रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०४ रसतरङ्गिणी भा. टी.—उक्त प्रकार से प्राप्त नवसादरवाष्पद्रव बाह्यलेप से ततय्या, बर्रें, हड्डा (बिरनी), बिच्छू आदि के विष को नाश करता है। इसमें पर्याप्त मात्रा में जल मिलाकर रख लें। इसके द्वारा रसायन परीक्षा अर्थात् शुद्ध अशुद्ध धातुओं की परीक्षा में अत्यन्त सुभीता रहता है। इसको अँग्रेजी में Liq. Ammonia कहते हैं ॥१०७-१०८॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः सजलोऽयं द्रवो युक्त्या भृशमाघ्रापितो द्रुतम् । विनाशयति मूर्च्छायां तत्तदुत्थानसम्भवम् ॥१०६॥ अथैतस्य गुणाः प्रयोगप्रकारश्च व्याख्यासमपाठः। मूर्छामित्युपलक्षणम् । कफजातां शिरोव्यथामपीति सोऽयममोनियाद्रव (Liq. Ammonia) इति नाम्ना नवीनैर्व्यवहृत इति ॥१०६॥ भा. टी.—उक्त नवसादरवाष्पद्रव में मिलाकर सुँघाने से अनेक कारणों से उत्पन्न होनेवाली मूर्च्छा, शिरोव्यथा, शिर का भारीपन आदि दूर होकर रोगी को होश आ जाती है ॥१०६॥ वक्तव्य—अमोनिया जल जिस स्थान पर मला जाता है वह लाल हो जाता है अर्थात् उस स्थान पर अधिक रक्त आ जाता है जिससे उसके नीचे होनेवाले शोथ-शूल में आराम आ जाता है। अमोनियाद्रव अथवा अमोनिया- द्रवकार्बोनित (Ammonia carbonate) सुँघाने से नासा की अंतःकला वेग से क्षुब्ध होती है और श्वास की वातनाड़ियाँ भी सहसा क्षुब्ध हो जाती हैं, जिससे शरीर के सारे नाड़ीमण्डल में एक क्षणिक उत्तेजना आ जाती है। यदि ऐसी अवस्था में रोगी अचेत हो तो चेतना हो जाती है। आमाशय में पहुँचकर अमोनिया या अमोनिया कार्बोनित् आदि आमाशय की वातनाड़ियों को सहसा उत्तेजित करते हैं। इनकी सहसा उत्तेजना से सारे शरीर की वातनाड़ियाँ उत्तेजित हो जाती हैं और रोगी को कुछ बल मालूम होता है। अमोनिया आमाशय के लिये उद्दीपक तथा उत्तेजक होने के कारण इसके योग अग्निदीपक होते हैं। अमोनिया सर्वांग उत्तेजक है, अतः श्वाससंस्थान के लिये उत्तेजक है। अतः श्वास में इसका शीघ्र और उत्तम प्रभाव होता है। निष्क्रमण—अमानिया शरीर से श्वास, श्लेष्मा और मूत्र के द्वारा बाहर निकलता है, अतः उक्त स्थान के रोगों पर इसका मुख्य रूप से प्रभाव होता है।