भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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प्रथमस्तरङ्गः ५ को खा जानेवाला ) नहीं कर लेता है और जो पारद में अभ्रक सत्त्व तथा स्वर्ण का जारण नहीं कर सकता है वह किस तरह वैद्यसमुदाय में माननीय हो सकता है अर्थात् उपर्युक्त गुण होने पर ही श्रेष्ठ रसवैद्य हो सकता है ॥११॥ कृतिरियमिह दोषैराचिता स्यान्मदीया यदि तदपि न धीरैः काप्युपेक्षा विधेया । कृमिशतपरिपूर्णा कण्टकाकीर्णकाया स्वनसि नहि नरेन्द्रैरर्प्यते केतकी किम् ॥१३॥ अथ दोषैकदृष्ट्या नेयमुपेक्षणीयेति दृष्टान्तयति कृतिरियमिति—दोषभरिता- पीयं मत्कृतिः धीरैर्नोपेक्षणीया, इति नात्राधीराः प्रार्थ्यन्ते तेषामुपेक्षण-स्वभाव- त्वात्, यतः कृमिशतैः पूर्णा अथ च कण्टकव्यासशरीराऽपि केतकी नरेन्द्रैः किं स्वनसि = स्वकीयनासिकायां नार्प्यते ? अति त्वपर्यत एव । तथा च विधूय पुरोभागितां गुणैकग्रहिभिर्भव्यैर्भाव्यमिति भावः ॥ १२ ॥ भा.टी.—यद्यपि इस मेरी कृति में अनेकों दोष होंगे फिर भी धीर वैद्यों को इसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, क्या सैकड़ों कृमियों से परिपूर्ण और काँटों से युक्त केतकी ( केवड़ा ) के पुष्प को राजवर्ग नासिका पर नहीं रखते हैं अर्थात् सुगन्ध नहीं ग्रहण करते हैं, किन्तु ग्रहण करते ही हैं ॥ १२ ॥ रसशाला विमलोपवनप्रदेशगां रमणीयां जलयन्त्रशोभिताम् । कमनीयगवाक्षसंयुतां जनबाधारहितामसंकुलाम् ॥१३॥ निखिलौषधवर्गमण्डितां रससिद्धेश्वरचित्रभूषिताम् । विपुलाखिलसाधनान्वितां रसशालां विदधीत शोभनाम् ॥१४॥ अथ साधनप्राथम्यादुपक्रमो रसशालायाः—विमलेत्यादि, वियोगिनीवृत्त- युगलेन—विमले उपवनप्रदेशे स्थापितां, उपवनस्य औषधिसुलभताजनकत्वात् रजोधूमादिबाधारहितत्वात् रम्यत्वाच्च । औषधव्याघातभयात् जनबाधारहिताम्, असङ्कुलां = असङ्कीर्णाम् , निखिलौषधवगैंण रसक्रियोपयोगिभेषजसमूहेन, रस- सिद्धेश्वराः श्रीशङ्करादयः, तेषां चित्रैः भूषितां श्रद्धाप्रोत्साहनहेतोः । स्पष्टमन्यत् ॥ १३-१४ ॥ भा.टी.—औषधि निर्माण करने के लिए एक स्वच्छ उपवन (बगीचा) में जहाँ पर रहट या पानी का नल लगा हो और मनुष्यों के आने जाने से