रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७० रसतरङ्गिणी अभीष्ट हो तो स्वर्ण लवण का प्रयोग करने में सुविधा रहती है । स्वर्ण लवणस्य गुणाः सुवर्णलवणं वृष्यं दोषत्रितयकोपजित् । तुवरं स्वादु तिक्तञ्च सलिले च द्रवीभवेत् ॥ ३६ ॥ पुष्पावरोधं मधुमेहबाधां चिरन्तनञ्चापि फिरङ्गरोगम् । अपस्मृतिं श्वासमथोग्रवेगं क्लैब्यं तथोन्मादमलं निहन्यात् ४० अलं अत्यर्थम् । इदं अजीर्णजनिते चिरन्तने आध्मानेऽपि सहस्रशो दृष्ट- फलम् ॥ ३६, ४० ॥ भा.टो.—स्वर्ण लवण, वृष्य और त्रिदोषप्रकोपशामक होता है । यह स्वाद में मधुर, कषाय और तिक्तरस होता है और जल में डालने से यह घुल जाता है । इसके सेवन से स्त्री का रुका हुआ मासिकधर्म आने लगता है । मधुमेह में लाभदायक और पुराने फिरंग रोग में जब कि शरीर में वातप्रकोप से भ्रम, मूर्छा, आक्षेप आदि लक्षण उत्पन्न हो गये हों तो इसका प्रयोग लाभ करता है । अपस्मार, भयंकर श्वास रोग, नपुंसकता तथा उन्माद रोगों को नष्ट करता है ॥ ३६, ४० ॥ वक्तव्य—पुराने अजीर्ण तथा आध्मान के कारण जिन स्त्रियों में हिस्टे- रिया का वेग आने लगता है अथवा जिन मनुष्यों को भोजन के बाद वायु ऊपर को चढ़ कर शिर में चक्कर से आने लगते हैं उन अवस्थाओं में अत्यन्त लाभ करता है । सुवर्णलवणस्य मात्रा खशरांशार्द्रुक्तिकाया विंशांशप्रमितं शुभम् । युञ्जीत स्वर्णलवणं बलकालाद्यपेक्षया ॥ ४१ ॥ खशरांशः १/५० पञ्चाशत्तमो भागः, तस्मादारभ्य १/२० विंशतिभागपर्य्यन्तं मात्रास्य ॥४१॥ भा. टी.—बल काल आदि का निर्णय करके सुवर्ण लवण को रत्ती के पचासवें (१/५०) भाग से लेकर बीसवें (१/२०) भाग तक दिया जा सकता है ॥४१॥ अस्य प्रयोगक्रमः सुवर्णलवणं गुञ्जोन्मितं खलु समाहरेत् । सार्द्धतोलकद्वयमिते जले संद्रावयेद्भिषक् ॥ ४२ ॥ तस्माज्जलाद्भिषग्वर्य्यो बिन्दून् भास्करसंख्यकान् । तत्तन्निर्दिष्टरोगेषु विधानज्ञः प्रयोजयेत् ॥ ४३ ॥