भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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४०६ रसतरङ्गिणी शक्ति का द्राव लगाने से शोथ शान्त हो जाता है। जब प्रवाहिका रोग में गुदा तथा बड़ी आँत का अन्तिम भाग भीतर से शोथयुक्त हो जाता है तो उसके लिये एक औंस जल में ३ ग्रेन की शक्ति के द्राव की दो चार औंस की गुदबस्ति दी जाती है। इस बस्ति के जल में चावलों का मैदा भी मिला देते हैं। व्रणमेह में मूत्रमार्ग की शोथ को हटाने के लिए एक औंस जल में या दो ग्रेन की शक्ति के द्राव की एक या दो औंस मात्रा में उत्तरबस्ति के रूप में दिया जाता है। सोरकाम्लीयरजतद्रवस्य निर्माणप्रकारः परिस्रुतं तु सलिलं हरेत्सार्द्धपलद्वयम् । विमले काचचषके विन्यसेद्रसकोविदः ॥११२॥ सोरकाम्लीयरजतं गुञ्जाष्टकमितं क्षिपेत् । द्रवीभूतं ततो नीलकाचकुप्यां निधापयेत् ॥११३॥ सोरकाम्लीयरजतद्रवोऽयं भाषितो बुधैः । विशेषतो ह्यभिष्यन्दपोथक्याद्यक्षिरोगनुत् ॥११४॥ सोरकाम्लीयरजतद्रवस्य त्रिविधस्य निर्माणप्रकारः त्रिविधरोगप्रयोगयोग्य- प्रकारभेदभिन्नमात्रश्चेति । बिन्दुक्षेपकयन्त्रं "Dropper" इति । नीलकाच- कुप्यान्तु सर्वस्यापि निधानं भेषजरक्षार्थमेवेति ॥११२-११४॥ भा. टी.—सोरकाम्लीय रजतद्रव बनाने के लिये वैद्य को चाहिये कि एक काँच के प्याले में ढाई पल शुद्ध परिस्रुत जल डालकर उसमें आठ रत्ती परि- माण सोरकाम्लीयरजत भी डाल दें। जब यह अच्छी तरह घुल जाय तो इस द्रव को एक काँच की नीली शीशी में भरकर रख लें। इसी को सोरकाम्लीय- रजतद्रव कहते हैं। यह द्रव विशेष रूप से अभिष्यन्द पोथकी आदि नेत्ररोगों के लिये लाभदायक होता है ॥११२-११४॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः सोरकाम्लीयरजतद्रवस्यास्य निरन्तरम् । अक्ष्णोः सुविस्फारितयोर्नरस्योत्तानशायिनः ॥११५॥ बिन्दुक्षेपकयन्त्रेण द्वित्रिबिन्दुप्रयोगतः । पोथक्यभिष्यन्दभवां बाधां शीघ्रं प्रशाम्यति ॥११६॥ भा.टी.—पोथकी और आभिष्यन्द रोग में जब इसका प्रयोग करना होतो रोगी मनुष्य को सीधा लिटाकर उसके नेत्रपलक को अच्छी तरह खोलकर उनमें