रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० रसतरङ्गिणी कुष्ठं सिध्माभिधं हन्ति मासमात्रप्रयोगतः ॥ २५ ॥ यवजः श्वेतवर्षाभूस्वरसेन निषेवितः । उरस्तोयाख्यहृद्रोगजनितां हन्ति वै रुजम् ॥ २६ ॥ यवजो निम्बुकद्रावैस्तिलचारयुतोऽशितः । बस्तिशूलं निहन्त्याशु मूत्ररोधञ्च नाशयेत् ॥ २७ ॥ शुण्ठीगोक्षुरवरुणाक्वाथनिपीतो यवक्षारः । सगुडन्नेपं त्वचिरात्नियतं वाताश्मरीं जयति ॥ २८ ॥ कूष्माण्डस्वरसोपेतं सगुडं यवशूकजम् । शीलितं नाशयेन्मूत्राघातं शुक्राश्मरीं तथा ॥ २९ ॥ पाषाणभेदवरुणगोक्षुरक्वाथसंयुक्तम् । शीलितं यवजं हन्ति बस्तिशूलं तथाश्मरीम् ॥ ३० ॥ सारिवाक्वाथसंयुक्तो यवक्षारस्तु शीलितः । औपसर्गिकमेहोत्थां बाधमाशु विनाशयेत् ॥ ३१ ॥ दशमूलकषायेण यवक्षारः ससैन्धवः गुल्मं शूलं च हृद्रोगं कासं श्वासञ्च नाशयेत् ॥ ३२ ॥ यवक्षारस्य रोगयोग्यः प्रयोगः—मक्कलशूलनाशाय सुश्रुतोक्तपिप्पल्यादिगण- क्वाथेन सह यवक्षारो बहुधा दीयत इत्यवधेयम् । जरणं जीरकम् । शीतलेन जलेन त्रिवारमेकवासरे दत्तो यवक्षारोऽण्डशोथमपि पूयमेहजं हन्ति ॥१०-३२॥ भा.टी.—मक्कलशूल (प्रसव के अनन्तर गर्भाशय में रक्त रुक जाने से उत्पन्न होनेवाले शूल को मक्कल कहते हैं) में जवाखार को केवल गरम जल से अथवा घी के साथ देने से आराम आता है । जीरा और त्रिकटुचूर्ण में मिलाकर यवक्षार को भोजन के पहिले और भोजन के अन्त में प्रयोग करने से अग्निवृद्धि और पाचन क्रिया बढ़ती है । रोहिड़ाचूर्ण अथवा सर्पोखाचूर्ण मिला- कर यवक्षार को गुल्म तथा प्लीहा रोग में देने से लाभ होता है । बस्तिशूल में यवक्षार को कालीमिर्च और सोंठचूर्ण के साथ दो-तीन बार गरम पानी से देने पर आराम आ जाता है । छोटी इलायचीबीजचूर्ण और खाँड़ के साथ यवक्षार को देने से दाह शोथ आदि लक्षणयुक्त मूत्रकृच्छ्र में आराम आता है । मल- अवरोधजन्य मूत्रकृच्छ्र में यवक्षार को गोखुरकषाय के साथ दिया जाता है । साधारणतः मूत्रकृच्छ्र तथा अश्मरी की आशंका या प्रथमावस्था में यवक्षार को तक्र के साथ प्रयोग करने से लाभ होता है । मूत्रकृच्छ्र आदि रोगों में यवक्षार