भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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पृष्ठ 428

४०२ रसतरङ्गिणी डालें। अब इस सारकपत्र से छुने हुए द्रव की परीक्षा करे। इसकी परीक्षा के लिए पहिले एक सकोरे या काँच के पात्र में इस छुने हुए द्रव को लेकर उसमें थोड़ा-सा नौसादरवाष्पद्रव मिलायें। यदि नृसारवाष्पद्रव के योग से यह द्रव नीलवर्ण का हो जाय तो समझना चाहिये कि उक्त धौत (जल से धुला हुआ) रजत में अब भी कुछ ताँबे का अंश बाकी है। अतः उक्त रजत को तब तक जल से अच्छी तरह धोयें जब तक कि उसमें ताम्र का अंश न रह जाय। अब ताम्रांश रहित रजत को एक काँच के प्याले में डाल इसमें बहुत थोड़ा जस्ता (यशद) का चूर्ण डाल दें। और थोड़ी देर एकान्त में पड़ा रहने दें। इस तरह थोड़ी देर में रजत ताम्रादि धातुओं से रहित होकर काँचपात्र के तल प्रदेश में राख की तरह पड़ा हुआ मिलेगा; परन्तु इस रजतयुक्त पात्र को सात या आठ दिन तक इसी तरह रखे रहें। अब आठवें या नौवें दिन सारकपत्र से जल को छान कर पृथक् कर दें और राख के सदृश दिखाई देनेवाली चाँदी को उसी समय वर्षा जल अथवा प्रमृत जल से अच्छी तरह धो डालें। अब फिर भी सारकपत्र द्वारा छुने हुए जल की पुनः परीक्षा करें। परीक्षा के लिए इस जल को एक काँचपात्र में लेकर उसमें थोड़ा-सा नृसारवाष्पसंयुक्त जल डालकर देखें, यदि वह जल अब भी श्वेतवर्ण का हो तो चाँदी में एसिड का अंश समझकर उसे पुनः तब तक धोयें जब तक कि धोया हुआ जल परीक्षा में सफेद न निकले। अब एसिड अंश रहित रजत को एक काँच के प्याले में डालकर उसमें फिर सोरकाद्राव डालें और चाँदी को घोल लें। अब घुली हुई चाँदी को काँचपात्र में रख कर सुराप्रदीप की अग्नि पर पकायें, परन्तु इतनी तीव्र अग्नि न दें जिससे द्रव खौलने लगे। मन्द-मन्द रूप से पकाते हुए जब जलीयांश सूख जाय तो पात्र को नीचे उतार लें। इस विधि से शलाकाकार (लंबे पतले) चूर्ण के रूप में सोरकाम्लीय रजत (Silver Nitrate) प्राप्त होता है। अब इस सोरकाम्लीय रजत को एक नीलवर्ण की काँच की शीशी में अच्छी तरह डाट लगा कर रख लें। इसको श्वेत काँच की शीशी में रखने अथवा खुली रखने से सूर्यकिरणों के स्पर्श से यह काला पड़ जाता है। अतः इसे सदा सूर्य- किरणों के स्पर्श से बचा कर रखना उचित है ॥७६-१००॥ प्रसन्नान्नवसादरवाष्पद्रवस्य निर्माणप्रकारः सुदग्धं चूर्णपाषाणं वारि निर्वापितं भृशम् । द्विभागिक शुष्कचूर्णं भागिक नवसादरम् ॥ १०१ ॥