भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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हैं । इसके प्रयोग से पित्तप्रकोपजन्य रोग तथा प्रमेह आदि रोग दूर हो जाते हैं । शरीर में से वातप्रकोप को दूर करने के कारण वातिक संस्थान को स्वस्थ सबल और क्षोभ रहित करने के कारण यह आयुष्य कही जाती है । आँतों में वातप्रकोपजन्य विष्टब्धजीर्ण में यह विशेष लाभदायक है । मदात्यय के कारण होनेवाले सभी विकारों को दूर कर और अग्निमान्द्य को हटाती है । शरीरगत अनेक प्रकार के विषों को नष्ट करती है । ज्वर-विशेषतः पुरातन ज्वरों और प्लीहोदर रोग को शान्त करती है । क्षयरोग के लिये यह स्वर्ण समान ही क्षयनाशक है । नाड़ीशूल और अपस्मार के लिये बहुत उत्तम द्रव्य है । स्वर्ण के समान ही यह भी हृद्य है और उदररोगों को नष्ट करती है ॥ ४६-५१ ॥ वक्तव्य—जब किसी रोग के उपद्रव स्वरूप अथवा मधुमेह, प्रमेह सुजाक में उपद्रव स्वरूप शरीर के कीटाणु (घटक) शनैः शनैः घुलने लगे हों और दूषित अवयवों में दाह हो, शूल के साथ स्थानिक त्वचा काली पड़ गयी हो और कभी-कभी ज्वर भी हो जाया करता हो तो इस प्रकार के वातिक या वातपैत्तिक- दुष्टिजन्य कोथ (Gangren) में रजतभस्म का प्रयोग लाभकारी होता है । सुजाक, फिरंग के पश्चात् होनेवाली वातवाहिनियों के संकोच से होनेवाली नपुंसकता में भी रजतभस्म का अच्छा प्रभाव होता है । अम्लपित्त में भी रजत- भस्म का सेवन लाभकारी सिद्ध हुआ है । रजतनिष्क्रमण—रजत का निष्क्रमण मल (टट्टी द्वारा रजतगन्धी) (Silver Sulphide) के रूप में होता है जिससे मल का वर्ण काला भूरा- सा हो जाता है । इसके अतिरिक्त रजत आन्त्रस्राव तथा पित्त के द्वारा भी बाहर निकलता है और इसका कुछ अंश यकृत् तथा वृक्कों में सञ्चित पाया जाता है । विशिष्टा गुणाः मृतन्तु तारं शमयेन्नितान्तं प्रकोष्ठगं वातमतिप्रवृद्धम् । शाखाश्रयं पित्तमलं विवृद्धं जत्रूर्ध्वसंस्थञ्च कफं मलाख्यम् ॥५२॥ प्रक्षीणबुद्धिस्मृतिसाहसानां शिरोभ्रमेणातिविमोहितानाम् । अध्यापनादौ सुचिरं रतानां यूनां शिशूनाञ्च परं प्रशस्तम् ॥५३॥ विशेषगुणास्तु पूर्वाचार्यैरनुक्ता अपि अनुभूतचराः शिष्यमतिवैशद्याय प्रकटी- क्रियन्ते मृतन्तु तारमिति । निगद्व्याख्यातमन्यत् ॥ ५२, ५३ ॥ भा.टी.—रजतभस्म कोष्ठगत वायु की वृद्धि को अवश्य ही शान्त करता है और रस-रक्तादि धातुओं में सञ्चित पित्त तथा जत्रु (हँसली) से ऊपर के