भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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अष्टादशस्तरङ्गः ४३७ भा.टी.—शुद्धिरहित अथवा ठीक प्रकार से भस्म न हुआ वंग सेवन किया जाय तो विकार उत्पन्न करने के कारण शारीरिक शोभा को बिगाड़ देता है और शरीर में कुष्ठ या श्वित्रकुष्ठ को उत्पन्न कर देता है। इसके अतिरिक्त शरीर में गुल्म, प्रमेह, क्षय, पाण्डु रोग, शोथ, श्लेष्मज्वर, हृदयरोग आदि तथा भगन्दर, शुक्राश्मरी और शरीर में रक्तविकार के कारण अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न करता है ॥ ६, ७ ॥ अथ वङ्गशोधनस्य प्रथमः प्रकारः खुराभिधानं खलु शुक्ललोहं निधाय दर्व्यां भिषजां वरेण्यः । चुल्लीगतञ्चाप्यथ गोलयित्वा विशुद्धचूर्णोदकपूर्णगर्भे ॥ ८ ॥ गाढन्तु सच्छिद्रपिधानकेन क्षिपेत्समाच्छन्नमुखे तु कुम्भे । इत्थं निषिक्तं भिषजाश्ववारं वङ्गं विशुद्धिं समुपैति नूनम् ॥ ६ ॥ वङ्गशोधनप्रकारः प्रथमः—अश्ववारं सप्तवारम्, निगदव्याख्यातमन्यत् ॥८,६॥ भा.टी.—खुरकसंज्ञक वंग को शुद्ध करने के लिये एक लम्बे बेटवाली लोहे की चम्मच या करछी में रखकर चूल्हे में गरम करें ! जब वंग पिघल जाय तो उसे एक पात्र में रखे हुए चूने के जल में पात्रमुख पर रखे हुए छिद्रयुक्त सिकोरे के ऊपर से डाल दें। शीतल होने पर वंग को निकाल फिर करछी में रख पिघलायें और चूर्णोदकवाले पात्र के मुख पर रखे हुए छिद्रयुक्त सिकोरे में से फिर चूने के जल में बुझा दें। इस विधि को सात बार दुहराने से वंग उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ ८, ६ ॥ वक्तव्य—वंग को पिघलाकर यों ही खुले मुख पात्र में रखे हुए जलीय द्रव, चूर्णोदक आदि में डालने से वह उछलकर आ जाता है और हाथ मुँह आदि जला देता है साथ ही यदि मिट्टी का पात्र हो तो वह भी वंग के उछलने से फूट जाता है और वंग खराब हो जाता है। अतः जहाँ तक हो सके किसी धात्वीयपात्र में द्रव को डालकर उसको जमीन में गाड़ दें और मुख पर एक भारी छिद्रयुक्त सिकोरा रखकर उसके द्वारा वंग पात्रगत द्रव में बुझावें । द्वितीयः शोधनप्रकारः वङ्गकं गलितं लोहदर्वीगतं सूर्य्यदुग्धे भृशञ्चैव निर्वापयेत् । पूर्वमार्गेण वै शेषकर्म्माचरेत् सप्त॒बरं वङ्गकं याति शुद्धिं पराम् ॥१०॥ सूर्य्यदुग्धे अर्कक्षीरे, भृशं त्रिवारं सप्तवारं वा। पूर्वमार्गेण अव्यवहितप्रदर्शि- तेन वङ्गशोधनस्य प्रथमप्रकारोक्तमार्गेण । शेषकर्म इहानुक्तमवशिष्टं कर्म कुम्भस्य