भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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षोडशस्तरङ्गः ४०७ बिन्दुक्षेपक यन्त्र (Dropper) से दो अथवा तीन बिन्दु डालने से शीघ्र ही अभिष्यन्द और पोथकीरोग का कष्ट मिट जाता है ॥ ११५, ११६ ॥ द्वितीयः सोरकाम्लीयरजतद्रवः सोरकाम्लीयरजतं द्वात्रिंशद्गुञ्जसंमितम् । सार्द्धद्वितोलकमिते परिस्रुतजले क्षिपेत् ॥ ११७ ॥ विज्ञाय विद्रुतं नीलकाचकुप्यां न्यसेद् द्रुतम् । सोरकाम्लीयरजतद्रवोऽयं स्फोटकादिनुत् ॥११८॥ भा.टी.—बत्तीस रत्ती सोरकाम्लीयरजत को एक शुद्ध काँच के प्याले में डालकर उसमें ढाई तोला शुद्ध परिस्रुतजल मिला दें । जब यह अच्छी तरह घुल जाय तो इसे एक नीली काँच की शीशी में भरकर रख लें । यह सोरका- म्लीयरजतद्रव पिडिका आदि की शोथ को शान्त करता है ॥ ११७, ११८ ॥ अस्य प्रयोगविधिः विसर्पशोथं परितो द्रवोऽयं खलु लेपितः । विनिहन्त्यचिरादेव विसर्पस्य विसर्पिताम् ॥ ११९ ॥ अनेनैव प्रकारेण विस्फोटश्वयथौ भृशम् । लिप्तो द्रवोऽयं हन्त्याशु विस्फोटस्य विसर्पिताम् ॥१२०॥ भा.टी. - उक्त द्वितीय प्रकार के सोरकाम्लीय रजतद्रव को विसर्पशोथ के चारों तरफ लेप करने ( लगाने ) से वीसर्प का फैलना शीघ्र ही बन्द हो जाता है । इसी तरह विस्फोटशोथ के चारों तरफ इसके लगाने से उसका बढ़ना भी बन्द हो जाता है ॥ ११९-१२० ॥ तृतीयः सोरकाम्लीयरजतद्रवः परिस्रुते तु सलिले पञ्चतोलकसम्मिते । सोरकाम्लीयरजतं गुञ्जैकं वा तदर्धकम् ॥१२१॥ क्षिप्त्वाथ विद्रुतं नीलकाचकुप्यां तु विन्यसेत् । सोरकाम्लीयरजतद्रवोऽयं प्रदरादिनुत् ॥१२२॥ भा.टी.—एक काँच के पात्र में पाँच तोला शुद्ध परिस्रुतजल डालकर उसमें एक अथवा आधी रत्ती मात्रा में सोरकाम्लीयरजत मिला दें । जब वह अच्छी तरह घुल जाय तो इस द्रव को एक नीली काँच की शीशी में भरकर रख लें । यह द्रव प्रदर आदि रोगों में बहिःप्रयोग में व्यवहृत होता है ॥१२१, १२२॥