भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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षोडशस्तरङ्गः ४०५ सन्धियों की गहरी शोथ और शूल में, सन्धियों पर, कास, श्वास, ज्वर में श्वासनलियों और फेफड़ों की शोथ को हटाने के लिये छाती के आगे पीछे अमोनिया के लेप मले जाते हैं। श्वास, कास, कासज्वर में श्वासनलियों में सञ्चित कफ को निकालने के लिये अमोनियाकार्बोनित दिया जाता है। अथ सोरकाम्लीयरजतस्य गुणाः सोरकाम्लीयरजतं द्रवशक्तिप्रभेदतः । अभिष्यन्दहरं कामं पोथक्यादिविकारनुत् । ११०॥ विसर्पस्फोटशमनं व्रणमेहक्षतापहम् । तथैव च समाख्यातं श्वेतप्रदरनाशनम् ॥१११॥ सोरकाम्लीयरजतगुणा—बाह्यप्रयोगतः - पोथक्यादिविकारनुत् । पोथकी— “स्राविण्यः कण्डुरा गुर्व्यो रक्तसर्षपसन्निभाः । रुजावत्यश्च पिडकाः पोथक्य इति कीर्तिताः ॥” इत्युक्तलक्षणो नेत्रवर्त्मरोगविशेषः, लोके प्रायः 'कुकुरे' शब्दवाच्यः, “Trachoma” इत्यांग्लभाषायाम् ॥११०, १११॥ भा. टी.—सोरकाम्लीयरजत (Silver Nitrate) विभिन्न प्रतिशतक शक्ति के हिसाब से एक प्रतिशतक दो-प्रतिशतकादि शक्ति भेद से अभिष्यन्द (नेत्र दुखना) रोग तथा पोथकी (कुकुरे Trachoma) आदि विकारनाशक होता है। वीसर्पस्फोटशामक, व्रणमेह (सुजाक) तथा क्षतनाशक है। इसी तरह इसका प्रयोग श्वेतप्रदर के लिये भी किया जाता है ॥११०, १११॥ वक्तव्य—सोरकाम्लीयरजत शारीरिक अवयवों पर लगाने से दाहक और ग्राही है। यह जिस स्थान पर लगाया जाता है उसके स्रावों को भी हटा देता है और साथ ही जीवाणुहर भी है। अन्त:प्रयोग में रजतभस्म के समान ही वातनाड़ियों के लिए बल्य है। बहि:प्रयोग में पुराने और कठोर व्रणों के वात- नाड़ियों के लिए बल्य है। बहिःप्रयोग में पुराने और कठोर व्रणों के अङ्कुरों को जलाने के लिए एक औंस शुद्ध जल में ३० या ६० ग्रेन की शक्ति का द्राव लगाया जाता है। पिडिकान्नों तथा वीसर्प की शोथ के चारों तरफ एक औंस (२॥ तोला) जल में एक से दो ड्राम की शक्ति का द्राव लगाने से शोथ या पिडिकाएँ आगे नहीं बढ़ने पाती हैं। इसी तरह पामा-शोथ के चारों तरफ एक औंस जल में ४ या १० ग्रेन (पाँच रत्ती) की शक्ति के द्राव लगाये जाते हैं। मुखव्रण तथा गले में शोथ होने पर एक औंस जल में १० से २० ग्रेन की