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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

षोडशस्तरङ्गः ४०७ बिन्दुक्षेपक यन्त्र (Dropper) से दो अथवा तीन बिन्दु डालने से शीघ्र ही अभिष्यन्द और पोथकीरोग का कष्ट मिट जाता है ॥ ११५, ११६ ॥ द्वितीयः सोरकाम्लीयरजतद्रवः सोरकाम्लीयरजतं द्वात्रिंशद्गुञ्जसंमितम् । सार्द्धद्वितोलकमिते परिस्रुतजले क्षिपेत् ॥ ११७ ॥ विज्ञाय विद्रुतं नीलकाचकुप्यां न्यसेद् द्रुतम् । सोरकाम्लीयरजतद्रवोऽयं स्फोटकादिनुत् ॥११८॥ भा.टी.—बत्तीस रत्ती सोरकाम्लीयरजत को एक शुद्ध काँच के प्याले में डालकर उसमें ढाई तोला शुद्ध परिस्रुतजल मिला दें । जब यह अच्छी तरह घुल जाय तो इसे एक नीली काँच की शीशी में भरकर रख लें । यह सोरका- म्लीयरजतद्रव पिडिका आदि की शोथ को शान्त करता है ॥ ११७, ११८ ॥ अस्य प्रयोगविधिः विसर्पशोथं परितो द्रवोऽयं खलु लेपितः । विनिहन्त्यचिरादेव विसर्पस्य विसर्पिताम् ॥ ११९ ॥ अनेनैव प्रकारेण विस्फोटश्वयथौ भृशम् । लिप्तो द्रवोऽयं हन्त्याशु विस्फोटस्य विसर्पिताम् ॥१२०॥ भा.टी. - उक्त द्वितीय प्रकार के सोरकाम्लीय रजतद्रव को विसर्पशोथ के चारों तरफ लेप करने ( लगाने ) से वीसर्प का फैलना शीघ्र ही बन्द हो जाता है । इसी तरह विस्फोटशोथ के चारों तरफ इसके लगाने से उसका बढ़ना भी बन्द हो जाता है ॥ ११९-१२० ॥ तृतीयः सोरकाम्लीयरजतद्रवः परिस्रुते तु सलिले पञ्चतोलकसम्मिते । सोरकाम्लीयरजतं गुञ्जैकं वा तदर्धकम् ॥१२१॥ क्षिप्त्वाथ विद्रुतं नीलकाचकुप्यां तु विन्यसेत् । सोरकाम्लीयरजतद्रवोऽयं प्रदरादिनुत् ॥१२२॥ भा.टी.—एक काँच के पात्र में पाँच तोला शुद्ध परिस्रुतजल डालकर उसमें एक अथवा आधी रत्ती मात्रा में सोरकाम्लीयरजत मिला दें । जब वह अच्छी तरह घुल जाय तो इस द्रव को एक नीली काँच की शीशी में भरकर रख लें । यह द्रव प्रदर आदि रोगों में बहिःप्रयोग में व्यवहृत होता है ॥१२१, १२२॥

४०८ रसतरङ्गिणी अस्य प्रयोगविधिः उत्तराह्वयवस्त्युक्तरीत्या युक्तस्स्वयं द्रवः। निहन्ति व्रणमेहञ्च श्वेतप्रदरजां रुजम् ॥१२३॥ इति रजतविज्ञानीयो नाम षोडशस्तरङ्गः भा.टी.-उक्त तृतीय प्रकार का सोरकाम्लीय रजतद्रव उत्तरवस्ति की विधि से प्रयोग करने पर व्रणमेह तथा श्वेतप्रदर रोग में लाभ पहुँचाता है ॥१२३॥ यह रजतविज्ञानीयनाम षोडशतरङ्ग समाप्त हुआ । —:०:— अथ ताम्रविज्ञानीयः सप्तदशस्तरङ्गः ताम्रस्य नामानि ताम्रं शुल्वं रक्तकं म्लेच्छवक्त्रं नेपालीय व्यम्बकं सूर्यलोहम् । त्वाष्ट्रं त्वर्कं सूर्यपर्यायसंज्ञं द्विष्ठं द्वयष्ठं त्वम्बकं कीर्तितं तत् ॥१॥ उदुम्बरञ्चारविन्दं सूर्याङ्गं लोहितायसम् । रविप्रियं भास्करं च ताम्रकं च प्रकीर्तितम् ॥२॥ ताम्रनामानि यावदुपलब्धग्रन्थव्यवहृतानि ॥१, २॥ भा.टी.—ताम्र, शुल्व, रक्तक, म्लेच्छवक्त्र, नेपालीय, त्र्यम्बक, सूर्यलोह, त्वाष्ट्र, अर्क, सूर्य के नामवाला अर्थात् भानु, रवि, उष्णांशु, सहस्रांशु आदि द्विष्ठ, द्वयष्ठ, अम्बक, उदुम्बर, अरविन्द, सूर्याङ्ग, लोहितायस, रविप्रिय, भास्कर तथा ताम्रक, ये सब नाम ताँबे के कहे जाते हैं ॥१, २॥ वक्तव्य—ताम्रधातु प्रकृति मे स्वतन्त्र रूप से मिलता है । परन्तु यह कहीं भी शुद्ध रूप में उपलब्ध नहीं होता है, किन्तु सोमल, गन्धक, लौह, कज्जल और उष्मजन आदि से संयुक्तावस्था में पाया जाता है । इसी तरह भूनाग (केंचुआ), मयूरपिच्छ तथा त्रिफला आदि द्रव्यों में ताम्र पाया जाता है । इनसे सत्त्वपातनविधि से ताम्र को पृथक् किया जाता है। यह प्रकृति में स्वर्णमाक्षिक, तूतिया और सोमलिक स्वर्णमाक्षिक आदि रूप में हमें मिलता है । ग्राह्यताम्रस्य स्वरूपम् घनघातसहं सुचिक्कणं विमलञ्चाथ जपासुमप्रभम् । मृदु चैव सदाकरोद्भवं रविलोहं खलु कीर्तितं परम् ॥३॥ ग्राह्यताम्रं घनघातसहादिगुणं सदाकरोद्भवं इति योग्यतानिर्णायकं वचनम्, सदाकरजातं हि उक्तगुणं भवतीति ॥३॥

सप्तदशस्तरङ्गः ४०६ भा.टी.-जो ताँबा हथौड़े की चोट से फटता न हो किन्तु चपटा हो जाता हो, देखने तथा स्पर्श करने में चिकना, साफ और अड़हुल फूल के सदृश लाल रंग का और कोमल हो तो समझना चाहिये यह अच्छी खान का उत्तम ताम्र है॥३॥ प्रकारान्तरेण जात्यताम्रस्य स्वरूपम् स्निग्धं मृदु घनं स्वच्छं जपाकुसुमप्रभम् । लोहनागादिरहितं जात्यं ताम्रं प्रकीर्तितम् ॥४॥ प्रकारान्तरेण निर्देशः स्फुटार्थः । स्वच्छं निर्मलम् ॥४॥ भा.टी.-चिकना, मृदु, कठोर, साफ देवीपुष्प की तरह और लौह सीस इत्यादि दोष से रहित ताम्र अच्छा होता है ॥ ४ ॥ त्याज्यताम्रस्य स्वरूपम् सदलं पाण्डुरञ्चैव कठिनं लघु भंगुरम् । समलं त्वरविन्दन्तु वर्जयेद्रसकर्मणि ॥५॥ घनघातासहं कृष्णं श्वेतं लाहादिसङ्गतम् । अतिस्तब्धञ्च रूक्षञ्च ताम्रं त्याज्यं निगद्यते ॥६॥ त्याज्यताम्रस्वरूपं निगदव्याख्यातम् । उक्तञ्च—"कृष्णं रूक्षमतिस्तब्धं श्वेतं चापि घनासहम् । लोहनागयुतं शुल्बं म्लेच्छं दुष्टं मृतौ त्यजेत् ।।" इति । अत्र च व्यस्तैः समस्तैरपि लक्षणैर्भवति त्याज्यमित्यवधेयम् ॥५, ६॥ भा.टी.—पत्रयुक्त, पाण्डुर (पीला सफेद लाल) वर्ण, बहुत कठिन (सख्त), लघुभार, शीघ्र टूटनेवाला, लोह आदि धातु मलयुक्त ताम्र को शोधन-मारण कार्य में नहीं लाना चाहिये । अथवा हथौड़े की चोट से फटनेवाला, कृष्णवर्ण या श्वेतवर्ण, लौहादि-धातु-मिश्रित तथा अत्यन्त कठोर ताम्र शोधनमारण-कार्य में नहीं लाना चाहिये ॥५, ६॥ ताम्रस्य द्वैविध्यम् नेपालं म्लेच्छकं चेति ताम्रं द्विविधमुच्यते । नेपालं जात्यमाख्यातं म्लेच्छकं त्ववरं स्मृतम् ॥७॥ एवञ्च ताम्रं नेपालं म्लेच्छकमिति द्विविधं प्राचीनैः देशभेदोत्पत्तिगुणरूप- विशेषादुक्तम् ॥७॥ भा.टी.-ताम्र के दो भेद होते हैं । १-नेपालताम्र, २-म्लेच्छताम्र । इनमें से नेपाल संज्ञक ताम्र जात्य ( उत्तम ) हौता है और म्लेच्छ संज्ञक ताम्र अधम ( निकम्मा ) होता है ॥७॥

४१० रसतरङ्गिणी नेपालस्य लक्षणम् घनघातसहं स्निग्धं कोमलं गुरु लोहितम् । निर्मलं गुणकृच्चैव नैपालं ताम्रमुच्यते ॥८॥ नेपालम्लेच्छकयोः यथाक्रमं लक्षणञ्च व्याख्यातं प्रायपाठमिति ॥८॥ भा.टी.—हथौड़े की चोट को सहनेवाले, स्निग्ध (चिकना), कोमल, गुरुभार और रक्तवर्ण, निर्मल तथा यथोक्त गुणसम्पन्न ताम्र को नेपालताम्र कहा जाता है ॥८॥ म्लेच्छकस्य स्वरूपम् कृष्णच्छायं सुकठिनं सितञ्चारुणकं तथा । सुधौतमपि कृष्णं स्यान्म्लेच्छकं ताम्रमुच्यते ॥६॥ भा.टी.—जिसमें दूर से काली चमक नजर आये, जो कठिन हो और रंग में सफेद और लाल मिश्रित हो और अच्छी तरह साफ करने पर भी फिर थोड़ी देर में काला पड़ जानेवाला हो, वह ताम्र म्लेच्छ कहा जाता है ॥६॥ ताम्रशोधनस्य प्रयोजनम् ताम्रं निहन्ति विमलं खलु कायकान्तिं नूनं नितान्तमचिराज्जनयेच्च वान्तिम् । भ्रान्तिं तथा जनयतीह हि नैति शान्तिं चेत्ताम्रकं त्वविमलं खलु मारितं स्यात् ॥१०॥ शुल्वं विवर्द्धयति सर्गजगात्रतापं क्षिप्रं नयत्याप च शषमशेषधातून । कामं विरेचयति वै जनयेच्च मूर्च्छां संशुद्धिहीनमिह चेत्खलु मारितं स्यात् ॥११॥ ताम्रशोधनप्रयोजनम्—विमलां शरीरशोभां निहन्ति रक्तविकारहेतुत्वात् । अचिरात् शीघ्रम्, नितान्तं अत्यर्थम्, नूनं अव्यभिचारेण अवश्यमित्यर्थः । नैति शान्ति अशुद्धताम्रभक्षक इति शेषः, मनस्तापकत्वादित्यर्थः । उक्तञ्च—"न विषं विषममित्याहुस्ताम्रन्तु विषमुच्यते । एको दोषो विषे ताम्रे त्वष्टौ दोषाः प्रकीर्तिताः॥ भ्रमो मूर्च्छा विदाहश्च स्वेदक्लेदनवान्तयः । अरुचिश्चत्तसन्ताप एते दोषा विषो- पमाः ॥” इति । “तैलतक्रादिशुद्धस्य तद्दोषविनिवृत्तये । शुल्वस्य शोधनं प्राज्ञै- र्विशेषात्समुदाहृतम् ॥” इति च स्पष्टमन्यत ॥१०, ११॥ भा.टी.—अशुद्धताम्रभस्म का सेवन करने से शरीर की सुंदर शोभा नष्ट हो

जाती है और सेवन करते ही थोड़ी देर में जी मिचलाने लगता है, उलटी होने लगती है, शिर में चक्कर आने लगते हैं और रोगी बेचैन हो जाता है। इसी तरह अशुद्धताम्र सेवन से शरीर में ताप की वृद्धि हो जगती है और सब शरीर की धातुओं का पोषण बन्द होकर सूखने लगता है, अतीसार होने लगता है और रोगी को बार-बार मूर्च्छा आने लगती है। अतः बिना शुद्ध किये हुए ताम्र का सेवन नहीं करना चाहिये ॥१०, ११॥ वक्तव्य—उक्त दोषों के कारक ताम्र को ग्रन्थान्तर में एक भयंकर दुःख- दायी विष माना गया है—"न विषं विषममित्याहुस्ताम्रं तु विषमुच्यते"। इसमें रक्त विकृतिकारक दोष होने से सारे शरीर में फोड़ा-फुन्सी आदि निकल आते हैं। ताम्रगत क्षोभक एवं उत्तेजक विष के कारण शरीर में गर्मी बहुत ही बढ़ जाती है। आमाशय में क्षोभ उत्पन्न होने से इसके द्वारा तीव्र वमन होने लगती है। सारांश यह है कि अशुद्ध ताम्र में तूतिये का भाग बहुत अधिक तीव्र रूप से होता है। अतः उसको ताम्र से पृथक् किये बिना या लघु किये बिना ताम्र अंतःप्रयोग के उपयोगो नहीं हो सकता है। इसके द्वारा उत्पन्न होनेवाले आठ दोषों का वर्णन आगे किया जायगा। ताम्रस्य प्रथमः शोधनप्रकारः पत्रीकृतन्तु तरणिं ज्वलने प्रतप्तं चाङ्गेरिकादलरसे स्नपयेद्विधिक्षः । इत्थं विशोधितमलं खलु सूर्यलोहं संयोजयेन्मृतिविधौ भिषजां वरेण्यः ॥१२॥ प्रथमः शोधनप्रकारः—तरणिं ताम्रम्, चाङ्गेरिकादलरसे शोधनम् “ताम्र- मम्लेन शुद्ध्यतीति” प्राचीनसंवादात् ॥१२॥ भा. टी.—ताम्र शोधन करने के लिये पहिले इसके बहुत पतले-पतले पत्र बना लें। अब पत्रों को तीव्र अग्नि में खूब तपाकर चांगेरीपत्रस्वरस में बुझायें। इस प्रकार इक्कीस बार गरम करके चांगेरीस्वरस में बुझाने से ताम्र शुद्ध हो जाता है। इसे भस्म बनाने के काम में लाना चाहिये ॥१२॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः रविलोहदलं पिठरीनिहितं खलु शीतसहस्वरसे तु दिनम् । परिपाचितमत्यचिरान्नियतं विमलत्वमुपैत्यनिवेर्लामदम् ॥१३॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः—पिठरी स्थालिका, शीतसहो नीलसिन्दुवारः- “नील-

४१२ रसतरङ्गिणी पुष्पः शीतसहो निर्गुण्डी नीलसिन्दूरका" इति धन्वन्तरिः । अतिवेलं अत्यर्थम्॥१३॥ भा. टी.—ताम्र के बहुत सूक्ष्म पत्रों को एक पतेली में डालकर उसमें नील पुष्प की सम्भालु के पत्रों का स्वरस डालकर भर दें । अब इस पतेली या हाँडी को चूल्हे पर चढ़ाकर एक दिनतक पकायें तो ताम्र उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥१३॥ तृतीयः शोधनप्रकारः नेपालशुलबस्य दलानि सूक्ष्माण्यादाय सिन्धूत्थसमन्वितानि । संस्वेदयेन्मन्दिरवारिपूरे त नुत्तमां शुद्धमिहोपयाति ॥१४॥ भा.टी.—नेपालजातीय ताम्र के सूक्ष्म पत्र बनाकर उनको एक हाँडी में डाल- कर उसमें ताम्रसमभाग सैन्धानमक और प्रचुर मात्रा में काञ्जी भरदें और चूल्हे पर चढ़ाकर एक दिनतक पकाकर गरम जलसे धो लेनेपर ताम्र शुद्ध हो जाता है॥१४॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः सिन्धूत्थवज्र्यर्कपयःप्रलिप्तान्यादाय पत्राणि रविप्रियस्य । प्रताम्य वहावथ सिन्दुवारद्रवे निषिञ्चेत् खलु सप्तवारम् ॥१५॥ अनेन तु विधानेन विशुद्धं लोहितायसम् मारणाय प्रयुञ्जीत वीतशङ्को भिषग्वरः ॥१६॥ भा. टी.—नेपालजातीय ताम्र के सूक्ष्म कण्टकवेधी पत्र बनाकर उनके ऊपर आक तथा थोहर के दूध में पिसे हुए सैन्धानमक कल्क का लेप करके अग्नि में तपायें, जब ताम्रपत्र लाल हो जायें तो इन्हें चिमटे से पकड़कर सम्भा- लूपत्र (सिन्दुवार) स्वरस में बुझायें । इस प्रकार सात बार सैन्धानमक कल्क का लेप कर अग्नि में तपा सम्भालूस्वरस से बुझाने से ताम्र शुद्ध हो जाता है। इसको भस्म करने के लिये निःसंकोच काम में लाना चाहिये ॥१५, १६॥ पञ्चमः शोधनप्रकारः वस्वंशसिन्धूत्थसमन्वितानि नेपालशुलबस्य दलानि कामम् । गोमूत्रयुक्तानि पचेद् द्वियामं रविप्रियं शुद्धयति नात्र शङ्का ॥१७॥ भा. टी.—नेपालताम्रपत्र एक भाग और सैन्धानमक आठवाँ भाग लेकर एक हाँडी में डालें । अब इस पात्र में गोमूत्र भरकर इसको चूल्हे पर रख, दो पहर तक अग्नि पर पकावें तो ताम्र निःसन्देह शुद्ध हो जाता है ॥१७॥ षष्ठः शोधनप्रकारः क्षाराम्ललिप्तानि तु ताम्रपत्राण्यग्नौ प्रताम्य स्नपयेत्तु तक्रे ।

सप्तदशस्तरङ्गः ४१३ क्वाथे कुलत्थप्रभवे च ताम्रं प्रयाति शुद्धिं खलु निर्विशेषाम् ॥१८॥ भा. टी.—ताम्र के पत्रों पर त्रिचार, पञ्चवार अथवा अष्टवारों को काञ्जी निम्बूरस आदि किसी अम्लद्रव से पीसकर इसका लेप करके अग्नि में तपायें और तक्र में बुझा दें । इस प्रकार सात बार तक्र ( माठा ) और सात बार कुलत्यक्वाथ में बुझाने से ताम्र शुद्ध हो जाता है ॥१८॥ ताम्रस्य प्रथमो मारणप्रकारः तुल्यांशसंशोधितहिंगुलेन सलुङ्गनीरेण रखेर्द्लानाम् । पिष्टिं विधायाथ विशोष्य घर्मं सुश्लक्ष्णचूर्णीश्च ततो विदध्यात् ॥१९॥ ऊर्ध्वपातनयन्त्रे च विधानज्ञस्ततः पचेत् । निर्विशेषविशुद्धञ्च रसराजं समाहरेत् ॥२०॥ एवं वारत्रयं कुर्याद्वारद्वयमथापि वा । रविचूर्णसमञ्चाथ गन्धं दत्त्वा विमर्दयेत् ॥२१॥ त्रिबारं पुटयेदेवं वारद्वयमथापि वा । इत्थं मृतं ताम्रकं स्यादमृतीकरणोचितम् ॥२२॥ अथ मारणप्रकारः प्रथमः—द्विवारं त्रिवारं वेति भस्मयोग्यतापेक्षया ज्ञेयम् । अमृतीकरणोचितं न तु भक्षणयोग्यम्, अमृतीकरणमनुपदं वक्ष्यते ॥१९–२२॥ भा. टी.—उक्त प्रकार से शुद्ध ताम्र का चूर्ण एक भाग और शुद्ध हिंगुल एक भाग लेकर इन दोनों को बिजौरानींबू के स्वरस से खूब मर्दन कर पिष्ठी सी बना लें । इस पिष्ठी को धूप में सुखाकर इसका चूर्ण बना लें । इस चूर्ण को ऊर्ध्वपातन की हाँडी में डालकर दूसरी हाँडी से बन्द कर लेप कर दें और यन्त्र को चूल्हे पर चढ़ा दें । चूल्हे में अग्नि जलाकर पकायेंतो उपर की हाँडी में हिंगुलोत्थ पारद और नीचे के पात्र में ताम्रचूर्ण प्राप्त होगा । पुनः उक्त प्रकार से समभाग हिंगुल के साथ ऊर्ध्वपातन करें । इस प्रकार तीन बार ऊर्ध्व- पातन से प्राप्त ताम्रचूर्ण में समभाग शुद्ध गन्धक पीसकर सम्पुट में बन्द करके पुट में फूंक दें । इस तरह गन्धक के साथ दो या तीन पुट देने से ताम्र की भस्म अमृतीकरण के योग्य बन जाती है । इसको अमृतीकरण किये बिना अंतःप्रयोग में नहीं लाना चाहिये ॥१९–२२॥ द्वितीयो मारणप्रकारः पादांशसंशोधितपारदेन सुसूक्ष्मपत्राणि रवेर्विमद्य । चाङ्गेरिकापत्ररसप्रपिष्टतुल्यांशगन्धेन च पेषयेद्वै ॥२१॥

  • ४१४ रसतरङ्गिणी

विशोष्य घर्मे खलुसम्पुटस्थं पुटेत् त्रिवारं भिषगप्रमत्तः । इत्थं मृत ताम्रकमामयज्ञः प्रयोजयेत्खल्वमृतक्रियायै ॥२४॥ ताम्रापेक्षया चतुर्थांशेन शुद्धसूतेन ताम्रदलानां प्राङ्मर्दनं ततश्चाङ्गेरीरसपिष्ट- गन्धकेन पेषणम्, ततः संशोष्य पुटनम्, एवं त्रिधा। ततोऽमृतीकरणयोग्यतेति॥२४॥ भा.टी.-विशुद्ध ताम्रचूर्ण एक भाग, शुद्धपारद चौथाई भाग हे, शुद्धगन्धक एक भाग लेकर पहिले ताम्रचूर्ण का पारद के साथ मर्दन करें। पश्चात् गन्धकके साथ चांगेरीस्वरस में खूब मर्दन करके धूप में सुखा लें। अब इस पारद गन्धक के साथ मर्दित शुष्कताम्रचूर्ण को सम्पुट में बन्द करके गजपुटमें फूँक दें। इस प्रकार तीन बार पारद गन्धकयोग से ताम्र को तीन गजपुट देने से उसकी भस्म हो जाती है। इसको अमृतीकरण करके काम में लाना चाहिये ॥२३, २४॥ तृतीयो मारणप्रकारः विशुद्धशुल्वस्य दलानि निम्बूद्रवप्रपिष्टेश्वरगन्धलेपात् । विशोष्य घर्मे पुटितानि नूनं वारत्रयेणेह मृतिं प्रयान्ति ॥२५॥ तृतीय प्रकारो निम्बूद्रवपेषितया समपारदगन्धककृतकज्जल्या त्रिधा पुटि- तोऽञ्जनाद्युपयोगी ॥२५॥ भा.टी.- शुद्ध ताम्रपत्र एक भाग, शुद्ध पारद एक भाग, शुद्ध गन्धक एक भाग, इन्हें लेकर पहिले पारद और गन्धक की कज्जली बना लें, फिर इस कज्जली को नीबू के रस में घोंटकर इसका ताम्रपत्रों पर लेप करके धूप में सुखा इन कज्जलांलिप्त ताम्रपत्रों को सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक दें। इस विधि को तीन बार दुहराने से ताम्र की भस्म हो जाती है ॥२५॥ वक्तव्य--उक्त विधियों से तीन गजपुट देने से सम्भव है कि ताम्र का उत्तम भस्म हो सके, अतः तीन पुट के स्थान पर पाँच-सात पुट देने चाहिये अथवा ठीक भस्म होने तक पुट देने चाहिये । चतुर्थो मारणप्रकारः ताम्रं पत्रीकृतं शुद्धं भिषग् दशपलोन्मितम् । ताम्रद्विगुणितञ्चैव गन्धं दत्त्वा विमर्दयेत् ॥२६॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा मृदा सन्धि निरोधयेत् । अहोरात्रं पचेद्यत्नाद् वालुकायन्त्रगं भिषक् ०।२७॥ स्वाङ्गशीतन्तु विज्ञाय सम्पुटं त्ववतारयेत् । ताम्रोन्मित बलिं दत्त्वा शुल्वं खल्वेऽथ पेषयेत् ॥२८॥

सप्तदशस्तरङ्गः ४१५

इत्थं त्रिवारं पुटयेत्तुल्यं गन्धं विनिक्षिपेन् । एवं मृतं ताम्रकं स्यादञ्जनादौ गुणावहम् ॥२६॥ चतुर्थो मारणप्रकारः केवलगन्धसाधितो वालुकायन्त्रपाकानन्तरं त्रिधा पुटि- तोऽञ्जनाद्युपयोगी ॥२६-२६॥ भा.टी.—शुद्धताम्रपत्र दस पल परिमाण और शुद्ध गन्धक बीस पल परि- माण लेकर दोनों को एकत्र खरल में खूब मर्दन करके सम्पुट में बन्द कर सम्पुट की सन्धि को अच्छी तरह कपड़मिट्टी से पोतकर सुखा लें। अब इस संपुट को वालुकायन्त्र के बीच में रखकर चौबीस घण्टे की अग्नि में पकायें। जब यन्त्र स्वांगशीत हो जाय तो यन्त्र में से ताम्र को निकाल फिर उसमें समभाग शुद्ध गन्धक मिला अच्छी तरह खरल में पीसकर सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक दें। इस प्रकार तीन बार पुट में फूँकने से ताम्र की भस्म हो जाती है। इस भस्म को अञ्जन आदि बाह्य प्रयोग में काम लाना चाहिये ॥२६-२६॥ पञ्चमो मारणप्रकारः नेपालशुल्बस्य दलानि शुद्धान्यादाय पूर्वं भिषजां वरेण्यः । तुल्यांशगन्धेशजकज्जलंश्च पदांशिकीं रोगशिलाञ्च शुद्धाम् ॥३०॥ दत्त्वा तदर्धं हरितालकञ्च कन्याद्रवेणैव विमर्द्य वैद्यः । विशोष्य घर्मे पुटयेद्विधिज्ञः प्रयाति ताम्रं मृतिमाश्वपूर्वाम् ॥३१॥ पञ्चमः प्रकारः—पारदगन्धकहरितालशिलाभिः साधनीयः सत्वरसिद्धिश्चेति । तुल्यांशौ समानभागिकौ यौ गन्धेशौ गन्धकपारदौ ताभ्यां जातं निष्पादितमिति यावत् ,यत्कज्जलं कज्जलिका तदित्यर्थः । तच्चानुक्तमानत्वेन ताम्रपत्रसम ग्राह्यम् ॥३०, ३१॥ भा.टी.—शुद्ध ताम्रचूर्ण एक भाग, शुद्ध पारद एक भाग, शुद्ध गन्धक एक भाग, शुद्ध मैनसिल चौथाई भाग और शुद्ध हरताल आठवाँ भाग लेकर पहिले पारद गन्धक की एकत्र कज्जली कर लें। अब इससे ताम्रचूर्ण मिलाकर कुछ देर घोटें, बाद को मैनसिल और हरतालचूर्ण मिला घीकुआर के रस में खूब मर्दन करके धूप में सुखा लें । अब इस धूप में सूखे हुए चूर्ण को सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक दें। इस प्रकार तब तक उक्त द्रव्यों के साथ ताम्रचूर्ण को पुट दें जब तक उसकी ठीक भस्म न हो जाय। इस विधि से ताम्रभस्म शीघ्र हो जाती है ॥२०, २१॥

४१६ रस्तरङ्गिणी सूचीसुवेध्यं खलु ताम्रपत्रं तुल्यांशगन्धेशजकज्जलञ्च । समं समादाय भिषग्वरेण्यः सम्पेपयेद्वै स्वरसैः कुमार्याः ॥३२॥ विशोष्य घर्मेऽथ शरावसंस्थं पुटेद्विधिज्ञो लवणाख्ययन्त्रे । इत्थं दिनार्द्धं परिपाचने नह्यनुत्तमां याति मृतिन्त ताम्रम् ॥३३॥ षष्ठः प्रकारः—कज्जलीलेपसाध्यो लवणयन्त्रपाकी प्राचीनतन्त्रसम्मतश्चेति । उक्तं हि—“ताम्रपादांशतः सूतं ताम्रतुल्यञ्च गन्धकम् । मर्दयेद् यामयुग्मं च यावत्कज्जलिका भवेत् ॥ तां तु कन्यारसैः पिष्ट्वा ताम्रपत्राणि लेपयेत् । संशु- ष्काणि ततस्तानि शेष कज्जलिकान्तरम् ॥ निक्षिप्य हण्डिकामध्ये शरावेण निरो- धयेत् । संधिरन्ध्रं द्वयोः कुर्यादम्बुभस्मविलेपनम् ॥ हण्डिकां पटुनाऽऽपूर्य भस्मना वा गलावधि । पिधाय चुल्ल्यामारोप्य वह्निं प्रज्वालयेद् दृढम् । चतुर्यामं ततः स्वाङ्गशीतलं तत्समुद्धरेत् ॥” इति ॥३२-३३॥ भा.टी.—सूचीवेध्य शुद्ध ताम्रपत्र, शुद्ध पारद और शुद्ध गन्धक तीनों को समभाग में लेकर एक खरल में डालें, फिर इसमें घीकुआर स्वरस मिलाकर खूब मर्दन करें । जब पारद गन्धक की कज्जली इसमें अच्छी तरह मिल जाय तो इसे धूप में सुखाकर सम्पुट में बन्द करके लवणयन्त्र के बीच में रखकर बारह घण्टे की अग्नि देकर पकायें । इस प्रकार ताम्र की भस्म हो जाती है॥३२-३३॥ वक्तव्य—एक बार ही लवणयन्त्र में पकाने से ताम्र की ठीक भस्म होनी कठिन है, अतः लवणयन्त्र में पकाने के बाद इसको पारदगन्धक के साथ दो तीन पुट भी देनी चाहिए । उक्त विधियों में से किसी एक विधि से बनाई हुई ताम्रभस्म को थोड़ी मात्रा में लेकर थोड़े से दही में एक काँच की शीशी या प्याली में १३ घण्टे तक पड़े रहने दें । यदि दही में नीलापन दीखे तो ताम्र- भस्म ठीक नहीं समझनी चाहिये । ऐसी भस्म को पुनः सूरणकंद के स्वरस में घोट कर ठीक भस्म होने तक पुनः गजपुट देनी चाहिये । ताम्रभस्म को सूर्य की किरणों द्वारा देखने पर यदि वह निश्चन्द्र दिखाई दे तो उसे शुद्ध भस्म समझना चाहिये : अमृतकरणस्य प्रयोजनम् मृतमप्यरविन्दन्तु ह्यमृतकिरणोज्झितम् । सेवितं दर्शयत्यष्टौ दोषानाशु विषोपमान् ॥ ३४ ॥ तस्मान्मृतस्य ताम्रस्य दोषाष्टकनिवृत्तये । अमृतीकरणं यत्नाद् विदध्याद्भिषगग्रणीः ॥ ३५ ॥

२७ सप्तदशस्तरङ्गः ४१७ भा.टी.—ताम्र की भस्म हो जाने पर भी यदि उसका अमृतीकरण संस्कार किये बिना ही सेवन किया जाय तो उससे विष के सदृश कष्टदायक आठ दोषों या विकारों की उत्पत्ति होती है। अतः ताम्रभस्म में पाये जानेवाले आठ दोषों को दूर करने के लिये वैद्य को अच्छी तरह अमृतीकरण करना चाहिये ॥३४,३५॥ दोषाष्टकनिरूपणम् वान्तिर्भ्रान्तिश्चित्तसन्तापशोषौ गाढं क्लेदश्चारुचिर्दाहमोहौ । इत्यष्टौ वै सूर्यलोहस्य दोषाः पूर्वाचार्यैः क्लेशदाः सम्प्रदिष्टाः ॥ ३६ ॥ दोषाष्टकं ताम्रे वर्त्तमानं स्वभावतो वान्तिभ्रान्तिप्रभृति, तत्र प्राचीनैरपि स्फुटमुक्तमेवेत्याह पूर्वाचार्यैरिति । उक्तं हि—“ताम्रे त्वष्टौ दोषाः प्रकीर्तिताः” इति ॥ ३६ ॥ भा.टी.—ताम्र में विभिन्न प्रकार के खनिजयोगों तथा तुत्थ के सहयोग से—वमन लाना, चक्कर आना, मन में क्षोभ, मुखशोष, या धातुक्षोभ, अत्यन्त तीव्रता, जी मचलाना, भोजन में अरुचि होना, सब शरीर में दाह होना और मूर्च्छा होना, ये आठ अत्यन्त दुःखदायी दोष होते हैं। इन्हीं को शान्त करने के लिये अमृतीकरण किया जाता है ॥ ३६ ॥ वक्तव्य—अमृतीकरण के लिये किस अवस्था की भस्म लेनी चाहिये इस पर वैद्यों का द्विविध विचार पाया जाता है। कुछ लोगों का यह विचार है कि अमृतीकरण के लिये ताम्रभस्म रेखापूर्ण वारितर लक्षणवाली होनी चाहिये । और कुछ कहते हैं कि रेखापूर्णता और वारितरता के अतिरिक्त उसमें तूतिये का भाग भी नहीं रहना चाहिये । इसके लिये वे लोग ताम्रभस्म को एक पत्ते या कांसे के पात्र में पड़े हुए दही के ऊपर डालकर कम से कम चौबीस घंटे प्रतीक्षा करते हैं। यदि इस अवधि में ताम्रभस्मवाले स्थान पर दही नीला या हरा-सा हो जाय तो उसे फिर पुट देकर अमृतीकरण के उपयोगी समझते हैं। हमारी समझ में यह विधि ही ताम्र प्रयोग में अच्छी है। प्रथमोऽमृतीकरणप्रकारः सुमृतं ताम्रचूर्णन्तु तदर्धं गन्धकं तथा । पञ्चामृतेन सम्पेष्य विधानज्ञा भिषग्वरः ॥ ३७ ॥ शरावसम्पुटे न्यस्य ताम्रं विहितचक्रिकम् । त्रिबारं पुटयेदेवं रसतन्त्रविचक्षणः ॥ ३८ ॥

श्लक्ष्णखल्वेऽथ सम्पेष्य काचकूप्यां तु विन्यसेत्। अमृतीकरणादेवं ताम्रं स्यादमृतोपमम् ॥ ३६॥ तत्रागमाद्योऽमृतीकरणप्रकारः—सुमृतं ताम्रचूर्णंन्तु इत्यादिना निर्दिष्टः निग- दव्याख्यातः। यद्यपि प्राचीनतन्त्रेषु गन्धकसहितं नामृतीकरणमुक्तं, अपितु केवलं पञ्चामृतसूरणद्रवैरेव; तथापि गन्धकस्यापि सह लेपाद् बहुलगुणं भवति। गन्धकस्य सूक्ष्माज्वलनेन ताम्राणुवंशपर्यन्तमपि पञ्चामृतादिगुणाधावनात्, इत्य- मिसन्धायामृतीकरणप्रकारोऽयमनुभूत उद्भावित आचार्यैः। शार्ङ्गधरसंहिताया- मपि अर्धगन्धकलेपद्वारा अमृतीकरणमुक्तमित्यवधेयम् ॥ ३७-३६ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह से भस्म किया हुआ ताम्र एक भाग और शुद्ध गन्धक आधा भाग लेकर दोनों को एकत्र पञ्चामृत के साथ अच्छी तरह पीसकर इसकी टिकिया बना लें। इन टिकियाओं को सुखाकर एक शरावसम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूक दें। इस विधि को तीन बार दुहराने से ताम्र उक्त अष्ट- दोष रहित हो जाता है। इसको अच्छे खलों में खूब अच्छी तरह बारीक पीस कर कांच की शीशी में रख लेना चाहिये। इस अमृतीकरण क्रिया द्वारा ताम्र- भस्म अमृतसदृश गुणकारी हो जाती है ॥ ३७-३६ ॥ वक्तव्य—पुरातन रसग्रन्थों में गन्धक सहयोग में अमृतीकरण करना नहीं माना गया, किन्तु केवल पञ्चामृत के साथ पुट देना अथवा सूरणकन्द में बन्द कर पुट देना ही अमृतीकरण माना है। परन्तु गन्धकयोग से अमृतीकरण करने पर हानि के स्थान पर गुण ही होते हैं। क्योंकि यदि किसी सूक्ष्मातिसूक्ष्मांश में ताम्रभस्म दोषयुक्त हो तो उसके लिये भी गन्धक अत्युपयोगी है। अन्यथा गन्धक ताम्र का मारक होने से अपने द्वारा पञ्चामृत गुणों को ताम्र के अणुओं तक पहुँचाने से उसमें गुणों की विशेषता कर देता है। अतः गन्धकयुक्त पञ्चा- मृत से अमृतीकरण उत्तम समझनी चाहिये। द्वितीयोऽमृतीकरणप्रकारः सम्यङ्मृतं सूर्यसखस्य चूर्णं तदर्धसंशोधितगन्धकञ्च। दत्त्वा ततोऽम्लैः खलु निम्बुकोत्थैः सम्पेइयेद् याममलं रसज्ञः ॥४०॥ गोलं विधायाऽथ रविप्रियस्य ह्युपर्युधःसूरणकन्दसंस्थम्। मृत्कर्पटैश्चाथ विलिप्य गोलं पुटे गजाख्ये पुटयेद्विभिज्ञः॥४१॥ रसागमज्ञैरनया तु रीत्याऽमृतक्रियायां खलु पाचतन्नु। वान्त्यादिकं न प्रकरोति नूनं ताम्रं निकामं त्वमृतोपमं स्यात् ॥४२॥

सप्तदशस्तरङ्गः ४१६ द्वितीयोऽमृतीकरणप्रकारो निम्बूद्रवपेषणसूरणकन्दमध्यस्थापनसाध्यो गन्धक- सहभावी चेति ॥ ४०-४२ ॥ भा.टो.—अच्छी तरह बनायी हुई ताम्रभस्म एक भाग और शुद्ध गन्धक आधा भाग लेकर खरल में एकत्र करके नींबूरस से तीन घंटे अच्छी तरह घोटें। अब इसको गोला-सा बनाकर अच्छी तरह सुखा लें और जिमीकन्द के भीतर इस गोले को रखकर जिमीकन्द के बाहर अच्छी तरह कपड़मिट्टी करके गजपुट की अग्नि में फूँक देवें। स्वांगशीत होने पर सावधानी से जिमीकन्द के भीतर से ताम्रभस्म के गोलक को बाहर निकाल खरल में पीसकर रख लें। रसशास्त्रज्ञों ने इस विधि से अमृतीकरण क्रियायुक्त ताम्रभस्म को पूर्वोक्त वमनादि अष्टदोष रहित अमृतसदृश गुणकारी माना है ॥ ४०-४२ ॥ तृतीयोऽमृतीकरणप्रकारः सम्यङ्मृतं सूर्यसखस्य चूर्णं सम्पेषयेद्वै स्वरसे कुमार्याः । विशोष्य घर्मेऽथ शरावसंस्थं पचेद् वराहाख्यपुटेऽश्ववारम् ॥४३॥ रीत्यानया वै ह्यमृतीकृतन्तु रविप्रियं शीलितमप्यमन्दम् । दोषाष्टकं नैव करोति नूनं ताम्रं निकामं त्वमृतोपमं स्यात् ॥ ४४ ॥ तृतीयः प्रकारः—सूर्यसखस्य ताम्रस्य । अयं हि केवलकुमारीरससाध्यः । अत्रानुक्तोऽपि गन्धकः क्षेप्यः । अश्ववारं सप्तवारमत्र पुटनम् ॥ ४३, ४४ ॥ भा.टी.—विधिपूर्वक भस्म किये हुये ताम्रचूर्ण को खरल में डालकर कुमारीस्वरस के साथ अच्छी तरह मर्दन करके धूप में सुखा लें। अब इस शुष्क- चूर्ण को शरावसम्पुट में बन्द करके वराहपुट दें। इस विधि से सात बार दुहराने से ताम्रभस्म अष्टदोष रहित हो जाती है। इसके सेवन से अष्टद सम्बन्धी किसी प्रकार की थोड़ी भी शंका नहीं रहती है ॥ ४३, ४४ ॥ मृतताम्रस्य गुणाः ताम्रं तिक्तं तुवरमधुरं पाकतश्चोष्णवीर्यं त्वम्लं स्निग्धं खलु विषहरं सारकं लेखनञ्च । पित्तोद्भूतानपि च कफजान् श्लेष्मपित्तोत्थितान् वा घोरान् रोगानपि हि विरजानप्यशेषांश्च हन्यात् ॥ ४५ ॥ अथ मृतताम्रगुणाः- पाकतश्चोष्णवीर्यमिति प्राचीनतन्त्रेषु तु “ताम्रं कषायं मधुरञ्च तिक्तमम्लञ्च पाके कटु सारकञ्च । पित्तापहं श्लेष्महरञ्च शीतं" इत्युक्तम् तत्र शीतत्वं लघीयस्यां मात्रायां प्रयोगात् अथवा स्पर्शतौ ज्ञेयम् ॥ ४५ ॥

४२० रसतरङ्गिणी भा.टी.—ताम्रभस्म रस में तिक्त (कड़वी) तुवर (कषाय) तथा मधुर, पाक में कटु, वीर्य में उष्ण, आम्लरस, स्निग्धगुण, विषनाशक, पित्तनिःसारक, लेखक (वामक या शोथहर) होती है। इसके प्रयोग से पित्तप्रकोपजन्य, कफ- प्रकोपजन्य अथवा कफपित्तप्रकोपजन्य सभी प्रकार के पुरातन रोग भी नष्ट हो जाते हैं ॥ ४५ ॥ वक्तव्य—उक्तगुण ताम्रभस्म के भौतिक गुण समझने चाहिये। प्रचीन रस ग्रन्थों में ये ताम्रभस्म गुण पाये जाते हैं, परन्तु किसी-किसी ने इसको शीतल भी माना है। वहाँ पर यह अत्यन्त मात्रा में अथवा स्पर्श में शीतल समझना चाहिये। अपि च ताम्रं दीपनमुत्तमं कृमिहरं कुष्ठामयध्वंसनं कासश्वासविधूननं क्षयहरं पाण्ड्वामयघ्नं परम्। दुर्नामग्रहणीगदप्रशमनं नेत्रामयेषूत्तमं स्थौल्यध्वंसकरं त्वलं बहुगिरा नानामयध्वंसनम् ॥ ४६ ॥ ताम्रं मृतं ज्वरहरं व्रणरोपणञ्च रुच्यं परं गदहरं ह्युदरामयघ्नम्। आयुष्यमप्युभयतः परिशोधनञ्च वैद्यैर्मतं खलु रसायनतन्त्रविद्भिः ॥४७॥ ताम्रं उत्तमं दीपनम् इति समन्वयः। दुर्नामानि अर्शांसि ॥ ४६, ४७ ॥ भा.टी.—ताम्रभस्म, उत्तमदीपक, उदरकृमिनाशक, रक्तविकृतिजन्यरोग अथवा कुष्ठरोग नाशक है। यह कासश्वासशामक, क्षयरोगहर, उत्तम पाण्डु- रोगहर है। इसके सेवन से वातकफार्श तथा ग्रहणीरोगमें शीघ्र आराम आता है। नेत्ररोगों के लिये ताम्र उत्तम माना जाता है। शरीर में दिन प्रतिदिन बढ़नेवाले मोटापे का यह नाशक है। इस प्रकार ताम्रभस्म प्रायः अनेक प्रकार के रोगों को नष्ट करती है। ताम्रभस्म ज्वरनाशक, व्रणनाशक, रुचिकारक, गरविषहर, उदररोगनाशक, आयुवर्धक, वामक और विरेचक मानी जाती हैं ॥ ४६, ४७ ॥ अपि च रविप्रियन्तु सुमृतं परं शूलनिषूदनम्। अम्लपित्तप्रशमनं यकृत्प्लीहोदर ऽपहम् ॥ ४८ ॥ अपस्मारप्रशमनं विषूचीवमिनाशनम्। आक्षेपापहमत्यन्तं तथा खल्लीप्रणाशनम् ॥ ४६ ॥ अग्निमान्द्यहरञ्चैवं परिणामाख्यशूलनुत्। अन्यच्चोपान्तकृच्छ्रञ्चापि समाख्यातं भिषग्वरैः ॥ ५० ॥

उभयतः परिशोधनं पक्वशुद्धामृतीकृतदशायां प्रभावात् दोषनिःसारकत्वा- दिति । विषूचीं वमिञ्चेति समुच्चयः । आक्षेपो वातव्याधिविशेषः ॥४८-५०॥ भा.टी.—ताम्रभस्म उत्तम शूलनाशक, अम्लपित्तशामक, यकृत्प्लीहारोगहर, अपस्माररोगनाशक, विसूचिका तथा वमनरोग निवारक है । इसके प्रयोग से शरीर में होनेवाले आक्षेप तथा खल्ली आना बन्द हो जाता है । पुरातन अग्नि- मान्द्य रोग तथा परिणामशूल के लिये यह उत्तम गुणकारक मानी जाती है । आंतों में होनेवाले क्षय रोगों की उत्तम औषधि मानी गयी है ॥४८-५०॥ वक्तव्य—ताम्रभस्म आमाशय के लिये बल्य तथा आंतों के लिये ग्राही एवं उत्तम जीवाणुहर है। ताम्रभस्म आंतों की वातनाड़ियों के क्षोभों को शान्त करने के कारण शूलहर भी है। हृदय तथा श्वास संस्थान के लिये ताम्रभस्म का प्रभाव मन्दताकर है, क्योंकि इसको देने से इन केन्द्रों में मन्दता आ जाती है अतः क्षोभनिवारक है । ताम्रभस्म नाड़ीसंस्थान के लिये उत्तम बल्य है । इसके द्वारा वातनाड़ीजन्य उपद्रवों का शमन होता है । त्वचा के लिये यह सोमल के समान ही त्वच्य या बल्य है । ताम्रभस्म के प्रयोग से यकृत्प्लीहावृद्धि घट जाती है । क्योंकि ताम्रभस्म सेवन करने के बाद यह यकृत्प्लीहा में सञ्चित पाया जाता है । इसलिये प्लीहासञ्चित विषमज्वर के जीवाणुओं पर सम्भवतः ताम्र- भस्म का घातक प्रभाव होता है । आमाशय में उत्पन्न हुए फोड़े में, वातप्रधान कफप्रधान मांसार्बुद में ताम्रभस्म का अच्छा प्रभाव देखा जाता है । ताम्रभस्म के प्रयोग से पित्ताशयशोथ शान्त होती है जिससे पित्ताश्मरी नहीं होने पाती है। ताम्रभस्म के सेवन से यकृत्पित्त का स्राव ठीक रूप से और नियमितरूप से होने लगता है। अतः ताम्रभस्म यकृत्शोथ वृद्धिजन्य जलोदर में अत्यन्त लाभ- दायक होती है । ताम्रभस्म लेखनगुण होने से पाचकसंस्थान की कफग्रन्थि, गुल्म आदि में लाभ करती है । विसूचिका की अन्तिम अवस्था में जब हृदय- दुर्बलता के कारण नाड़ी क्षीण हो जाती है और शीतांग हो जाता है तो ताम्र- भस्म हृदय को अतिबल पहुँचाती है । विसूचिका की प्रथमावस्था में देने से यह विसूचिका दोष में कृमियों को ही मार देती है । और विसूचिका में हाथ पैरों में होनेवाले ऐंठन भी शान्त हो जाते हैं । ताम्रभस्म वक्षोदरमध्यस्थ मांसपेशी के लिये बल्य होने से हिक्कारोग में लाभदायक होती है। अम्लपित्त तथा परिणामशूलरोग में ताम्रभस्म सञ्चित पित्त को निकालने और फिर-पित्त- स्राव को नियमित करने के लिये दी जाती है ।

४२२ रसतरङ्गिणी निष्क्रमण—ताम्र मल, मूत्र, स्वेद, पित्त तथा लालास्राव द्वारा शरीर से बाहर निकलतां है । अतः ताम्र का उक्त आन्त्र आदि अंगों में विशेष प्रभाव होता है । ताम्रविकार—अशुद्ध ताम्र खाने से उक्त वमन, भ्रम, दाह आदि विकार उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसी दशा में रोगी को विरेचन देकर शीघ्र ही ताम्र को शरीर से बाहर निकाल देना चाहिये और धनियाँ का शीतकषाय दिन में तीन- चार बार पिलाना चाहिये । भोजन मे दूध, चावल और घृत देना चाहिये । विशिष्टगुणाः मृतन्तु ताम्रं शमयत्यवश्यं शाखाश्रितं कोष्ठसमाश्रितं वा । जत्रूर्ध्वगञ्चापि मलाभिधानं पित्तं कफञ्चापि परं प्रवृद्धम् ॥५१॥ अवश्यमिति नियतानुभवः । शाखा बाहू सक्थिनी चेति, यत्तु शाखारक्ता- द्यस्त्वक् चेति प्राचीनपरिभाषितम् , तस्यात्र नोपयोगः, तावता कोष्ठादिग्रहणा- भावप्रसङ्गात् । जत्रु ग्रीवासन्धिः । मलाभिधानमिति प्रसादमलभेदेन धातुद्वै- विध्यं प्रसिद्धं चरकादौ, तत्र मलरूपमिति भावः ॥ ५१ ॥ भा.टी.—मृतताम्र भस्म का प्रयोग करने से शाखा ( हाथ पैर ) और कोष्ठ ( आमाशयादि ) के रीग और गले के ऊपरी भाग में स्थित वात तथा कफजन्य रोग दूर होते हैं । ॥ ५१ ॥ ताम्रस्य मात्रानिरूपणम् अष्टमांशाद्रक्तिकाया रक्तिकार्द्धमितं परम् । मृतं ताम्रं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ५२ ॥ मात्रानिर्देशः कालबलापेक्षया अवश्यं करणीय इति तदेतदुक्तं बलका- लाद्यपेक्ष्येति ॥ ५२ ॥ भा.टी.—शुद्ध ताम्र के भस्म को बल-काल आदि का विचार करके एक चावल ( १/८ रत्ती) से लेकर आधी रत्ती तक मात्रा में प्रयोग करना चाहिये ॥५२॥ अथ मृतताम्रस्य आमयिकः प्रयोगः समरसवलिनिम्बूद्रावपिष्ट्या विपक्वम् त्रिकटुमरिचयुक्तं रक्तिकार्द्ध तु ताम्रम् । अपहरति नितान्तं हस्तकम्पादिवातं त्वपनयति च कामं पक्षाघातादिरोगान ॥५३॥

सप्तदशस्तरङ्गः ४२३ गुञ्जार्द्धमात्रं खलु सूर्यलोहं द्विरक्तिकोशीररजोविमिश्रम् । सनागपुष्पं शिशिरेण वारा पीतं हरत्येव जवेन मूर्च्छाम् ॥५४॥ रविप्रियं शीलितमाज्ययुक्तं दुरालभाक्वाथविमिश्रितन्तु । विन्नाशयत्याशु गदं भ्रमाख्यं यथा समीरः खलु मेघवृन्दम् ॥५५॥ करञ्जबीजोत्थरजोविमिश्रं गुञ्जार्द्धमात्रं मृतसूर्यलोहम् । पित्तोद्भवं वापि कफोत्थितं वा शूलं निहन्यान्नहि संशयोऽत्र ॥ ५६॥ कटुत्रिकाख्यं मृतशङ्खयुक्तं गुञ्जार्द्धमात्रं खलु सूर्यलोहम् । प्लीहानमत्युग्ररुजं समन्ताद् निहन्ति मासैकनिषेवणेन ॥५७॥ वराटभस्मसंयुक्तं द्विगुञ्जजीरकान्वितम् । रविप्रियन्तु शीलितं निहन्ति सूतिकामयम् ॥ ५८ ॥ कणाचूर्णसमायुक्तं मधुना परिशीलितम् । रविप्रियं समाख्यातं त्वग्निसन्दीपनं परम् ॥५९॥ धात्रीचूर्णसमायुक्तं ताम्रं गुञ्जाद्वैसम्मितम् । अम्लपित्तं निहन्त्याशु वृक्षं शक्राशनिर्यथा ॥६०॥ भार्ङ्गीवभीतकोपेतं गुञ्जार्द्धप्रमितं मृतम् । ताम्रं क्षौद्रेण संलीढं कासश्वासं व्यपोहति ॥६१॥ नागपुष्पाभयामिश्रं ताम्रकं मधुसंयुतम् । शीलितं मासमात्रेण सर्व्वाण्यर्शांसि नाशयेत् ॥ ६२ ॥ अश्वत्थवल्कभस्माढ्यं रविलोहन्तु शीलितम् । गुञ्जापादांशमात्रेण छर्दिं जयति दारुणाम् ॥६३ ॥ बीजपूरद्रवोपेतं रविलोहं समाक्षिकम् । निषेवितं निहन्त्याशु हिक्काः पञ्च सुदारुणाः ॥६४॥ रविलोहं तु सुमृतं केवलं बलिजारितम् । अञ्जनाद्विनिहन्त्याशु दोषान्पटलसंश्रितान् ॥ ६५ ॥ कटुत्रिकाख्यं खलु सूर्यलोहं कणाशिफाचूर्णयुतं तु लीढम् । क्षौद्रेण सप्ताहनिषेविते तु द्रुतं यकृद्दाल्युदरं निहन्ति ॥६६॥ कटुत्रिकक्षोदयुतं सघृतं रविलोहकम् । निहन्ति मधुना गुल्मतीसारांन् विशेषतः ॥ ६७ ॥ ताम्रं समविषं धूत्तद्रवेण परिभावितम् । शीलितं त्वार्द्रकद्रावैः सन्निपातं व्यपोहति ॥६८॥

४२४ रसतरङ्गिणी आर्द्रकस्वरसोपेतं ताम्रं तु परिशीलितम् । नागिनीवल्लमध्यस्थं गुल्मरोगं व्यपोहति ॥ ६९ ॥ रससिन्दूरसंयुक्तं रविलोहमनारतम् । कण्टकारीफलोद्भूतरजसा परिशीलितम् ॥ ७० ॥ सशब्दमाक्षेपयुतमानीलाननमण्डलम् । प्ररुद्धश्वासनिश्वासं कासं नाशयति द्रुतम् ॥ ७१ ॥ अत्यल्पमात्रया ताम्रं दग्धाश्वत्थत्वचाम्भसा । बर्हिपक्षविभूतिर्वा छर्दिं जयति दुर्जयाम् ॥ ७२ ॥ व्योषचित्रकणामूलमांसीभाङ्गींकषायतः । पिप्पल्यादिगणक्वाथयुतं वा रविलोहकम् ॥ ७३ ॥ तीव्रहृच्छूलसंयुक्तं तथाक्षेपसमन्वितम् । शीलितं नाशयत्याशु शूलं मक्कल्लसंज्ञकम् ॥ ७४ ॥ ताम्रं समस्वर्णयुतं जटामांसीरजोऽन्वितम् । शीलितं विनिहन्त्याशु त्वाक्षेपमतिदारुणम् ॥ ७५ ॥ प्रबद्धमुष्टिकं काममानीलाननमण्डलम् । पानाशानादिसमये घुर्घूरायितकण्ठकम् ॥ ७६ ॥ अत्यल्पकालिकं वापि दारुणं दीर्घकालिकम् । तथा पादोदरगतां खल्लीं खल्वतिदारुणाम् ॥ ७७ ॥ रेणुकाशुण्ठिकाकन्यासारदारुसितान्वितम् । अनारतं विशेषेण रविलाहं तु शीलितम् ॥७८॥ निम्नोदरे वक्षसि वा युतमाक्षेपपीडया । सचीत्कारं संप्रलापं दारुणाथ्यथान्वितम् ॥ ७९ ॥ सवर्मिं वा विषमिषायुतखल्लोसमन्वितम् । बाधकं वा रजारोधं विनाशयति सत्वरम् ॥ ८० ॥ रससिन्दूरसंयुक्तं सुमृतं ह्यमृतीकृतम् । शीलितं रविलोहे तु मर्कपूरसंयुतम् ॥८१॥ श्वेतातितरलात्यच्छमलां भूयस्तृषान्विताम् । पादयोरुदरे वापि भृशं खल्लीसमन्विताम् ॥ ८२ ॥ प्रक्षीणनाडिकां काममानीलाननमण्डलाम् । शीलितं शमयत्याशु दारुणां तु विषूचिकाम् ॥ ८३ ॥

सप्तदशस्तरङ्गः ४२५ कज्जलरससिन्दूरयुतं ताम्रं तु शीलितम् । आनीलङ्गं चातिफेनं परिश्रान्तकनीनिकम् ॥ ८४ ॥ सक्रन्दनं सचीत्कारं वारन्धाक्षेपमुल्बणम् । आरटत्प्रचलद्दन्तमपस्मारं विनाशयेत् ॥ ८५ ॥ लोहस्वर्णसमायुक्तं ताम्रं गन्धकजारितम् । शीलितं नाशयेत्याशु श्वासं परमदारुणम् ॥ ८६ ॥ प्रचुराक्षेपसंयुक्तमानीलमुखमण्डलम् । आश्वासपथसङ्कोचक्रियाप्रत्ययकारणम् ॥ ८७ ॥ तिक्तामृता पर्पटककिराताब्दकषायतः । ताम्रं तु शीलितं हन्ति पुनरावर्तकञ्ज्वरम् ॥ ८८ ॥ पुनर्नवानिशामेषशृङ्गीद्रवविभावितम् । ताम्रं गन्धहतं ख्यातं व्रणशोधनरोपणम् ॥ ८९ ॥ रविलोहं बलिहतं तोलकैकमितं शुभम् । तोलकाष्टमितं चैव सुघृष्टं रक्तचन्दनम् ॥ ९० ॥ भावितं भृङ्गुनीरेण तत्त्ववारं प्रयत्नतः । मधुनाञ्जनतः ख्यातं तिमिरापहमूत्तमम् ॥ ९१ ॥ तारताप्ययुतं ताम्रं चित्रकद्रवभावितम् । सूर्यावर्तादिकान् घोरान् शिरोरोगान् विनाशयेत् ॥ ९२ ॥ यवजाऽऽलसमायुक्तं रसगन्धकजारितम् । शीलितं रविलोहं तु मतं कुष्ठापहं परम् ॥ ९३ ॥ मृतताम्रस्य रोगयोग्यः प्रयोगः—समरसबलिनिम्बूद्रावपिष्टथा विपक्वमिति रीत्यानया सपारदं ताम्रभस्मैव कृतमपनयति वातरोगसङ्घमिति भावः । ताम्रभस्म ३ गुञ्जा, उशीररजः २ रक्तिका, नागकेसरम् १ गुञ्जा, शीतजलं पलैकमिति मूर्च्छानाशोपयोगियोगः । भ्रमाख्यं रजःपित्तानिलाज्जाता चक्रारूढस्येव चेष्टा शिरोधूर्णनप्रायका या भ्रमः, ननु मिथ्याज्ञानरूप इति । करञ्जबीजोत्थरजोकि- मिश्रमिति— आहुश्च—“एक एव कुबेराक्षो हन्ति शूलशतानि च । किम्पुनर्यदि लभ्येत ताम्रभस्मसमन्वितः ॥” इति । तदेतद् ध्वनितं नहि संशय इति । मासैक- निपेवणेन इत्यवधिः क्रमापचययोगदशकः प्लीहः । सूतिकामयः “अङ्गमर्द्दो ज्वरः कम्पः पिपासा गुरुगात्रता । शोफः शूलातिसारौ च सूतिकारोगलक्षणम् ॥” इत्युक्तः, कणा पिप्पली, वृत्तं शक्राशनिर्यथेति शीघ्रतायां दृष्टान्तः । नागपुष्पं

४२६ रसतरङ्गिणी नागकेसरम्, रूक्षार्थिकं समधु । कणाशिफा पिप्पलीमूलम् । समविषं वत्सना- भसमानमात्रम्, नागिनीदलं ताम्बूलपत्रम् । अनरतं निरन्तरम् । कासविशेषणं भ्रशमतिमोहमोपाय । दग्धाश्वत्थत्वचाम्भसा इति पूर्वयोगात् किञ्चिद्विशेषः । मक्कल्लशूलं सूत्यामये प्रसिद्धम् । प्रबद्धमुष्टिकमित्यादिना दारुणाक्षेपस्यैव वर्णनं कृतमिति । तथा इति समुच्चयार्थः । कन्यासारः "मुसव्वर" इति ख्यातः, दारु- सिता त्वक्, वियमिषा वमनेच्छा । अमृतीकृतमिति विशेषतः सावधानीकरणम् । सर्वत्र भक्षणेऽमृतीकृतस्यैव प्रयोगव्यवहारात् । मदः कस्तूरिका । श्वेताचितरला- त्यच्छमलां मण्डसङ्काशमलामिति भावः । खल्ली वातव्याधिविशेषः—"खल्ली तु पादजङ्घोरुकरमूलावमोटनी" इत्युक्तः । निगदव्याख्यातमन्यत् । अपस्मार- विशेषोपन्यासः तत्रैकव्यवहाराय । प्रत्ययोऽनुभूतिः । पुनरावर्तकः निवृत्त्य पुनरा- गतः । पुनर्नवादिस्रवरसविभावितं केवलगन्धहतं ताम्रं लेपात् व्रणान् शोधयति च । तत्त्ववारं चतुर्विंशतिवारम् । आदिपदेन अर्धावभेदकादिग्रहणम् ॥५३-६३॥ भा.टी.—शुद्ध ताम्रचूर्ण में समभाग शुद्ध पारद और शुद्ध गन्धक मिला नींबू के रस में मर्दन कर सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँककर बनायी ताम्रभस्म में सोंठ, मिर्च और पिप्पलीचूर्ण मिला आधी रत्ती ताम्रभस्म का सेवन कराने से यह हस्तकंप, ग्रीवाकंप तथा पक्षाघात आदि वातरोग नष्ट हो जाते हैं । आधी रत्ती ताम्रभस्म में दो रत्ती खस का चूर्ण, दो रत्ती नागकेशर मिलाकर शीतल जल के साथ सेवन करने से मूर्च्छा रोग में बहुत शीघ्र आराम आता है । ताम्रभस्म को गोघृत में मिलाकर रोगी को चटा दें, इसके अनन्तर दुरालभाक्वाथ पिलावें तो भ्रम रोग शीघ्र शान्त हो जाता है । पित्तप्रकोपजन्य अथवा कफप्रकोपजन्य शूल में आधी रत्ती ताम्रभस्म को दो रत्ती करञ्जबीजचूर्ण के साथ सेवन कराने से निःसन्देह लाभ होता है। आधी रत्ती ताम्रभस्म को सोंठ, मिर्च, पिप्पलीचूर्ण तथा शंखभस्म में मिलाकर उचित अनुपान के साथ एक मास तक निरन्तर सेवन करने से अत्यन्त बढ़ी हुई प्लीहा में अवश्य आराम आ जाता है । सूतिका रोग में ताम्रभस्म आधी रत्ती लेकर उसमें दो रत्ती कर्पूरभस्म, दो रत्ती जीराचूर्ण मिलाकर गरम जल अथवा दशमूलकषाय अनुपान से सेवन किया जाता है। अग्निसंदीपन के लिए ताम्रभस्म को पिप्पलीचूर्ण में मिला- कर कुछ दिन सेवन किया जाता है। आधी रत्ती ताम्रभस्म को चार रत्ती आमलकी- चूर्ण में मिलाकर शीत जलानुपान से सेवन करनेपर शीघ्र ही अम्लपित्तरोग नष्ट हो जाता है । आधी रत्ती ताम्रभस्म भारंगी तथा बहेड़ाचूर्ण में मिला शहद के