भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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षोडशस्तरङ्गः ४०३ चूर्णीकृतं प्रयत्नेन काचकूप्यां तु विन्यसेत् । त्रिपादिकायां विन्यस्य कूपीं कूपीमुखे ततः ॥१०२॥ मेलयेत्काचनलिकामुखमेकं प्रयत्नतः । अपरं च मुखं त्वस्या विन्यसेज्जलपूरिते ॥१०३॥ अन्यस्मिन्काचकूपे तु तोयमज्जनपूर्वकम् । ततस्त्रिपादिकाधस्तात्सुरादीपं प्रदीपयेत् ॥१०४॥ रसायनविधानज्ञस्तावन्मन्दाग्निना पचेत् । नृसारबाष्पं द्रवतां याति यावज्जले भृशम् ॥१०५॥ संजायते स्वच्छजलप्रकाशो द्रवः सुतीव्रः खलु चातिरम्यः । समीरितोऽयं भिषजां वरेण्यैर्नृसारबाष्पद्रवनामधेयः ॥१०६॥ प्रसङ्गान्नवसादरबाष्पद्रवस्य निर्माणप्रकारः—वारा जलेन । स्पष्टप्रायमन्यत् । काचनलिकामुखमन्यस्यां जलपूर्णायां काचकूप्यां जलनिमग्नं विधेयम् । एवं सति बाष्पं जललीनमेव भवतीति । सुतीव्रः आघ्राणादिना परिचेयः । अतिरम्यः स्वच्छत्वात् ॥१०१-१०६॥ भा. टी.—अच्छे चूने के पत्थर को आग में खूब पकाकर जब वह पककर फटने लगे तो उसे जल में बुझा दें और इसका चूर्ण खुश्क करके दो भाग ले लें । अब इस चूने के चूर्ण में एक भाग नौसादर का सूक्ष्म चूर्ण मिला एक काँच की शीशी में भर दें । अब इस शीशी को त्रिपादिका पर रखकर इस शीशी के मुख में एक काचनल्लिका का मुख अच्छी तरह जोड़ दें । इस नली के दूसरे मुख को एक दूसरी जल से भरी हुई और जल में ही रखी हुई काँच की शीशी के मुख से अच्छी तरह जोड़ दें । अब त्रिपादिका के नीचे सुराप्रदीप जलाकर मन्द-मन्द अग्नि जलायें, जिससे नौसादर की वाष्प उड़कर दूसरी कूपी के जल में मिल जाय । इस प्रकार नौसादर बाष्प उड़कर प्राप्त होनेवाला द्रव स्वच्छजल के सदृश सुन्दर और सूँघने में तीव्र होता है । इसी को वैद्य लोग नृसारवाष्पद्रव नाम से कहते हैं ॥१०१-१०६॥ नवसादरबाष्पद्रवस्य गुणाः नवसादरबाष्पोत्थद्रवोऽयमतिशोभनः । वरटीवृश्चिकादीनां विशेषाद्विषनाशनः ॥१०७॥ संमेल्य प्रचुरं तोयं रसायनपरीक्षणे । द्रवोऽयं विनियोक्तव्यो रसायनविशारदैः ॥१०८॥