रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशस्तरङ्गः ४०६ भा.टी.-जो ताँबा हथौड़े की चोट से फटता न हो किन्तु चपटा हो जाता हो, देखने तथा स्पर्श करने में चिकना, साफ और अड़हुल फूल के सदृश लाल रंग का और कोमल हो तो समझना चाहिये यह अच्छी खान का उत्तम ताम्र है॥३॥ प्रकारान्तरेण जात्यताम्रस्य स्वरूपम् स्निग्धं मृदु घनं स्वच्छं जपाकुसुमप्रभम् । लोहनागादिरहितं जात्यं ताम्रं प्रकीर्तितम् ॥४॥ प्रकारान्तरेण निर्देशः स्फुटार्थः । स्वच्छं निर्मलम् ॥४॥ भा.टी.-चिकना, मृदु, कठोर, साफ देवीपुष्प की तरह और लौह सीस इत्यादि दोष से रहित ताम्र अच्छा होता है ॥ ४ ॥ त्याज्यताम्रस्य स्वरूपम् सदलं पाण्डुरञ्चैव कठिनं लघु भंगुरम् । समलं त्वरविन्दन्तु वर्जयेद्रसकर्मणि ॥५॥ घनघातासहं कृष्णं श्वेतं लाहादिसङ्गतम् । अतिस्तब्धञ्च रूक्षञ्च ताम्रं त्याज्यं निगद्यते ॥६॥ त्याज्यताम्रस्वरूपं निगदव्याख्यातम् । उक्तञ्च—"कृष्णं रूक्षमतिस्तब्धं श्वेतं चापि घनासहम् । लोहनागयुतं शुल्बं म्लेच्छं दुष्टं मृतौ त्यजेत् ।।" इति । अत्र च व्यस्तैः समस्तैरपि लक्षणैर्भवति त्याज्यमित्यवधेयम् ॥५, ६॥ भा.टी.—पत्रयुक्त, पाण्डुर (पीला सफेद लाल) वर्ण, बहुत कठिन (सख्त), लघुभार, शीघ्र टूटनेवाला, लोह आदि धातु मलयुक्त ताम्र को शोधन-मारण कार्य में नहीं लाना चाहिये । अथवा हथौड़े की चोट से फटनेवाला, कृष्णवर्ण या श्वेतवर्ण, लौहादि-धातु-मिश्रित तथा अत्यन्त कठोर ताम्र शोधनमारण-कार्य में नहीं लाना चाहिये ॥५, ६॥ ताम्रस्य द्वैविध्यम् नेपालं म्लेच्छकं चेति ताम्रं द्विविधमुच्यते । नेपालं जात्यमाख्यातं म्लेच्छकं त्ववरं स्मृतम् ॥७॥ एवञ्च ताम्रं नेपालं म्लेच्छकमिति द्विविधं प्राचीनैः देशभेदोत्पत्तिगुणरूप- विशेषादुक्तम् ॥७॥ भा.टी.-ताम्र के दो भेद होते हैं । १-नेपालताम्र, २-म्लेच्छताम्र । इनमें से नेपाल संज्ञक ताम्र जात्य ( उत्तम ) हौता है और म्लेच्छ संज्ञक ताम्र अधम ( निकम्मा ) होता है ॥७॥