रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०८ रसतरङ्गिणी अस्य प्रयोगविधिः उत्तराह्वयवस्त्युक्तरीत्या युक्तस्स्वयं द्रवः। निहन्ति व्रणमेहञ्च श्वेतप्रदरजां रुजम् ॥१२३॥ इति रजतविज्ञानीयो नाम षोडशस्तरङ्गः भा.टी.-उक्त तृतीय प्रकार का सोरकाम्लीय रजतद्रव उत्तरवस्ति की विधि से प्रयोग करने पर व्रणमेह तथा श्वेतप्रदर रोग में लाभ पहुँचाता है ॥१२३॥ यह रजतविज्ञानीयनाम षोडशतरङ्ग समाप्त हुआ । —:०:— अथ ताम्रविज्ञानीयः सप्तदशस्तरङ्गः ताम्रस्य नामानि ताम्रं शुल्वं रक्तकं म्लेच्छवक्त्रं नेपालीय व्यम्बकं सूर्यलोहम् । त्वाष्ट्रं त्वर्कं सूर्यपर्यायसंज्ञं द्विष्ठं द्वयष्ठं त्वम्बकं कीर्तितं तत् ॥१॥ उदुम्बरञ्चारविन्दं सूर्याङ्गं लोहितायसम् । रविप्रियं भास्करं च ताम्रकं च प्रकीर्तितम् ॥२॥ ताम्रनामानि यावदुपलब्धग्रन्थव्यवहृतानि ॥१, २॥ भा.टी.—ताम्र, शुल्व, रक्तक, म्लेच्छवक्त्र, नेपालीय, त्र्यम्बक, सूर्यलोह, त्वाष्ट्र, अर्क, सूर्य के नामवाला अर्थात् भानु, रवि, उष्णांशु, सहस्रांशु आदि द्विष्ठ, द्वयष्ठ, अम्बक, उदुम्बर, अरविन्द, सूर्याङ्ग, लोहितायस, रविप्रिय, भास्कर तथा ताम्रक, ये सब नाम ताँबे के कहे जाते हैं ॥१, २॥ वक्तव्य—ताम्रधातु प्रकृति मे स्वतन्त्र रूप से मिलता है । परन्तु यह कहीं भी शुद्ध रूप में उपलब्ध नहीं होता है, किन्तु सोमल, गन्धक, लौह, कज्जल और उष्मजन आदि से संयुक्तावस्था में पाया जाता है । इसी तरह भूनाग (केंचुआ), मयूरपिच्छ तथा त्रिफला आदि द्रव्यों में ताम्र पाया जाता है । इनसे सत्त्वपातनविधि से ताम्र को पृथक् किया जाता है। यह प्रकृति में स्वर्णमाक्षिक, तूतिया और सोमलिक स्वर्णमाक्षिक आदि रूप में हमें मिलता है । ग्राह्यताम्रस्य स्वरूपम् घनघातसहं सुचिक्कणं विमलञ्चाथ जपासुमप्रभम् । मृदु चैव सदाकरोद्भवं रविलोहं खलु कीर्तितं परम् ॥३॥ ग्राह्यताम्रं घनघातसहादिगुणं सदाकरोद्भवं इति योग्यतानिर्णायकं वचनम्, सदाकरजातं हि उक्तगुणं भवतीति ॥३॥