रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ रसततरङ्गिणी अथ रसतरङ्गिण्या अलौकिकत्वं ध्वनयति युग्मकेन सशिलापीति । लोको- पलब्धा हि तरंगिणी नदी शिलापाषाणयुता चेदाघातविशिष्टा, ससर्पा च भय- प्रदा जलजन्तुसमन्विता चेत् प्रविष्टपुरुषप्राणहरा च, सजलशब्दा चञ्चला च, इयन्तु सह शिलया=मनःशिलया उपलक्षितापि निराघाता=सङ्घट्टनवर्जिता, सनागा=सीसकयुतापि भयोझिता=निर्भयसाधना, ससत्त्वा=अभ्रकादिसत्त्वयु- तापि निराबाधा=प्राणबाधारहिता, घोषः=कांस्यं तद्युतापि स्थिरक्रिया=निश्चि- त्तगुणसाधना च, सेयमध्यापकाध्येतृणां सुखावगाहा सरसवर्णानायुक्तत्वेन सुख- प्रवेशा भृशं = अत्यर्थं बोभूयात्=आस्तामित्याशिषः । जयतीत्यस्याः सर्वोत्कर्षो बोधितः ॥६, १०॥ भा.टी.-अपने ग्रंथ की उत्तमता बताते हुए रसों का तरंग है जिसमें ऐसी, रसतरंगिणी की, गंगा इत्यादि पवित्र नदियों से तुलना करते हैं- जहाँ नदियों में पत्थर का चट्टान इत्यादि रहता है वहाँ आघात अवश्य रहता है और जहाँ सर्प रहता है वहाँ भय अवश्य रहता है पर इस रसशास्त्र रूपी नदी में शिला ( मैनशिल ) और नाग ( सीसा ) के रहते हुए सुख- पूर्वक प्रवेश करने योग्य है ॥९॥ जहाँ सत्त्व, मारक जीव ( नक्रादि ) रहते हैं वहाँ बाधा अवश्य होती है और जहाँ नदी में = भ्रमर (चकोह) रहता है वहाँ कोई कार्य स्थिर नहीं होता है । पर सत्त्व ( अभ्रक धात्वादि सत्त्व, एवं घोष (कांसा) इत्यादि के रहते हुए भी इस रसशास्त्र में सुखपूर्वक प्रवेश कर सकते हैं । अतः इस रसतरं- गिणी की जय हो ॥ १० ॥ रसवैद्यस्य प्रशंसा तत्तत्संस्काररीत्या सपदि रसवरः शोधितः स्यान्न यावद् यावद्वा मारितः स्यात्सकृदपि न रसो नो कृता स्याद्बुभुक्षा । यद्वा नैवाभ्रसत्त्वं खलु कृतमथवा जारितं वा सुवर्णं प्राणाचार्यः क्व तावद्भवति हि भिषजां मण्डले मण्डनीयः॥११॥ अथ चिकित्साप्रधानपादं रसवैद्यं स्तौति स्रग्धरया, तत्तदिति--मारणं भस्मत्वापादनं, बुभुक्षा पारदस्य धात्वादिश्राससामर्थ्यम्, एतावता च पारद- संस्कारादि जारणान्तं कर्म भिषग्वपुणावश्यं ज्ञातव्यमिति ध्वनितम् ॥११॥ भा.टी.-जो वैद्य भिन्न-भिन्न संस्कारों द्वारा पारद का अच्छी तरह से शोधन कर लेता है और जो पारद का मारण (भस्म) तथा पारद को बुभुक्षित (धातुओं