भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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३१२ रसतरङ्गिणी अस्य निर्माणप्रकारः काचपात्रे यवक्षारं चतुर्विंशतिभागिकम् । द्रावयेच्छीतसलिले रसज्ञः समभागिके ॥ ३४ ॥ निम्बूकाम्लं सुविमलं त्वथ विंशतिभागिकम् । द्रावयेदन्यपात्रस्थं जले तु समभागिके ॥ ३५ ॥ पात्रे काचादिलिप्ते तु मेलयेदनयोर्द्रवम् । चुल्ल्यां निधायाथ पचेत्तोयांशं परिशोषयेत् ॥ ३६ ॥ घनसारप्रभं चूर्णं रसविज्ञः समाहरेत् । विबुधैः कीर्तितोऽयं तु निम्बूकाम्लीयशूकजः ॥ ३७ ॥ अथ निम्बूकाम्लीययवजो नवीनपरिभाषितो बहुलगुणश्च—निर्माणप्रकारो व्याख्यातप्रायः । निम्बूकाम्लं प्रागुक्तम् । काचादिलिप्त इति आदिशब्दाद्वङ्गादिलिप्ते पित्तल- पात्रेऽपीति ज्ञेयम् । घनसारप्रभं अत्यच्छत्वात् कर्पूरकान्ति ॥ ३४-३७ ॥ भा.टी.—एक काँच के पात्र में चौबीस भाग जवाखार डाल कर उसमें समभाग ठंडा जल मिलाकर घोल लें । अब एक दूसरे काँच पात्र में बीस भाग निम्बूकाम्ल ( Citric acid ) डाल उसको समभाग जल में घोल लें । अब इन दोनों घोलों ( द्रव ) की एक काँच के कलई किये हुए पात्र में मिला दें और चूल्हे पर रख कर अग्निताप से जलीय भाग को उड़ा दें । जलीयांश उड़ने पर पात्रतल में कपूर के सदृश वर्ण का चूर्ण रह जायेगा इसी चूर्ण को विद्वान् लोग निम्बूकाम्लीयशूकज कहते हैं ॥ ३४-३७ ॥ अस्य गुणाः निम्बूकाम्लीययवजो मूत्रलः श्लेष्मभेदनः । ज्वरघ्नः स्वेदजनको जलोदरहरः परम् ॥ ३८ ॥ वृक्कशोथप्रशमनो विशेषाद् वृक्कशूलनुत् । मूत्ररोधहरः कामं तथा श्लैष्मिककासनुत् ॥ ३६ ॥ भा.टी.—निम्बूकाम्लीय यवज, मूत्र अधिक लानेवाला, कफ को पतला कर निकालनेवाला, ज्वरनाशक, स्वेदजनक, जलोदर-रोगहर है । यह वृक्कों में होनेवाली सूजन को विशेषतः वृक्कशूल को शान्त करता है और मूत्र के अव- रोध तथा कफकास को दूर करता है ॥ ३८-३६ ॥