रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ रसतरङ्गिणी जहाँ पर औषधि-निर्माण में कोई विघ्न न हो सके, ऐसी एक रसशाला (Pharmacy) बनानी चाहिये यह शाला विस्तृत और वायु के आने जाने के लिये सुंदर खिड़की तथा रोशनदानों से युक्त होनी चाहिए । इसमें सब औषधियाँ वर्ग-क्रम से रखी हुई और दीवारों पर रस-आचार्यों के चित्र टँगे होने चाहिये । इसमें औषधिसिद्धि के लिये काम में आनेवाले सब साधन पर्याप्त रूप में होने चाहिये ॥१३-१४॥ रसशालायां कर्मविभागः शङ्करं पूर्वदिग्भागे स्थापयेद्भिषजाग्रणीः । आग्नेये वह्निकार्याणि याम्ये प्रस्तरकृत्यकम् ॥१५॥ शस्त्रकृत्यन्तु नैर्ऋत्ये क्षालनादीनि वारुणे । वायव्ये शोषणं शस्तमुत्तरे यन्त्ररक्षणम् ॥१६॥ निदध्यादीशकोणे तु रससाधनमूलकम् । मुख्योपकरणं तत्तन्नित्यकृत्यं समागतम् ॥१७॥ अत्र च कर्मसौकर्यार्थं दिग्भेदेन रसशालायां कर्मविभागमाह-शङ्करं पूर्व दिग्भाग इति-शङ्करो रससाधकेष्टतमः, शङ्करप्रिय इत्याचार्यगुणेषूक्ते । वह्निका- र्याणि भ्राष्ट्रीप्रभृतीनि, प्रस्तरकृत्यं खल्वपेषणादिकम् । याम्ये=दक्षिणस्याम् , वारुणे=पश्चिमायाम् ॥ अन्यत् सुगमम् ॥ १५-१७ । भा.टी.-पुरानी प्रथा के अनुसार पूर्वोक्त रसशाला में पूर्व दिशा में शंकर की स्थापना करनी चाहिये और आग्नेय कोण में आग की भट्टी चूल्हा आदि बनाने चाहिये । दक्षिण दिशा में सिल खरल में पीसने रगड़ने का कार्य करने चाहिये । नैर्ऋत्य कोण में शस्त्र आदि से काटने आदि के कार्य करने चाहिये । पश्चिम दिशा में जल से धोने के कार्य करने चाहिये । वायव्यकोण में औषधि आदि को सुखाने के कार्य करने चाहिये । उत्तर दिशा में भिन्न- भिन्न प्रकार के यन्त्रों को बनाकर रखना चाहिये और ईशान कोण में पारद के शोधन-मारण में प्रतिदिन काम आनेवाले मुख्य-मुख्य उपकरणों को रखना चाहिये । जिससे काम करनेवालों को सुविधा हो और समय नष्ट न हो ॥ १५-१७ ॥ रसशालायां उपकरणद्रव्याणि द्रोणीरूपा वर्तुलाश्च खल्वाः पाषाणनिर्मिताः । आयसाश्चापि संग्राह्यास्तद्योग्याश्चैव मर्दकाः ॥१८॥