भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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अर्कदुग्धेन गर्भदेशपर्यन्तापूरणम्, सच्छिद्रसुदृढपाषाणपिधानेकेन तन्मुखस्या- च्छादनम्, गालितवङ्गस्य परिषेकसमये समुत्प्लवननिरासार्थं पाषाणेषटकादिभिः स्थिरीकरणादिकञ्च विदध्यादिति प्रघट्टाभिप्रायः ॥ १० ॥ भा.टी.—उक्त विधि से वंग को करछी में पिघलाकर पात्र में पड़े हुए आक के दूध में सात बार बुझाने से वंग शीघ्र ही उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ १० ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः वङ्गं द्रावितं सिन्दुवारद्रवे रात्रियुक्तं त्रिधा चेह निर्वापयेत् । शेषकर्म्माचरेत् पूर्व्वमार्गेण वै शुक्ललोहं द्रुतं याति शुद्धिं पराम् ॥ ११ ॥ द्रावितस्य तु वङ्गस्य द्रवादौ परिषेचने । औचित्येनाचरेन्नो चेदुत्प्लुत्योत्प्लुत्य निर्दहेत् ॥ १२ ॥ सिन्दुवारो नीलनिर्गुण्डी, रात्रिः हरिद्रा । उक्तं हि—"द्रावयित्वा निशायुक्ते क्षिप्तं निर्गुण्डिकारसे । विशुद्ध्यति त्रिवारेण खुरवङ्गं न संशयः ॥” इति । औचित्येन द्रुतवङ्गोत्प्लवनरोधनयुक्त्या आचरेत् शोधनमिति शेषः ॥ ११, १२॥ भा.टी.—वङ्ग को पिघलाकर एक पात्र में पड़े हुए हरिद्राचूर्ण युक्त निर्गुण्डीस्वरस में प्रथम विधि के अनुसार तीन बार बुझाने से वंग शीघ्र ही शुद्ध हो जाता है । वंग को पिघलाकर किसी द्रव में बुझाने में बड़ी सावधानी से काम लेना चाहिये, क्योंकि कई बार बुझाने पर पात्र में से उछल-उछल कर बुझानेवाले को जला देता है ॥ ११, १२ ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः वङ्गं प्रद्राव्य यत्नेन लोहदर्व्वीगतं ततः । निर्वापयेदम्लतक्रे पूर्व्वोक्तविधिना भिषक् ॥ १३ ॥ ततः कुमारिकाद्रावे तद्वदेव निषेचयेत् । अनेन विधिना वङ्गं शुद्धिमायाति सर्व्वथा ॥ १४ ॥ तक्रे कुमारीरसे च त्रिधा त्रिधा निर्वापणेन च शुद्धयति इति ॥ १३, १४ ॥ भा.टी.—खुरक-वंग को एक लोहे की करछी में रखकर अग्नि में पिघलायें, जब यह पिघल जाय तो उसे प्रथम विधि के अनुसार खट्टे मट्ठा में तीन बार और कुमारीस्वरस में तीन बार बुझा देने से वह अच्छी तरह शुद्ध हो जाता है ॥ १३, १४ ॥ अथ वङ्गमारणस्य प्रथमः प्रकारः विशुद्धं वङ्गमादाय कटाहे चुल्लिकास्थिते । विनिक्षिपेद् भिषग्वर्यश्चुल्लिकाग्निं प्रदीपयेत् ॥ १५ ॥