रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 337, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशस्तरङ्गः ३११ में खाँड़ मिला पेठे के स्वरस के साथ दिया जाता है। वातप्रकोपजन्य उदररोग में यवक्षार को अजवाइन, त्रिकटु और पिप्पलीचूर्ण के साथ प्रयोग करने से शीघ्र आराम आता है। प्लीहावृद्धि शूल में यवक्षार को हिंगु और त्रिकटुचूर्ण कूठचूर्ण और सैन्धानमकचूर्ण के साथ मिलाकर बिजौरानींबू के स्वरस से सेवन कराया जाता है। यवक्षार को केवल नींबू स्वरस के साथ प्रयोग करने से मूत्र तथा पसीना अधिक आता है और ज्वर उतर जाता है। त्रिदोषप्रकोपजन्य उदरशूल में यवक्षार को शंखभस्म, त्रिकटुचूर्ण और सैन्धानमकचूर्ण में मिला कर गरम पानी के साथ देना चाहिये। बहुमूत्र (अधिक मूत्र आना) में यव- क्षार को वासास्वरस के साथ प्रयोग करने से आराम आता है। यवक्षार को कुछ दिन तक बबूल के स्वरस अथवा उसके गोंद के साथ सेवन करने से सुजाक में शीघ्र ही आराम आता है। पार्श्वशूल (पसली का दर्द), बस्तिशूल (मसाने का दर्द) तथा हृदयशूल में यवक्षार को सहिजने के कषाय और मधु के साथ सेवन किया जाता है। यवक्षार को कुछ दिन लगातार कडुवे तेल के साथ लेप करने से सिध्मकुष्ठ शान्त हो जाता है। जलयुक्त उरस्तोय (प्लूरिसी) के कारण होनेवाली हृदयपीड़ा में यवक्षार को सफेद फूलवाली पुनर्नवास्वरस के साथ सेवन करने से शीघ्र आराम आता है। यवक्षार में तिलक्षार मिलाकर नींबू के साथ सेवन करने से बस्तिशूल और मूत्ररोध (पेशाब रुकना) दूर हो जाता है। वाताश्मरी में यवक्षार को सोंठ, गोखरू, वरनाकषाय में गुड़ डाल कर इस अनुपान से सेवन कराने पर शीघ्र लाभ होता है। मूत्राघात (पेशाब रुक कर आना) तथा शुक्राश्मरी के लिए यवक्षार को पेठे के स्वरस में गुड़ मिला इस अनुपान से सेवन कराया जाता है। बस्तिशूल तथा अश्मरी के लिए यवक्षार को, पाषाणभेद, वरना तथा गोखरूकषाय के साथ प्रयोग किया जाता है। यवक्षार को सारिवा (अनन्तमूल) क्वाथ के साथ सेवन करने से सुजाक में होनेवाले कष्टों को आराम आता है। यवक्षार में सैन्धानमक मिला इसको दशमूलकषाय से सेवन करने पर गुल्म, शूल, हृदयरोग, कास तथा श्वास रोगों में आराम आता है ॥ १०-३२ ॥ अथ निम्बूकाम्लीययवजस्य नामानि निम्बूकाम्लीययवजो निम्बूकाम्लीयशूकजः । निम्ब्वम्लीययवक्षारः स एव परिकीर्तितः ॥ ३३ ॥ भा.टी.-निम्बूकाम्लीय यवज, निम्बूकाम्लीय शूकज, निम्ब्वम्लीय यवक्षार, ये सब नाम निम्बूकाम्ल तथा जवाखार के योग से बनाये गये खार के हैं॥३३॥