रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 404, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें३७८ रसतरङ्गिणी होते हैं और शरीर में ओज की वृद्धि होती है। इसके अतिरिक्त स्वर्णभस्म अतीसार संग्रहणी तथा पाण्डुरोगों को भी विभिन्न योगों के रूप में प्रयोग करने पर शान्त करती है ॥ ७१-७८ ॥ ( और भी ) स्वर्णभस्म के सेवन से शरीर में बढ़ी हुई प्रसाद वायु (Nerves forces) की उत्तेजनात्मक क्रिया शान्त हो जाती है और क्षीण हुई प्रसाद वायु पुष्ट होकर शारीरिक कार्य सुचारु रूप से करने लगती है और सामावस्था की वायु सम रहकर शरीर के लिये हितकर कार्य करती रहती है। क्षीणबुद्धि तथा क्षीण स्मृतिशक्तिवाले और प्रतिदिन क्षीणता की ओर जानेवाले मनुष्यों के लिये स्वर्ण परम उपयोगी औषधि है ॥ ७६, ८० ॥ वक्तव्य—स्वर्णभस्म राजयक्ष्मा की सर्वोत्तम औषधि मानी जाती है। आयुर्वेद का यह विचार है कि स्वर्ण में क्षयकीटाणुनाशक धर्म बहुत ही प्रबल है। अतः इसको क्षय की प्रथम तथा द्वितीय अवस्था में प्रयोग करने से उत्तम लाभ देखा जाता है। परन्तु स्वर्ण के प्रयोग में यह बात अवश्य ध्यान में रखनी चाहिये कि स्वर्ण के प्रयोग से शारीरिक ताप बढ़ जाता है। अतः ताप की वृद्धि पहिले से ही ६६ डिग्री से अधिक हो तो स्वर्ण प्रयोग से और भी बढ़ने लगता है; घटता नहीं है। कारण कि इसके प्रयोग से क्षयकीटों का शीघ्रता से नाश हो जाता है, शारीरिक प्रतिक्रियात्मक शक्ति बहुत तीव्र हो जाती है जिससे तापमान घटने के स्थान में बढ़ता हुआ मालूम पड़ता है। ६६ से अधिक ताप होने पर स्वर्ण देने से क्षय के नाश से शरीर में एक और विष उत्पन्न हो जाता है। ऐसी अवस्था में क्षयकीट विष और उनके नाश से उत्पन्न दो प्रकार के विषों की उपस्थिति में स्वर्ण से तापमान की वृद्धि हो जाती है। अतः क्षयरोग में ज्वर तीव्र होने पर स्वर्ण का प्रयोग लाभ- दायक नहीं होता है। अतः आन्त्रक्षय में जब शोथ और ग्रन्थियाँ आरम्भ हों, फुफ्फुसीय यक्ष्मा में जब शुष्ककास दुर्बलता अनुभव होने लगे तो स्वर्ण का सेवन अत्यन्त लाभदायक होता है। अथवा बिना रोग के शरीर का भार घटने लगे तो ऐसी अवस्था में स्वर्ण अमोघ औषधि समझनी चाहिये। इसके सेवन से यदि तापवृद्धि या तापोत्पत्ति होने लगे तो इसकी मात्रा कम कर देनी चाहिये अथवा कुछ दिनों के लिये बन्द कर देनी चाहिये। स्वर्ण के क्षयनाशक अद्भुत गुण को देख कर अब एलोपेथी-चिकित्सापद्धति ने भी