। द्वितोलकमितं तालं कूष्माण्डद्रवशोधितम् ॥७८॥ श्लक्ष्णपिष्टा कज्जलिका निशा खदिरसारकम्। गैरिकं गिरिसिन्दूरं पृथक् तोलकसंमितम् ॥७९॥ मनःशिला च विमला तोलकार्द्धमिता यथा। सम्मेल्य खल्वे यत्नेन काचकुप्यां तु विन्यसेत् ॥८०॥ मतो मलहरोऽयं तु तालकोदयसंज्ञकः। नानादोषसमुद्भूतव्रणवर्गनिषूदनः ॥८१॥
१७ एकादशस्तरङ्गः २५७ विचर्चिकादद्रुकुष्ठपामाविस्फोटनाशनः । नाडीव्रणहरश्चैव समाख्यातो विशेषतः ॥८२॥ भा.टी.—सिक्यतैल तीस तोला, पेठे के रस में शुद्ध किया हुआ हरताल दो तोला, पारद गन्धक की कज्जली, हरड़चूर्ण, कत्था, गेरू, सिन्दूर, एक-एक तोला, शुद्ध मैनसिल आधा तोला लेकर सब को यथाविधि खरल में मिलाकर काँच की शीशी में रख लें । इसको तालकमलहर कहते हैं । यह मरहम अनेक प्रकार की खराबियों से उत्पन्न व्रणों को नष्ट करता है । विचर्चिका, दाद, कुष्ठ पामा तथा विस्फोट नाशक है । नाड़ीव्रण के लिये विशेष रूप से लाभदायक है ॥ ७८-८२ ॥ प्रथमं रसमाणिक्यम् द्विकर्षं पत्रतालन्तु कूष्माण्डसाललेन वै ; विभावयेत्सप्तवारं त्रिवारं वा विधानतः ॥ ८३ ॥ ततो दध्नाऽथवाम्लेन तथैव तु विभावयेत् । प्रक्षालयेत्तत्तस्तोयैः प्रतप्तैस्तु भिषग्वरः ॥ ८४ ॥ मध्येऽभ्रपत्रयोर्न्यस्य शरावे विन्यसेद्भिषक् । शरावेणापरेणोह च्छादयेद्यत्नतः पुनः ॥ ८५ ॥ बदरीपत्रकल्केन विदध्यात्सन्धिलेपनम् । आतपे चाथ संशोष्य बालुकायन्त्रगं पचेत् ॥ ८६ ॥ मध्यमेनाग्निना यत्नात् होरात्रितयसंमितम् । स्वांगशीतं समुद्धृत्य माणिक्याभं हरिद्रसम् ॥ ८७ ॥ मात्रा रक्तिद्वयमिता रसो माणिक्यसंज्ञितः । वातरक्तं हरेद् घोर फिरङ्गञ्चातिदारुणम् ॥ ८८ ॥ विविधानि च कुष्ठानि तथा नाडीव्रणं हरेत् ॥ नासास्यप्रभवान् रोगान् नाशयेन्नात्र संशयः ॥ ८९ ॥ रसमाणिक्यस्याद्यः प्रकारः—प्रतप्ततोयैः क्षालनं नैर्मल्यार्थम् । क्षालनानन्तरं घर्मे शोषयित्वाभ्रपत्रयोः संस्थाप्यम् ॥ ८३-८६ ॥ भा.टी.—चार तोला बर्की हरताल को पेठे के स्वरस में सात बार या तीन बार भावना देवें । इसके अनन्तर सात बार या तीन बार खट्टे दही की तीन भावना देवें । भावना देने के बाद इसको गरम पानी से अच्छी तरह धोकर साफ कर लें । अब इनको सुखा कर दो अभ्रक के चौड़े पात्रों के बीच में रख-
२५८ रसतरङ्गिणी कर चारों तरफ से बन्द कर दें और एक सिकोरे में रखकर दूसरे सिकोरे से ढक कर अच्छी तरह बेर के पत्तों के कल्क से सन्धिलेप करके सुखा लें । अब इस प्याले या सिकोरों के सम्पुट को वालुकायन्त्र के बीच में रखकर तीन घंटे मध्यम- मध्यम अग्नि देकर पकायें । यन्त्र के स्वांगशीत होने पर संपुट को निकाल अभ्र- कपत्रों के बीच में से माणिक्यमणि के सदृश हरे वर्ण के रस को निकाल लें । इस रसमाणिक्य की दो रत्ती मात्रा प्रतिदिन प्रयोग करने पर भयंकर वातरक्त, भयंकर फिरंग, अनेक प्रकार के कुष्ठ, नाड़ीव्रण, भगन्दर तथा नासिका और मुख में होनेवाले रोग अवश्य नष्ट हो जाते हैं ॥ ८३-८६ ॥ द्वितीयं रसमाणिक्यम् विमलं पत्रतालन्तु द्रवैः कूष्माण्डसम्भवैः । विभावयेत्सप्तवारं दध्ना चाम्लेन वा तथा ॥ ६० ॥ प्रक्षाल्य तप्ततोयेन यत्नतश्चूर्णयेद्भिषक् । माषद्वयोन्मितं तालं न्यसेन्मध्येऽभ्रपत्रयोः ॥६१॥ अङ्गाराग्नौ निधायाथ वङ्कनालेन धुक्षयेत् । माणिक्याभं भवेद्यावत् पचेत्तावत् प्रयत्नतः ॥ ९२ ॥ अङ्गारानपसार्याथ रसमाणिक्यमुद्धरेत् । वारं वारं ततश्चैवं कृत्वा माणिक्यमाहरेत् ॥ ६३ ॥ अथापरः प्रकारः अभ्रपत्रमध्ये तालकं स्थापयित्वा स्वल्पेष्वप्यङ्गारेषु पाको विधीयते । माषद्वयोन्मितमित्यल्पपरिमाणग्रहणं पाकसौकर्यार्थम् । अभ्रपत्रञ्च प्रत- नुकं व्रणरहितं श्वेताभ्रकीयं ग्राह्यम् । प्रतनुकपत्रे सम्यक् पाको भवति वारं वार- मिति प्रभूततालस्य पाको भागद्वयविभागद्वारा विधेयः ॥६०-६३॥ भा.टी.—स्वच्छ वर्की हरताल को लेकर पेठे के स्वरस तथा खट्टे दही के साथ सात भावना देवें, अन्त में गरम जल से अच्छी तरह धोकर सुखा लें और इसका मोटा-मोटा सा चूर्ण बना लें। अब इसमें से दो मासे चूर्ण लेकर अभ्रक के पत्तों के बीच में रखकर इसको चारों तरफ बन्द करके कोयलों की अग्नि में तपायें और वंकनाल (फूंकनी ) से अग्नि दीप्त करते जायँ । जब हरतल चूर्ण का वर्ण अभ्रकपत्रों के बीच में माणिक्य के सदृश हो जाय तो इस पत्रसम्पुट को अग्नि में से नीचे उतार लें और पत्रों के बीच के माणिक्य को निकालकर पुनः उन पत्रों में हरताल चूर्ण रखकर बन्द करें और अग्नि में पकायें। इस प्रकार सब हरताल का माणिक्यरस बना लें ॥ ६०–६३ ॥
एकादशस्तरङ्गः २५६ वक्तव्य—शुद्ध हरताल के चावलों के बराबर टुकड़ों को अभ्रकपत्रों के बीच में बराबर रखकर पत्रों के किनारे को पहिले सुई-तागे से सी दें, पश्चात् इसको गीले आटे से लेप करके सुखा लें। अब इस पत्र सम्पुट को जलते हुए कोयलों पर रखें और देखते जायँ । जब पत्रों के बीच में धुआँ उड़कर बन्द हो जाय और हरताल लाल-काला सा दीखने लगे तो तुरन्त चिमटे से पत्रसम्पुट को उठाकर दूसरी तरफ लौटा लें और लालवर्ण का हरताल दीखने पर कोयलों से पृथक् करके हरताल को निकाल लें । तालकसत्त्वपातनस्य प्रथमः प्रकारः तालं पलद्वयमितं सौभाग्यं तत्समं हरेत् । भावयेन्मेषिकादुग्धैः कूष्माण्डसलिलैस्ततः ॥ ९४ ॥ कुमारीस्वरसेनाथ निम्बूकस्य द्रवेण च । ततः समन्तदुग्धायाः पयसा तु विभावयेत् ॥ ९५ ॥ विभाव्य च रविच्छीरैः रुबुतैलेन पेषयेत् । मध्वाज्येनापि सम्पेष्य वटकान् कारयेत्ततः ॥ ९६ ॥ काचकुप्यां निधायाथ वालुकायन्त्रमध्यगम् । मन्दाग्निनैव नियतं पचेद्दिनचतुष्टयम् ॥९७॥ स्वतः शीतं समुद्धृत्य विमलं कुलिशप्रभम् । ऊर्ध्वलग्नं तालसत्त्वं कूपीं भित्त्वा समाहरेत् ॥ ९८ ॥ तालकसत्त्वपातनस्य प्रथमः प्रकारः—तालं १६ तो०, टङ्कणं मेषीदुग्धकूष्मा- एडकुमारीनिम्बू रसैः सेहुण्डदुग्धेन अर्कक्षीरेण एरण्डतैलेन मधुना घृतेन च पेष- येत् । गोलकान् विधाय वालुकायन्त्रे मन्दाग्निना पचेत् । कुलिशप्रभं हीरक- सदृशं चाकचक्ययुक्तमित्यर्थः, तालसत्त्वमाददीत ॥ ९४–९८ ॥ भा.टी.—दो पल शुद्ध हरताल और दो पल सुहागा दोनों एकत्र लेकर भेड़ के दूध में, पेठे के स्वरस में, घीकुआर के रस में, निम्बू के रस में और थूहर के दूध तथा आक के दूध में घोटकर अन्त में एरण्डतैल और मधु तथा घृत के साथ मर्दन करके इसकी बड़ी-बड़ी गोलियाँ बना लें । अब सूखी हुई गोलियों को एक कपड़मिट्टी की हुई काँच की शीशी में भरकर वालुकायन्त्र में मन्द-मन्द अग्नि से चार दिन तक निरन्तर पकावें । स्वांगशीत होने पर शीशी के ऊर्ध्व भाग में लगे हुए वज्र के सदृश कठोर चमकीले हरतालसत्त्व को कूपी को फोड़कर निकाल लें ॥ ९४–९८ ॥
२६० · रसतरङ्गिणी द्वितीयः सत्त्वपातनप्रकारः कूष्माण्डरससंशुद्धं तालं पलचतुष्टयम् । कुमारीस्वरसेनेह भावयेद्दिनसप्तकम् ॥९६॥ आतपे त्वथ संशोष्य चूर्णयेद्भिषजां वरः । काचकुप्यां निधायाथ वालुकायन्त्रगं पचेत् ॥ १०० ॥ दिनानि सप्त नियतं विधानज्ञो भिषग्वरः । ऊर्ध्वलग्नं तालसत्त्वं पीताभं तु समाहरेत् ॥ १०१ ॥ भागोऽष्टमस्तु गुञ्जायाः प्रयोक्तव्यो विधानतः । कुष्ठादौ योजयेद्धीमान् श्वित्रकुष्ठे विशेषतः ॥१०२॥ द्वितीयः सत्त्वपातनप्रकारः सुगमः । तत्र हि पीताभं तालकसत्त्वं भवतीतं विशेषः । सत्त्वस्य भक्षणयोग्या मात्रा गुञ्जाष्टमो भागः ॥ ९६-१०२ ॥ भा.टी.—पेठे के स्वरस में शुद्ध किया हुआ हरताल चार पल लेकर उसे सात दिन तक कुमारीस्वरस में डालकर भावना दें । सात दिन के बाद निकाल धूप में सुखाकर चूर्ण कर लें । अब इसको उक्त विधि से कांच की शीशी में भर कर बालुकायन्त्र में निरन्तर मन्द-मन्द अग्नि से सात दिन तक पकावें । तदनन्तर स्वांगशीत होने पर शीशी को तोड़कर उसके ऊर्ध्व भाग में लगे हुए पीताभ सत्त्व को निकाल लें । इस सत्त्व की रत्ती का आठवाँ भाग मात्रा का प्रयोग कुष्ठ आदि रोगों में विशेषतः सफेद कोढ़ में करना चाहिये ॥ ९६-१०२॥ तालकविकारे भैषज्यम् ससितं जीरकक्षोदं कूष्माण्डस्वरसन्तु वा । अशनीयात्तालविकृतौ त्रिवारं त्वेकवासरे ॥ १०३॥ तालविकारे सति तस्य शमनाय भेषज्यं जीरकचूर्णं कूष्माण्डरसो वा ॥१०३॥ भा. टी.—वर्की हरताल या हरताल के योगों के सेवन से शरीर में कोई विकार उत्पन्न हो जाय तो उनका प्रभाव दूर करने के लिये पेठे के स्वरस में मिश्री और जीराचूर्ण मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करना चाहिये ॥१०३॥ अथ मनःशिलाया नामानि मनःशिला रोगशिला शिला नैपालिका तथा । मनोगुप्ता मनोज्ञा च मनोह्वा नागजिह्विका ॥ १०४ ॥
कुनटी कुलटी गोला नागमाता च सा मता । कल्याणिका च सैवेह कथिता रसनेत्रिका ॥ १०५ ॥ अथ मनःशिला—नैपालिका, तद्देशजातत्वात् ॥ १०४-१०५ ॥ भा.टी.—मनःशिला, रोगशिला, शिला, नैपालिका, मनोगुप्ता, मनोज्ञा, मनोहा, नागजिह्विका, कुनटी, कुलटी, गोला, नागमाता, कल्याणिका, रस- नेत्रिका; ये सब नाम मैनसिल के कहे जाते हैं ॥ १०४-१०५ ॥ शोधनोचितशिलायाः स्वरूपम् मनःशिला शिलाखण्डशून्या रक्तोत्पलप्रभा । भारे गुरुतरा दीप्ता शोधनार्हा मता बुधैः ॥ १० ॥ उत्तममनःशिलापरिचयः—दीप्ता सचकचकया, शोधनार्हा ग्राह्येत्यर्थः॥१०॥ भा.टी—शोधन के योग्य मैनसिल पत्थर-कंकड़ रहित, लाल कमल के सदृश प्रभावानी, वजन मे भारी और चमकीली होनी चाहिये ॥ १०६ ॥ अशोधितमनःशिलाया दोषाः मनःशिला त्वशोधिता प्रमादतस्तु शोलिता । हरेद्बलं हि चारुता विनश्यतीह त्वग्गता ॥ १०७ ॥ अशोधिता रोगशिला मलविष्टम्भकारिणी । मूत्ररोधकरी कामं मूत्रकृच्छ्रप्रवर्तिनी ॥ १०८ ॥ अशोधिता शिला मलविष्टम्भकरी मूत्ररोधो मूत्रकृच्छ्रं वेति विकल्पः समुच्चयो वा यथासम्प्राप्तिर्भवति ॥ १०७-१०८ ॥ भा.टी.—यदि अशुद्ध मैनसिल को गलती से सेवन कर लिया जाय तो इसके द्वारा शारीरिक बल तथा त्वचा की सुन्दरता नष्ट हो जाती है । यही नहीं बल्कि अशुद्ध मैनसिल से मलविष्टम्भ, मूत्ररोध ( मूत्र रुकना ) तथ मूत्रकृच्छ्र- रोग हो जाता है ॥ १०७-१०८ ॥ मनःशिलायाः प्रथमः शोधनप्रकारः सुधोदके निपातिता मनःशिला तु चूर्णिता । दिनत्रयाद्विनिर्गता भवेत्तु दोषवर्जिता ॥ १०६ ॥ चूर्णोदके दिनत्रयं निमग्ना शुध्यति ॥ १०६ ॥ भा.टी.—मैनसिल के चूर्ण को चूने के पानी में दो दिन रखे रहने से यह शुद्ध हो जाती है ॥ १०६ ॥
२६२ रसतरङ्गिणी द्वितीयः शोधनप्रकारः भृङ्गराजरसेनेह दोलायन्त्रे विपाचिता । चतुर्यामं रोगशिला शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ११० ॥ भृङ्गरसे यामचतुष्टयं स्विन्ना च शुध्यति ॥ ११० ॥ भा.टी.---मैनसिल को पोटली में बाँधकर इसको दोलायन्त्र में भांगरा- स्वरस डालकर चार पहर तक पकाने से यह शुद्ध हो जाती है ॥ ११० ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः बीजपूररसेनेह भाविता तु मनःशिला । सप्तवारं विधानेन विशुध्यति न संशयः ॥ १११ ॥ बीजपूरो निम्बूकविशेषः ॥ १११ ॥ भा.टी.---मैनसिल को सात भावना बिजौरा नींबू के रस की देकर अन्त में उसे जल से धोकर सुखा लेने से वह शुद्ध हो जाती है ॥ १११ ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः जयन्तीस्वरसेनेह दोलायन्त्रे विपाचितः । चतुर्यासं विधानेन विशुध्यति मनःशिला ॥ ११२ ॥ जयन्ती 'जइता' इति भाषायाम् ॥ ११२ ॥ भा.टी.---जयन्ती स्वरस को दोलायन्त्र में डालकर इसमें मैनसिल की पोटली को चार पहर तक स्वेदन करने से भी यह शुद्ध हो जाती है ॥११२॥ पञ्चमः शोधनप्रकारः अगस्त्यपत्रस्वरसैर्भावयेत्सप्तवारकम् । मनःशिला प्रयत्नेन शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ११३ ॥ अगस्त्यः तदाख्यः पुष्पतरुः प्रसिद्धः ॥ ११३ ॥ भा.टी.---अगस्त्य पत्तों के स्वरस में मैनसिल की सात भावना देकर सुखा लेने से वह शुद्ध हो जाती है ॥ ११३ ॥ षष्ठः शोधनप्रकारः आर्द्रकस्वरसेनेह मनोगुप्तां हु भावयेत् । सप्तवारं विधानेन शुद्धिमाप्नोति सर्वथा ॥ ११४ ॥ भा.टी.---मैनसिल को अदरख की सात भावना देकर सुखा लें तो वह अच्छी तरह शुद्ध हो जाती है ॥ ११४ ॥
एकादशस्तरङ्गः २६३ अथ मनःशिलाया गुणाः मनःशिला कटुस्तिक्ता स्निग्धोष्णा लेखनी गुरुः । कासश्वासहरा कामं भूतोपद्रवनाशिनी ॥११५॥ अग्निमान्द्यक्षयानाहहन्त्री कण्डूतिनाशिनी । रसायनी ज्वरहरा वर्ण्या कामं विषापहा ॥११६॥ भूतोपद्रवा जीवाणुजाता व्याधयः । वर्ण्या वर्णप्रसादनी ॥११५-११६॥ भा.टी.—मैनसिल रस में कटु और तिक्त होती है। गुणों में स्निग्ध, उष्ण और गुरु होती है। यह लेखन (शोथ आदि में कफ को पतला कर निकालना) कार्य करती है। कास और श्वास रोगों में लाभदायक है, जीवाणुजन्य रोगों को नष्ट करती है। इसके अतिरिक्त अग्निमान्द्य, क्षय तथा अफरा, कब्ज और कण्डू को मिटाती है। यह नियमपूर्वक शुद्ध रूप में सेवन करने से हरताल की भाँति शरीर में रसायनकार्य करती है। पुराने ज्वरों और नवीन ज्वरों में लाभदायक, त्वचा के रोगों को नष्ट करके उसकी सुन्दरता को बढ़ाती है और विषनाशक है ॥११५-११६॥ विशुद्धमनःशिलाया मात्रा तत्त्वांशतो रक्तिकायाः कलांशप्रमितां तथा । शिला मात्रा विनिर्दिष्टा काशीनाथभिषक्तमैः ॥११७॥ अथास्या मात्रा—तत्त्वांशतो रक्तिकाया इति चतुर्विंशत्यंशत इति भावः । कलांशप्रमितां षोडशभागमिताम् ॥ ११७ ॥ भा.टी. - शुद्ध मैनसिल की मात्रा रत्ती के ३२ वें भाग से लेकर सोलहवें भाग तक रोगी के बलाबल को देखकर प्रयुक्त की जा सकती है ॥ ११७ ॥ अस्यामयिकः प्रयोगः वासकस्वरसोपेता त्र्यूषणक्षौद्रसंयुता । मनःशिला शीलिता तु कासं श्वासं व्यपोहति ॥११८॥ पिप्पलीमरिचोपेता धारिणाञ्जनयोगतः । नैपालिका तु नियतं नाशयेद्विषमज्वरान् ॥११९॥ वैदेहीनिम्बबीजोत्थचूर्णोपेता मनःशिला । कारवेल्लोर सैर्लीढा त्रिदोषज्वरहारिणी ॥१२०॥ सैन्धवमरिचमनोज्ञाशंखैः क्रमवृद्धभागसंमिश्रैः । अपनयतीह निकामं नेत्रगदान् विधिवदुपयुक्ता ॥१२१॥ रसाञ्जनान्विता शिला कपोतगूथसंयुता । शिला सुपेषिताञ्जनात्त्वपस्मृतिं विनाशयेत् ॥१२२॥
२६४ रसतर्ङ्गिणी रजनीद्वयमञ्जिष्ठाक्षारक्षोदान्विता शिला । घृतक्षौद्रैः प्रलेपात्तु वर्ण्या त्वग्दोषनाशिनी ॥१२३॥ पिप्पलीनागरोपेता कपित्थरससंयुता । लाजान्विता तु मधुना लीढा छर्दिं विनाशयेत् ॥१२४॥ रोगयोग्यः प्रयोगः—त्र्यूषणक्षोदः त्रिकटुचूर्णम् । कपोतगूथं कपोतविष्ठा । क्षारक्षोदः यवक्षारचूर्णम् । अथ प्रसङ्गान्मनःशिलीयो माणिक्यरसः—शुद्धवर- नागस्याष्टौ तोलकानि, हिङ्गुलोत्थपारदस्याष्टौ तोलकानि, मनःशिलायाः शुद्धाया अष्टौ तोलकानि, शुद्धगन्धस्याष्टौ तोलकानि । वरनागं वह्निगलितं पारदेन सह सम्मेल्यातिश्लक्ष्णां पिष्टिं विधाय शिलागन्धाभ्यां सावधानतया पेषयेत् । वालुका- यन्त्रे षोडश यामान् विपचितो रससिन्दूराभो भवति माणिक्यो रसः । स च नागादिसम्पर्कजातो विशेषतः कफप्रधानं राजयक्ष्माणमाद्यावस्थायां दत्तो हन्ति । मात्रा रक्तिकार्द्धपर्यन्तमिति । योगोऽयं यक्ष्मचिकित्सासु रसमाणिक्यनाम्ना व्यवहृतः पूर्वैरिति ॥ ११८–१२४ ॥ भा.टी.—शुद्ध मैनसिल में त्रिकटुचूर्णा मिला वासास्वरस के साथ सेवन करने से कास-श्वास रोग में लाभ होता है । विषमज्वरों के वेग को रोकने के लिये मैनसिल में पिप्पलीचूर्ण मिला जल से पीसकर आंखों में अञ्जन किया जाता है । त्रिदोषप्रकोपजन्य ज्वरों को दूर करने के लिये मैनसिल में पिप्पली तथा निम्बबीजचूर्ण मिला करेले के पत्रस्वरस से गोली बनाकर प्रयोग किया जाता है । सेन्धानमक एक भाग, कालीमिर्च चूर्ण दो भाग, मैनसिल तीन भाग, शंखभस्म चार भाग लेकर, इनका बारीक चूर्ण करके अञ्जन बना लें, इसको आँखों में लगाने से नेत्र रोग नष्ट होते हैं । अपस्मार रोग में मैनसिल, रसौंत तथा कबूतर की विष्ठा, इनका अञ्जन बनाकर आंखों में लगाने से आराम आता है । त्वक् रोगों या त्वचा की खराबी में मैनसिल में हरिद्रा, मञ्जिष्ठाचूर्ण और यवक्षार मिला घी और शहद के साथ शरीर में लेप करने से आराम आता है । वमन रोकने के लिये मैनसिल को पिप्पली और सोंठ चूर्ण, और धान का लावा में मिलाकर कैथ के स्वरस तथा मधु के साथ चटाया जाता है ॥ ११८–१२४ ॥ अशुद्धमनःशिलाविकारे भेषज्यम् शिलाविकारोपहतः पिवेत्क्षीरं दिनत्रयम् । मधुना पथ्यसंयुक्तो वान्त्यादिभ्यो विमुच्यते ॥१२५॥
भा.टी.—अशुद्ध मैनसिल सेवन करने से यदि शरीर में कोई उपद्रव हो जाय तो रोगी को तीन दिन तक दूध में शहद मिला कर पिलावें और पथ्य- पूर्वक रक्खे तो वमन, तृष्णा आदि उपद्रव शान्त हो जाते हैं ॥ १२५ ॥ मनःशिलाया निर्माणप्रकारः विशोधितं शंखविषं मरुद्भागमितं तथा । विशुद्धं गन्धपाषाणं कलाभागिकमाहरेत् ॥ १२६ ॥ खल्वे निक्षिप्य यत्नेन चूर्णयेद्विषजां वरः । चूर्णितञ्चाथ विज्ञाय यन्त्रे डमरुकाभिधे ॥ १२७ ॥ पचेत्ततः स्वतः शीते कुनटीमुर्ध्वगं हरेत् । प्रयोजयेद्विधानेन मात्रा सर्षपसंमिता ॥ १२८ ॥ अथ मनःशिलानिर्माणप्रकारः—शङ्खविषं गौरीपाषाणकं ४६ भागमितम्, गन्धकस्य १६ भागाः । मात्रा तु सर्पपमिता ॥ १२६–१२८॥ भा.टी.—शुद्ध संखिया उनचास भाग, शुद्ध गन्धक सोलह भाग, दोनों को खरल में एकत्र सूक्ष्मचूर्ण करके डमरूयन्त्र में डालकर पकायें । स्वांग- शीतल होने पर यन्त्र के ऊपर की हांडी के भीतर लगी हुई मैनसिल को निकाल कर प्रयोगों में काम लायें । इसकी मात्रा एक सरसों के बराबर समझनी चाहिये ॥ १२६–१२८ ॥ मनःशिलायाः सत्त्वपातनम् गुडगुग्गुलुकित्टाज्यैस्त्वष्टमांशेन वै पृथक् । शिला मूषागता कोष्ठ्यां ध्माता सत्त्वं विमुञ्चति ॥ १२६ ।' किट्टं मण्डूरम् ॥ १२६ ॥ भा.टी.—मैनसिल में गुड़, गूगल, लौहकिट्ट (मण्डूर) और घी, ये सब आठवां भाग डाल कर मूषा में रख कर कोष्ठी में तपाने से मैनसिल का सत्त्व निकल आता है ॥ १२६ ॥ अथ शंखविषस्य नामानि शंखमूषं शंखविषं गौरीपाषाणकं तथा । दारुमूषं दारुमृषा दारुमोचञ्च मल्लुकः ॥ १३० ॥ फेनाश्मभस्मसंज्ञश्च सोमलः सम्बलं तथा । आखुपाषाणकं चैव रसज्ञैः परिकीर्तितम् ॥ १३१ ॥ अथ शङ्खविषनामानि तन्त्रे व्यवहृतानि । फेनाश्मभस्मेति सुश्रुततन्त्रनिर्दिष्टं
२६६ रसतरङ्गिणी नाम । तत्र हि धातुविषतया सङ्गृहीतमेतत् । उक्तं हि “फेनाश्मभस्म हरिताल- ञ्चेति धातुविषे” । क्वचिद् विकटनाम्नापि व्यवहृत इति ॥ १३०-१३१ ॥ भा.टी.—शंखमूष, शंखविष, गौरीपाषाण, दारूमूष, दारूमूषा, दारुमोच, मल्लक, फेनाश्मभस्म, सोमल, सम्बल, आखुपाषाण, इन नामों से संखिया शास्त्रों में व्यवहृत होता है ॥ १३०-१३१ ॥ शङ्खविषस्य द्वैविध्यम् मल्लस्तु द्विविधः प्रोक्तः श्वेतोऽन्यो रक्तकस्तथा । कृत्रिमः श्वेतमल्लस्तु रक्तश्चाकरसंभवः ॥ १३२ ॥ अथास्य भेदाः—श्वेतरक्तवर्णभेदेन मल्लो द्विधा इति सोऽयं द्वेधा विभागः योगरत्नाकराद्युक्त एव रसतन्त्रे व्यवहारार्थमनूदित आचार्यैः । तथाच योगरत्ना- करे “गौरीपाषाणकः प्रोक्तो द्विविधः श्वेतरक्तकः । श्वेतः शङ्खसदृग् रक्तो दाडि- माभः प्रकीर्तितः ॥ श्वेतः कृत्रिमकः प्रोक्तो रक्तः पर्वत-सम्भवः । विपरूपधरौ तौ हि रसकर्मणि पूजितौ ॥” इति । वस्तुतस्तु श्वेतरक्तपीतकृष्णभेदेन चतुर्विधः प्राप्यते मल्लः । तत्र श्वेत एव बहुव्यवहार्यः । इतरे तु क्वचिदेवेति विशेषः । अत्रापि सर्वत्र श्वेतमल्लस्यैव प्रयोगा निर्दिष्टा इति विभावनीयम् ॥ १३२ ॥ भा.टी.—संखिया के दो भेद माने गये हैं । १—श्वेत संखिया, २—रक्त (लाल) संखिया । इनमें से सफेद संखिया कृत्रिम (बनाया हुआ) और लाल संखिया खनिज होता है ॥ १३२ ॥ वक्तव्य—वास्तव में संखिया श्वेत रक्त पीत कृष्ण भेद से चार प्रकार का होता है । परन्तु इनमें से श्वेत मल्ल अधिक व्यवहार में आता है । अथ शङ्खविषस्य शोधनम् सुचूर्णितं शंखविषं दृढं वस्त्रेण रोधयेत् । मेघनादरसेनैव दोलायन्त्रे विपाचयेत् ॥ १३३ ॥ मृद्वग्निना दिनैकन्तु शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् । इत्थं विशोधितं शंखविषं यत्नेन योजयेत् ॥ १३४ ॥ अथास्या शोधनम्—मेघनादस्तण्डुलीयकः । कारवेल्लीरसेन शोधनं साम्प्र- दायिकम् । काञ्जिकेनापि दोलायन्त्रविधिना शुध्यति मल्लः ॥ १३३-१३४ ॥ भा.टी.—संखिया का मोटा-मोटा चूर्ण करके एक दृढ़ वस्त्र में अच्छी तरह बाँध कर पोटली बना लें । अब इस पोटली को दोलायन्त्र में चौलाई का
एकादशस्तरङ्गः २६७ का स्वरस डालकर उसमें दिन भर मन्द-मन्द अग्नि से पकायें तो संखिया शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार शुद्ध संखिया को सावधानी से काम में लावें ॥१३३-१३४ मल्लशोधनस्य द्वितीयः प्रकारः मल्लचूर्णं त्वाजरसैर्दोलायन्त्रे विपाचयेत् । दिनैकन्तु विधानज्ञो मल्लः शुद्धिंमवाप्नुयात् ॥१३५॥ भा.टी.—मल्ल के चूर्ण को पोटली में बांधकर बकरी के दूध अथवा मांस रस में दोला यन्त्र द्वारा एक दिन पकाने से वह शुद्ध हो जाता है ॥ १३५ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः कारवेल्लीरसेनेह दोलायन्त्रे दियामकम् । विपाचितं शङ्खविषं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥१३६॥ भा.टी.—संखिया को उक्तविधि से करेले के पत्ररस में दोलायन्त्र द्वारा पका लेने से भी वह उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥ १३६ ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः विपाचितं शङ्खविषं यत्नतष्टङ्कणाम्भसा । गव्यदुग्धेन वा यामं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥१३७॥ भा.टी.—संखिया को सुहागे के जल अथवा गोदुग्ध में दोलायन्त्र द्वारा पका लेने से भी वह उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥ १३७ ॥ विशुद्धमल्लस्य गुणाः गौरीपाषाणकः स्निग्धो दोषघ्नो रसबन्धकृत् । कफवातामयहरः वृश्चिकादिविषप्रणुत् ॥१३८॥ मासमात्रप्रयोगेण श्वासं परमदारुणम् । विविधानि च कुष्ठानि नाशयेन्नैव संशयः ॥१३९॥ श्लीपदोत्थज्वरध्वंसी प्रकामं कामवर्धनः । सन्धिवातगदद्वेषी फिरङ्गकरिकेशरी ॥१४०॥ अग्निमान्द्यहरः कामं विषमज्वरनाशनः । कान्तिप्रदः परं जीर्णपाण्डुरोगनिषूदनः ॥१४१॥ श्वासं प्रतमकं हन्ति चिरोत्थं त्वतिदारुणम् । द्रुतमारम्भवेलायां यक्ष्माणमपि नाशयेत् ॥१४२॥ हृच्छूलजं ज्वरोत्थञ्च हृद्दौर्बल्यं द्रुतं हरेत्। अतीसारं निहन्त्याशु मुक्तमात्रसमुत्थितम् ॥१४३॥