भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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इसे पूर्णरूप से स्वीकार कर लिया है। इसके लिये Gold Bromide, Gold chloride और Sanocrysin आदि स्वर्ण के योग व्यवहार में लाये जाने लगे हैं। स्वर्ण के विषय में आजकल बहुत से मनुष्यों की यह गलत धारणा देखी जाती है कि "वह गरम होता है"। यह आजकल के अनुभव से तथा प्राचीनकाल के वैद्यक से सदा से ही शीतगुण द्रव्य है। रसरत्न- समुच्चय, आयुर्वेदप्रकाश आदि सभी रसग्रन्थों में इसको शीत ही माना है और इसका दो प्रकारसे उपयोग बतलाया है—"अपक्वमपि संशुद्धं पक्वं तत्तु रसायनम्"। इसके देने से ज्वर में जो तापवृद्धि होती देखी जाती है यह इसके द्वारा रोगजनक कीटाणु के सहसा नाश के कारण उत्पन्न होनेवाले विष से समझनी चाहिये। सुवर्णभस्मनो मात्रानिरूपणम् समारभ्याष्टमाद् भागाद् रक्तिकाया भिषग्वरः। योजयेत्तुर्यभागान्तं मृतं स्वर्णं तु कालवित् ॥८१॥ मात्रानिर्माणं बलकालापेक्षया योग्यम्। यद्यपि प्राचीनतन्त्रेषु "यववृद्ध्या प्रयोक्तव्यं हेम गुञ्जाष्टकम्" इत्युक्तम्, तथापि तन्नाधुनोपयोगि इति सप्रौढि मात्रामानन्तरमुक्तमाचार्य्यैरिति। एवं सर्वत्र। तदेतत् ध्वनयति 'कालवित्' इत्यनेन पदेन ॥ ८१ ॥ भा.टी.—रोग तथा रोगी का बल तथा कालादि का विचार करके रत्ती के आठवें भाग ( १/८ ) से लेकर रत्ती के चौथाई भाग ( १/४ ) तक स्वर्णभस्म का प्रयोग करना चाहिये ॥ ८१ ॥ अस्या आमयिकः प्रयोगः बिल्वत्वक्स्वरसोपेतं रससिन्दूरसंयुक्तम्। सुवर्णं शीलितं यत्नान्नाशयेद्वातिकज्वरम् ॥८२॥ पर्पटस्वरसोपेतं रससिन्दूरमिश्रितम्। शीलितं तपनीयन्तु नाशयेत्पैत्तिकं ज्वरम् ॥८३॥ तुलसीरससंयुक्तं ससिन्दूरं निषेवितम्। काञ्चनं ह्याचिरादेव कफज्वरमपोहति ॥८४॥ सचौद्रं साभ्रकं स्वर्णं मृतं खलु निषेवितम्। अचिरादेव चिरजं जीर्णज्वरमपोहति ॥८५॥ बिल्वपेशिकया युक्तं सुवर्णन्तु सजीरकम्।