रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
अर्कदुग्धेन गर्भदेशपर्यन्तापूरणम्, सच्छिद्रसुदृढपाषाणपिधानेकेन तन्मुखस्या- च्छादनम्, गालितवङ्गस्य परिषेकसमये समुत्प्लवननिरासार्थं पाषाणेषटकादिभिः स्थिरीकरणादिकञ्च विदध्यादिति प्रघट्टाभिप्रायः ॥ १० ॥ भा.टी.—उक्त विधि से वंग को करछी में पिघलाकर पात्र में पड़े हुए आक के दूध में सात बार बुझाने से वंग शीघ्र ही उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ १० ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः वङ्गं द्रावितं सिन्दुवारद्रवे रात्रियुक्तं त्रिधा चेह निर्वापयेत् । शेषकर्म्माचरेत् पूर्व्वमार्गेण वै शुक्ललोहं द्रुतं याति शुद्धिं पराम् ॥ ११ ॥ द्रावितस्य तु वङ्गस्य द्रवादौ परिषेचने । औचित्येनाचरेन्नो चेदुत्प्लुत्योत्प्लुत्य निर्दहेत् ॥ १२ ॥ सिन्दुवारो नीलनिर्गुण्डी, रात्रिः हरिद्रा । उक्तं हि—"द्रावयित्वा निशायुक्ते क्षिप्तं निर्गुण्डिकारसे । विशुद्ध्यति त्रिवारेण खुरवङ्गं न संशयः ॥” इति । औचित्येन द्रुतवङ्गोत्प्लवनरोधनयुक्त्या आचरेत् शोधनमिति शेषः ॥ ११, १२॥ भा.टी.—वङ्ग को पिघलाकर एक पात्र में पड़े हुए हरिद्राचूर्ण युक्त निर्गुण्डीस्वरस में प्रथम विधि के अनुसार तीन बार बुझाने से वंग शीघ्र ही शुद्ध हो जाता है । वंग को पिघलाकर किसी द्रव में बुझाने में बड़ी सावधानी से काम लेना चाहिये, क्योंकि कई बार बुझाने पर पात्र में से उछल-उछल कर बुझानेवाले को जला देता है ॥ ११, १२ ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः वङ्गं प्रद्राव्य यत्नेन लोहदर्व्वीगतं ततः । निर्वापयेदम्लतक्रे पूर्व्वोक्तविधिना भिषक् ॥ १३ ॥ ततः कुमारिकाद्रावे तद्वदेव निषेचयेत् । अनेन विधिना वङ्गं शुद्धिमायाति सर्व्वथा ॥ १४ ॥ तक्रे कुमारीरसे च त्रिधा त्रिधा निर्वापणेन च शुद्धयति इति ॥ १३, १४ ॥ भा.टी.—खुरक-वंग को एक लोहे की करछी में रखकर अग्नि में पिघलायें, जब यह पिघल जाय तो उसे प्रथम विधि के अनुसार खट्टे मट्ठा में तीन बार और कुमारीस्वरस में तीन बार बुझा देने से वह अच्छी तरह शुद्ध हो जाता है ॥ १३, १४ ॥ अथ वङ्गमारणस्य प्रथमः प्रकारः विशुद्धं वङ्गमादाय कटाहे चुल्लिकास्थिते । विनिक्षिपेद् भिषग्वर्यश्चुल्लिकाग्निं प्रदीपयेत् ॥ १५ ॥
अष्टादशस्तरङ्गः ७३६ वङ्गात् कलांशकं सूतं विशुद्धं तत्र निक्षिपेत् । विशुद्धं हरितालञ्च स्वल्पं स्वल्पं मुहुर्मुहुः ॥ १५ ॥ निक्षिप्य वनकार्पासदण्डेन परिचालयेत् । यावद्भस्म भवेत्तावत्तालचूर्णं समापयेत् ॥ १८ ॥ ततः शरावेणाच्छाद्य पचेत्तीव्राग्निना भिषक् । अनेन विधिना वङ्गं पञ्चतां यात्यनुत्तमाम् ॥ १८ ॥ मारणस्य प्रथमः प्रकारः—कलांशिकं षोडशभागिकम् । हरितालं यथा- योग्यमानम् । तालचूर्णस्य भस्मपर्यन्तं समापनम् । भस्मोत्तरमपि शरावेणाच्छाद्य तीव्राग्निदानं निरुत्थताकरणार्थमित्यनुसन्धेयम् । एवमग्रेऽपि ज्ञेयम् । पञ्चतां मृत्युम् ॥ १५-१८ ॥ भा.टी.—एक लोहे की कड़ाही को अग्नि के ऊपर चूल्हे पर रखकर उसमें खुरकवंग डाल दें और वंग के साथ ही वंग से सोलहवाँ भाग शुद्ध पारा भी डाल दें और अग्नि को तेज कर दें। जब वंग पिघलने लगे तो उसमें थोड़ा-थोड़ा करके हरताल का चूर्ण डालें और जंगली कपास की गीली लकड़ी से वंग को चलाते जायें। जब तक वंग की भस्म न हो जाय तब तक हरतालचूर्ण डालते हुए कपास के डंडे से उसे चलाते रगड़ते जायें। जब वंग की भस्म हो जाय तो उसे कड़ाही के तले में एकत्र करके एक मिट्टी के सकोरे से ढककर फिर तेज अग्नि से पकायें। इस विधि से वङ्ग की भस्म बन जाती है ॥ १५-१८ ॥ वक्तव्य—हरतालचूर्ण डालते हुए रगड़ने पर वंग की भस्म होने पर फिर उसे ढककर तेज अग्नि देने से वह निरुत्थ हो जाती है। द्वितीयो मारणप्रकारः विमलं वङ्गमादाय चुल्लिकोपरिसंस्थिते । विनिक्षिपेत् कटाहे तु ततो वह्निं प्रदीपयेत् ॥१९॥ विद्रुतं वङ्गकं ज्ञात्वा रसकर्मविशारदः । पादांशापामार्गचूर्णं स्वल्पं स्वल्पं मुहुर्मुहुः ॥२०॥ निक्षिप्य लोहदण्डेन यत्नतः परिचालयेत् । वङ्गभस्म भवेद्यावच्चूर्णं तावत्समापयेत् ॥२१॥ राशीकृत्य ततो भस्म शरावेण पिधापयेत् । ततो दिनैकपर्यन्तं तथा वह्निं प्रदीपयेत् ॥२२॥ धवलदङ्गारवर्णं स्याद् वङ्गभस्म यथा ध्रुवम् । स्वतः शीतं ततो ज्ञात्वा वङ्गभस्म समाहरेत ॥२३॥
४४० रसतरङ्गिणी शङ्खकुन्देन्दुधवलं वङ्गभस्म भवेद् ध्रुवम् । इत्थं मृतं वङ्गकन्तु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥२४॥ अपामार्गचूर्णात्क्षेपाद् वङ्गभस्मनिर्माणं द्वितीयम् । वीतशङ्कः अपक्वताशङ्का- रहितः । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ १६-२४ ॥ भा.टी.—एक लोहे की कड़ाई को चूल्हे पर रखकर उसमें खुरकवंग डाल दें और चूल्हे में अग्नि जलायें । जब अग्निताप से वंग पिघल जाय तो उसमें वंग से चतुर्थांश अपामार्ग का चूर्ण थोड़ा-थोड़ा करके डालते जायं और लोहदण्ड या लोहे की करछी से उसे अच्छी तरह रगड़ते जायँ जब तक कि वंग की भस्म न हो जाय । वंग भस्म होने पर उसको कढ़ाही के तल प्रदेश में एकत्र करके एक मिट्टी के सकोरे से औंधा मुँह ढक दें और उसके नीचे एक दिन तक अग्नि जलायें जिसमें कढ़ाही की भस्म ढक्कन उठाकर देखने में जलते हुए अंगारों के समान लाल हो जाय । अत्र अग्नि देना बन्द कर दें और कढ़ाही को स्वांगशीत होने दें । स्वांगशीत होने पर कढ़ाही में से शंख, चन्द्रमा के समान श्वेतवर्ण की वंगभस्म को निकाल लें और इसको निःशंक होकर प्रयोग में लायें ॥१६-२४॥ तृतीयो मारणप्रकारः विशुद्धं वंगमादाय कटाहे गालयेद्भिषक् । पादांशिकविशुद्धञ्च तत्र सूतं विनिक्षिपेत् ॥ २५ ॥ दत्त्वा सम्मर्द्य यत्नेन द्रुतमेवावतारयेत् । वंगार्द्धं तालकं दत्त्वा खल्वे सम्पेपयेत्ततः ॥ २६ ॥ श्लक्ष्णचूर्णं ततः कृत्वा रविदुग्धेन मर्दयेत् । पिप्पलत्वक्समुत्थाच्छक्षारमध्यगतं भिषक् ॥ २७ ॥ शरावसम्पुटे न्यस्य र्लावकाख्यपुटे पुटेत् । इत्थं पुटद्वयेनैव वंगं तु मृतिमप्नुयात् ॥ २८ ॥ तृतीयः प्रकारः पारदतालकयोगसाध्यः-पिप्पलत्वक्समुत्थनिर्मल क्षारमध्ये स्थापनप्रकारश्च तालभस्मीकरणप्रकरणे भणितपरिभाषः ॥ २५–२८ ॥ भा.टी.-स्वच्छ खुरक वंग को डालकर उसको अग्नि पर चूल्हे में रख- कर पिघलायें और वंग में वंग से चतुर्थांश शुद्ध पारद भी डाल दें । पिघले हुए वंग में पारद डालकर मर्दन करके दोनों एक हो जाने पर शीघ्र ही कढ़ाही
अष्टादशतरङ्गः ४४१ को नीचे उतार कर वंग को एक खरल में डालें और उसमें वंग से आधा भाग शुद्ध हरताल का चूर्ण मिला खूब अच्छी तरह पीस लें । अब इस सूक्ष्मचूर्ण में आक का दूध मिला मर्दन करके छोटी-छोटी टिकिया बनाकर सुखा लें । अब एक हांडी में आधे भाग तक पीपल वृक्ष की त्वचा की राख भरकर उसपर वंग की टिकियों को रखकर फिर अवशिष्ट भाग में उक्त पीपल की राख अच्छी तरह दबा-दबा कर भर दें और चूल्हे पर पकायें अथवा एक सम्पुट में पीपल राखके बीच में वंग को रखकर उसको बन्द करके लावकपुट में फूँक दें । इस प्रकार दो पुटों में ही वंग की उत्तम भस्म हो जाती है ॥२७, २८॥ चतुर्थो मारणप्रकारः विशुद्धं वङ्गमादाय कटाहे गालयेद्भिषक् । शुष्कपिप्पलवल्कोत्थं चूर्णं तुल्यं विनिक्षिपेत् ॥ २६ ॥ स्वल्पं स्वल्पं मुहुश्चैव लोहदर्व्या प्रचालयेत् । ० ङ्गभस्म भवेद्यावच्चूर्णं तावत्समापयेत् ॥ ३० ॥ राशीकृत्य ततो भस्म शरावेण पिधापयेत् । ज्वलदङ्गारवर्णा स्याद् वङ्गभस्म यथा चिरम् ॥३१॥ तथा प्रदापयेदग्निं दिनमेकं भिषग्वरः । स्वतःशीतं ततो ज्ञात्वा सुमृतं वङ्गमाहरेत् ॥ ३२ ॥ बहुशः क्षालयेत्तोयैः क्षारहीनं यथा भवेत् । ततः सर्वप्रयोगेषु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ ३३ ॥ अस्य च क्षारांशबहुलतया प्रक्षालनम् । रक्तं वर्णकपत्रं आङ्गलभाषायां “Red Litmus Paper” इति नाम्ना प्रसिद्धम् वङ्गभस्म धावनाम्भसि निक्षिप्तं, चेन्नीलवर्णतां नोपेयात्तदा वंगभस्म धावनाम्भसि निक्षिप्तं चेन्नील- वर्णतां नोपेयात्तदा वङ्गभस्म क्षारशून्यं संजातमिति जानीयात्, अन्यथा सक्षा- रमिति व्यवस्येत् ॥ २६-३३ ॥ भा.टी.—शुद्ध खुरकवंग को एक लोहे की कड़ाही में डालकर चूल्हे पर अग्नि से तपायें । जब वंग पिघल जाय तो उसमें वंग के बराबर भाग पीपलवृक्ष की छाल के चूर्ण ( शुष्क ) को थोड़ा-थोड़ा करके डालते जायँ और वङ्ग को लोहे की करछी से रगड़ते या चलाते रहें । इस प्रकार जब वंग की भस्म हो जाय तो उसे कड़ाही के तलप्रदेश में इकट्ठा करके एक मिट्टी के सिकोरे से ढक दें और उसके नीचे एक दिन की तीव्र अग्नि जलायें । जब देखें कि
४४४ रसतरङ्गिणी भा.टी.-विधिपूर्वक बनाई हुयी वंगभस्म लघु, शीतल और रूक्ष गुणयुक्त होती है । यह बुद्धिवर्धक और रसों में तिक्त, कषाय और किञ्चित् लवणतायुक्त होती है । रोग और दोषों के विषय में वंगभस्म मेदोविकारनाशक, भोजन में रुचिकारक, रसायनगुणधर्मी, कफप्रकोपजन्य रोगशामक होती है । इसके प्रयोग से वमन शान्त होती हैं, व्रणविकार तथा सब प्रमेहविकार नष्ट होते हैं । इससे नेत्रोंकी शक्ति बढ़ती है और अच्छे विचार उत्पन्न होते हैं । यह क्षयरोगहर और अद्वितीय रूप से शुक्रवर्धक है । इसके सेवन से स्त्रियों का श्वेतप्रदर, व्रण, उदरकृमि नष्ट होते हैं । इसको कुछ काल नियमपूर्वक सेवन करने से कामशक्ति बढ़ती है, शरीर में साहस की मात्रा उत्पन्न होती है और सब शरीर का वर्ण निखर आता है तथा त्वचा सुन्दर हो जाती है । स्वप्न में होनेवाला वीर्यस्राव बन्द हो जाता है, जीर्ण कास तथा श्वास शान्त हो जाते हैं । प्रतिदिन सूखनेवाले मनुष्य इसके सेवन से मोटे होने लगते हैं । इसके द्वारा मैथुनिक बल तथा शारीरिक बल बढ़ता है । प्रसादसंज्ञक वायु (Vitality) का क्षोभ शान्त हो जाता है, पाण्डु रोग शीघ्र ही शांत हो जाता है । वंगभस्म के गुणों के विषय में बहुत कहने की आव- श्यकता नहीं; यह मनुष्यों के लिये हर प्रकार से सुख देनेवाली औषधि है । इसके सेवन से अपने स्थान से हटा हुआ गर्भाशय अपने स्थान पर आ जाता है, श्वास लेने में होनेवाला कष्ट नहीं रहता । राजयक्ष्मा रोग में उत्पन्न होनेवाला रात्रिखेद तथा अत्यन्त मात्रा में बढ़ा हुआ कफप्रकोप इसके द्वारा शान्त हो जाता है ॥ ३६-४२ ॥ विशिष्टा गुणा: मृतं तु वङ्गं परिशीलितन्तु विनाशयेन्नातिचिरेण नूनम् । चिरोत्थितं श्वासनलीविलग्नं कफं प्रवृद्धं मलनामधेयम् ॥४३॥ अपि च मृतन्तु वङ्गं परिशीलितं वै निवारयेन्नातिचिरेण कामम् । सर्वाङ्गगं मानसवैकृतोत्थं प्रसादसंज्ञं पवनं वृद्धम् ॥ ४४ ॥ नूनमिति दृढानुभवव्यापकम् । एवञ्च प्राचीनतन्त्रानुक्तमपि अनुभवविशेषात् शिष्यबुद्धिवैशद्यार्थमुक्तमिति । एवमेव प्रसादवातशान्तिरपि वङ्गाज्जायमाना नवाविष्काररूपैवेति विशेषः ॥ ४३-४४ ॥ भा.टी.-सम्यक् प्रकार मारित वङ्ग के सेवन करने से शीघ्र ही श्वासनली में चिपका हुआ पुरातन मलभूत कफप्रकोप अवश्य ही नष्ट हो जाता है । और
अष्टादशस्तरङ्गः ४४५ मानसिक विकृतिजन्य सर्वाङ्गीण प्रसादवायु का प्रकोप भी शीघ्र ही शान्त हो जाता है ॥ ४३, ४४ ॥ वक्तव्य—वंगभस्म अन्तःप्रयोग में शरीर के बहुमूत्र, शुक्रमेह, श्वेतप्रदर आदि अनेकविध स्रावों को बन्द करती है । अतः अन्तःप्रयोग में इसका ग्राही प्रभाव देखा जाता है । इसके प्रयोग से स्वेदवाहिनियों का क्षोभ शांत होता है और स्वेदाधिक्य कम हो जाता है । इसी तरह शरीर के किसी भाग से होने वाले अतिशय स्रावों तथा योनिभाग के स्रावों को भी वंगभस्म बन्द करती हैं । मूत्र तथा उत्पादक अङ्गों पर वङ्गभस्म का उत्तम बल्य प्रभाव होता है। शुक्रक्षय, स्वप्नमेह और इनसे होनेवाले रोगों में वंग सर्वोत्तम औषधि है—“वंगं भक्षयतां नरस्य न भवेत्स्वप्नेऽपि शुक्रक्षयः ।” तथा “सिंहो यथा हस्तिगणं निहन्ति तथैव वंगोऽखिलमेहवर्गम् ।” स्त्री सम्बन्धी विषय का अधिक चिन्तन आदि करने से जिन पुरुषों को वातनाड़ीजन्य उत्तेजना बढ़ जाने से स्त्री के स्पर्श से ही शुक्रस्ख- लन हो जाता है या पुरुष में घोर नपुंसकता आ जाती है उस अवस्था में वंग- भस्म वातकनाड़ियों के क्षोभ को शांतकर उनमें बल पैदा करती है। आजकल की गवेषणा ने वंग को स्रावी पामा ( ऐग्जीमा ) के लिये उत्तम औषधि निश्चित किया है । इस रोग में वङ्ग का योग “टिन् ओक्सीन” नामक औषधि अधिक व्यवहार में लायी जाती है। यदि वङ्गभस्म में शुद्ध गन्धक मिलाकर प्रयोग किया जाय तो “टिन् ओक्सीन” के सदृश ही लाभ होता है । वृद्धावस्था के कारण वृक्क, मूत्रवाही स्रोत, मूत्राशय आदि अंगों की निर्बलता होने पर अधिक मूत्रस्राव में वङ्गभस्म इन अंगों को बल देती है और मूत्र की मात्रा को कम करती है । वङ्गस्य औष्ण्यशैत्यजनने हेतुः वङ्गं गन्धादियोगेन मारितं तूष्णतां व्रजेत् । क्षारादिना मृतञ्चेह शीततां याति निर्भरम् ॥४५॥ वङ्गस्यौष्ण्यशैत्यभावहेतुस्तु अनुक्तपूर्वः स्फुटीकृत आचार्यैः ॥ ४५ ॥ भा.टी.—गन्धक, हरिताल आदि उष्णद्रवों के सहयोग से बनायी हुई वङ्गभस्म उष्ण प्रकृति की पायी जाती है। इसके विपरीत यवक्षार चिञ्चाक्षार आदि द्रव्यों के सहयोग से बनी हुई वङ्गभस्म शीत गुणयुक्त होती है। अतः आवश्यकता- नुसार इसको दोनों प्रकार की औषधियों से बनाकर प्रयोग में लाना चाहिये ॥४५॥ अस्य मात्रानिरूपणम् रक्तिकातः समारभ्य रक्तिकद्वितयसंमिताम् । पूणमात्रां प्रयुञ्जीत मृतवङ्गस्य कोविदः ॥४६॥
४४६ रसतरङ्गिणी अस्य मात्रानिरूपणं देशकालापेक्षया ज्ञापितम् ॥ ४६ ॥ भा.टी.—वंगभस्म की एक रत्ती से लेकर दो रत्ती पर्यन्त पूर्ण मात्रा समझनी चाहिये ॥ ४६ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः गुडूचिकासत्त्वरजोविमिश्रं मृतन्तु वङ्गं मधुनावलीढम् । विनाशयेन्नातिचिरेण मेहान् मत्तद्विपानन्न यथा मृगेन्द्रः ॥४७॥ वङ्गं शिलाजतुयुतं मधुनावलीढं मास निषेवितमलं विनिहन्ति मेहान् । क्षीणालपशुष्ककृशदूषितरेतसाञ्च वीर्याभिवृद्धेनविशुद्धिविधौ च शस्तम ॥४८॥ साज्यं वङ्गं शालिन्ततु द्रुतं पाण्ड्वामयं हरेत् । सौभाग्यचूर्णाख्ययुक्तं गुल्मञ्चापि विनाशयेत् ॥४९॥ पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं वङ्गन्तु परिशी लतम् । अग्निमान्द्यं निहन्त्याशु त्वजीर्णां पूगसंयुतम् ॥५०॥ हरिद्रया निषेवितं मृतन्तु वङ्गमुद्धरेत् । निकाममूर्ध्वमारुतं तथैव रक्तपित्तकम् ॥५१॥ रससिन्दूरसंयुक्तं वङ्गं तु परिशीलितम् । काममार्द्दनिशावारा व्रणमेहं व्यपोहति ॥५२॥ वरुणादिगणशिष्टभेषजक्वाथयोगतः । शीलितं वङ्गभासतं मतं व्रणहरं परम् ॥५३॥ चम्पकस्वरसोपेतं सकर्पूरमथापि वा । वङ्गं निषेवितं हन्यान्मुखदौर्गन्ध्यमुल्बणम् ॥५४॥ वङ्गं कस्तूरिकोपेतं वार्य्यस्तम्भकर परम् । जातीफलक्षौद्रयुतं शुक्रपुष्टिकरं परम् ॥५५॥ खदिरकथितेनेह वङ्गं चर्मामयं हरेत् । समुद्रफेनसंयुक्तं दुष्टं शुक्र विशोधयेन् ॥५६॥ अपामार्गस्य चूर्णेन वङ्गन्तु परिशीलितम् । रक्तिद्वयमितं यत्नात् षाण्ढ्यमाशु विनाशयेत् ॥५७॥ शाल्मलीमूलसंयुक्तं वङ्गं रक्तिद्वयोन्मितम् । सक्षौद्र सहरिद्रञ्च वीय्यवृद्धिकरं परम् ॥५८॥
अष्टादशस्तरङ्गः ४४७ लघुशाल्मलिमूलोत्थचूर्णेन परिशीलितम् । स्मभ्रकं शुक्रमो हन्तु शुक्रमञ्जननं परम् ॥ ५६ । वङ्गन्तु शर्करोपेतं पित्तघ्नं समुदाहृतम् । निम्बूकरससोपेतं देहदाहहरं मतम् ॥ ६० ॥ तुलसीदलसंयुक्तं वङ्गं मेहान् निवारयेत् । नागनीस्वरसोपेतं विवन्धं नाशयेद् ध्रुवम् ॥ ६१ ॥ लोहशुक्तिकयोपेतं वङ्गं तु परिशीलितम् । द्विगुञ्जं रालसहितं श्वेतप्रदरनाशनम् ॥ ६२ ॥ वङ्गं शशासृजा वापि निशाकुङ्कुमचन्दनैः । महिषाक्षीरसम्पिष्टं मुखच्छायां व्यपोहति ॥ ६३ ॥ रससिन्दूरसंयुक्तं वङ्गन्तु परिशीलितम् । नाशयत्यचिरादेव प्रमेहं क्षीणशुक्रताम् ॥ ६४ ॥ तालमूलिकयोपेतं वङ्गन्तु परिशोलितम् । मासमात्रप्रयोज्ञेन शुक्रतारल्यहृत्परम् ॥ ६५ ॥ नृपावर्तायसयुतं रससिन्दूरमंयुतम् । चन्दनक्वाथसं पीतं जीर्णज्वरमपोहति ॥ ६६ ॥ ताप्यतारसमायुक्तं वङ्गं तु परिशीलितम् । ऊर्ध्वजत्रुसमुद्भूतं नाड़ीशूलं व्यपोहति ॥ ६७ ॥ रोगयोग्यः प्रयोगोऽस्य गुडूचिकेत्यादिना । वङ्गभस्म २ गुंजे, अमृतासत्त्वम् ४ गुञ्जाः, मधु २ माषौ, लीढं प्रमेहरोगशान्त्यै प्रभवति । शिलाजतु ४ गुञ्जाः, वङ्गं २ गुञ्जामितं, मासं यावत् मधुना लीढं शुक्रशोधनम् । साज्यं घृतयुक्तम्, द्रुतं शीघ्रम् । सौभाग्यचूर्णं वह्निभृष्टटङ्कणोदः, पूगयुतं वङ्गमजीर्णं शमयतीत्यन्वयः । ऊर्ध्वमारुतम्— “अधः प्रतिहतो वायुः श्लेष्मणा वायुनाऽथवा । करोति भृश- मुद्गारमूर्ध्ववातः स उच्यते ॥” इति । आर्द्र्रा सरसाया निशा हरिद्रा तस्य वारा जलेने । षण्ढत्वं नपुंसकताम् । नागनीस्वरसः ताम्बूलदलरसः । लोहशुक्तिवङ्गसर्ज्जा- रसान् समभागान् सम्मेल्य ततः द्विगुञ्जा मात्रास्यौषधस्य कल्पनीया । शशासृजा शशकरुधिरेण, नृपावर्तः राजावर्तः क्षुद्रमणिविशेषः वक्ष्यमाणपरिचयः । आयसं लौहम् । ताप्यं स्वर्णमाक्षिकम् ॥ ४७-६७ ॥ आ.टी.—वंगमस्म को गुडूचीसत्त्व में मिलाकर शहद से चाटने अथवा
४४८ | रसतरङ्गिणी
वङ्गभस्म में शिलाजतु मिलाकर शहद से एक मास तक निरन्तर सेवन करने से प्रमेह रोग नष्ट हो जाते हैं । और इसी योग के सेवन से क्षीणशुक्र, अल्प- शुक्र, शुष्कशुक्र, दुर्बल और दूषितशुक्र पुरुषों की वीर्यवृद्धि होती है । वङ्गभस्म को गोघृत में मिलाकर चाटने से पाण्डुरोग शीघ्र ही दूर हो जाता है । टङ्कणचूर्ण मिलाकर वंग सेवन करने से गुल्म रोग नष्ट हो जाता है । अग्निमान्द्य को दूर करने के लिये वङ्गभस्म में पिप्पलीचूर्ण मिलाकर सेवन कराया जाता है । सुपारी- चूर्ण के साथ वङ्ग सेवन से अजीर्ण रोग नष्ट होता है । हरिद्राचूर्ण या स्वरस के साथ वङ्ग का सेवन करने से ऊर्ध्ववायु (डकारों का आना) तथा रक्तपित्त रोग में आराम आता है । व्रणमेह (सुजाक) में वंगभस्म में रससिन्दूर मिलाकर कच्ची हल्दी के स्वरस से सेवन करने से आराम आता है । वरुणादिगणोक्त द्रव्यों के क्वाथ के साथ वंगभस्म का सेवन करने से व्रणों में आराम आता है । मुख की दुर्गन्ध को दूर करने के लिये वंगभस्म में कर्पूर मिलाकर चम्पास्वरस के साथ सेवन करना चाहिये । वीर्यस्तम्भन के लिये वंगभस्म को कस्तूरी के साथ मिलाकर सेवन करना चाहिये । शुक्र-धातु की पुष्टि के लिये इसमें जायफल और मधु मिलाकर कुछ काल सेवन करना चाहिये । त्वग्रोगों को दूर करने के लिये वंगभस्म को खैर की छाल के कषाय के साथ सेवन करना चाहिये । शुक्र धातु की विकृति को दूर करने के लिये वंग को समुद्रफेनचूर्ण में मिलाकर सेवन करना चाहिये । एक से दो रत्ती मात्रा में वंगभस्म लेकर उसमें अपामार्गचूर्ण मिलाकर कुछ काल निरन्तर सेवन करने से नपुंसकता नष्ट हो जाती है । वीर्यवृद्धि के लिये वंगभस्म में सेमर की मूसली का चूर्ण और हरिद्राचूर्ण मिला- कर मधु के साथ चटाने से कुछ दिनों में वीर्यवृद्धि हो जाती है । शुक्र की अधिक उत्पत्ति के लिये वंगभस्म में छोटे सेमर की मूसली का चूर्ण और अभ्रकभस्म मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है । शरीर में पित्त की वृद्धि को कम करने के लिये वंगभस्म में खांड़ मिलाकर सेवन कराया जाता है । यदि शारी- रिक दाह को शान्त करना हो तो वंगभस्म को नींबूस्वरस के साथ सेवन कराना चाहिये । तुलसीपत्रकल्क या स्वरस के साथ वंग सेवन करने से प्रमेह रोग नष्ट हो जाते हैं । पान के पत्तों के रस के साथ वंगभस्म सेवन करने से मलबन्ध दूर हो जाता है । श्वेतप्रदर के लिये वंगभस्म में लोहभस्म, शुक्तिभस्म तथा रालचूर्ण मिलाकर दो रत्ती मात्रा में कुछ काल तक सेवन कराया जाता है । मुख की झाईं और काले दागों को मिटाने के लिये वंगभस्म को खरगोश के
२६ अष्टादशस्तरङ्गः ४४६ रक्त के साथ अथवा हरिद्रा, केसर तथा चन्दन के साथ भैंस के दूध में मिला- कर कुछ दिन उबटन के रूप में मलने से आराम आता है। रससिन्दूर के साथ वंगभस्म का कुछ काल सेवन करने से प्रमेह और शुक्र की कमी दूर हो जाती है। शुक्रधातु के पतलेपन को दूर करने के लिये एक महीने तक निरन्तर रूप में वङ्गभस्म में मूसली का चूर्ण मिला कर सेवन करना चाहिए। पुराने जीर्ण- ज्वर में वङ्गभस्म को लाजवर्दभस्म और लोहभस्म तथा रससिन्दूर के साथ मिला कर चंदनक्वाथ के अनुपान से सेवन करने पर लाभ होता है। जत्रु से उपरी शरीर प्रदेश में होनेवाले नाड़ीशूल को नष्ट करने के लिये वङ्गभस्म में स्वर्ण- माक्षिकभस्म तथा रजतभस्म मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है ॥४७-६७॥ अथ स्वर्णवङ्गस्य प्रथमो निर्माणप्रकारः कर्षत्रयमितं वंगं दर्व्यां न्यस्यानले न्यसेत् । विद्रुते तत्समं सूतं द्रुतं तत्र विनिक्षिपेत् ॥६८॥ द्रुतं निक्षिप्य खल्वे च पेषयेदतियत्नतः । आम्लेन केनचिच्चापि सह सम्मर्दयेत्ततः ॥६६॥ विमर्च सैन्धवं दत्त्वा बहुशः क्षालयेत्ततः । विशुद्धं गन्धकञ्चाथ दद्यादीश्वरसंमितम् ॥७०॥ चुल्लिकालवणञ्चैव बलितुल्यं विनिक्षिपेत् । सम्पेष्य चातियत्नेन श्लक्ष्णचूर्णंन्तु कारयेत् ॥७१॥ सवस्त्रमृत्तिका लिप्तकाचकूप्यां ततो न्यसेत् । यत्नतः सिकतायन्त्रे चतुर्यामं पचेत्ततः ॥७२॥ निर्धूमे जायमाने च काचकूपीमुखे भिषक् । संदंशेन गृहीत्वा च कूपीं भूमौ तु विन्यसेत् ॥७३॥ काचकूपीं विभिद्याथ कूपिकातलसंस्थितम् । स्वर्णवर्णं स्वर्णवङ्गं भिषग्रत्नः समाहरेत् ॥७४॥ कूपीभेदनकाले तु सूक्ष्मदर्शी भिषग्वरः । सूक्ष्मान् काचकणान् सम्यङ् निरीक्ष्य परिवर्जयेत् ॥७५॥ वंगं सञ्जायते यस्मात् कीर्णे स्वर्णकणैरिव । तस्माद्रसायनाचार्यैः स्वर्णवंगं प्रकीर्तितम् ॥७६॥ अथ स्वर्णवङ्गनिर्माणप्रकारः—अम्लसैन्धवाभ्यां सम्मर्द्य क्षालनं पिष्टिनेर्म-
४५० रस्तरङ्गिणी ल्यार्थम् । ईश्वरसंमितं पारदपरिमाणम् । चुल्लिकालवणं नवसादरम् । उक्तञ्चा- न्यत्रापि—"प्रक्षिपेद् भाजने वंगमायसे वापिमृण्मये । विद्रुते वह्नितापेन तस्मिन् तन्मानकं रसम् ॥ क्षिप्त्वा सञ्चूर्णयैत्तत्र नरसारञ्च गन्धकम् ।” इत्यादिना । गन्धकमत्र निःस्नेहं ग्राह्यम् । केचित्तु वालुकायन्त्रं विहाय अङ्गारधानिकायामेव पाच्यन्ति, तत्तु वर्णगुणाभ्यां हीनमिति विभावनीयम् ॥ ६८–७६ ॥ भा.टी.--तीन कर्ष परिमाण शुद्ध खुरक वंग को एक लोहे की करछी में डालकर करछी को अग्नि में तपायें, जब वंग पिघल जाय तो उसमें वंग के बराबर भाग शुद्धपारद डालकर शीघ्र ही करछी अग्नि से उतारकर खरल में उलट दें और शीघ्र ही इस वंगपारद के मिश्रण को मूसली से घोटना शुरू कर दें जिससे वह पीठी-सी हो जाय। अब इसमें कोई अम्लद्रव डालकर मर्दन करें। कुछ काल अम्ल में मर्दन करने के बाद उसमें सैन्धानमकचूर्ण मिलाकर मर्दन करके जल से अच्छी तरह धो डालें । अब इसमें पारद के समभाग शुद्ध गन्धक और नौसादर मिला कर खूब रगड़ते हुए बारीक चूर्ण (कजलीसा ) बना लें । अब इस चूर्ण को रससिन्दूर बनानेवाली काँच की शीशी में कपड़- मिट्टी करके भर दें और इस शीशी को वालुकायन्त्र में रखकर चार पहर की अग्नि में पकायें, अग्नि देते हुए जब शीशी के मुख से धुँआ निकलना बन्द हो जाय तो शीशी को सावधानी से ०एक संडसी से पकड़कर नीचे उतारकर ठंडा कर लें । ठंडा होने के बाद शीशी को निकाल डालें तो शीशी के तल- भाग में से स्वर्ण के समानवर्ण के स्वर्णवंग को निकाल लें । विचारशील वैद्य- को शीशी तोड़ते समय होनेवाले शीशी के टूटे हुए कणों को अच्छी तरह देख कर अलग कर देना चाहिये । इस विधि से बनाया हुआ वंग, स्वर्णकणों से जैसा व्याप्त रहता है, अतः इसको रसायनाचार्य लोगों ने स्वर्णवंग नाम से . व्यवहार में लिया है ॥ ६८–७६ ॥ वक्तव्य—स्वर्णवंग बनाते समय वंग को करछी में पिघलाकर खरल में पड़े हुए पारद में डालकर तत्काल मर्दन करने से सुभीता रहता है । अन्यथा ऊपर करछी में ही वंग डालने से कई बार पारा उड़ जाता है या छटककर नीचे गिर जाता है । वालुकायन्त्र में पकाते हुए धुँए के साथ नौसादर भी उड़ता है जिससे शीशी का मुख बन्द हो जाता है और धुँआ निकलता हुआ नहीं दिखाई देता । अतः रससिन्दूर की भाँति कभी-कभी शीशी के गले को एक गरम लोहे की सींक से साफ करते रहना चाहिए ।
अष्टादशस्तरङ्गः ४५१ द्वितीयो निर्माणप्रकारः वंगं सूर्यमितं द्रुतं रसमितं सूतञ्च सम्पेपयेत् प्रक्षाल्याम्लरसैः क्षिपेद् बुधवरो नागोन्मितं गन्धकम्। वंगांशं नवसादरञ्च विमलं सम्पेष्य यत्नात्पचेत् कूपीस्थं सिकताख्ययन्त्रविधिना कूपीं ततस्त्व्राहरेत् ॥७७॥ कूपीं विभिद्य यत्नेन रसयन्त्रविचक्षणः। स्वर्णारम्यं स्त्रर्णवर्णं स्वर्णवंगं समाहरेत् ॥ ७८ ॥ आयुर्वेदमहाम्भोधिकर्णधारधुरन्धरैः। मित्रवंशावतंसैस्तु गुरुवर्यमहोदयैः ॥ ७९ ॥ श्रीमन्नरेन्द्रनाथाख्यैस्त्वयमाविष्कृतो विधिः। प्रकाशितः खलु मया लोकानुग्रहकाम्यया ॥ ८० ॥ द्वितीयो निर्माणप्रकारोऽल्पव्ययो बहुफलश्चेति। सूर्यमितं द्वादशभागिकं द्रुतं वंगं, रसमितं षडभागिकं सूतं सम्मेल्य सम्पेपयेत्। नागोन्मितं अष्टभा- गिकं गन्धकम्। तच्च प्रागुक्तपञ्चमविधिविशुद्धं ग्राह्यम्। अंगांशं षड्भागिकञ्च नवसादरं दत्त्वा सम्पेष्य कुप्यां निधाय पचेत्। अन्यत् सर्वं समानं पूर्वेण। अत्र च पूर्वयोगापेक्षयोत्कृष्टवर्णो स्वर्णवंगं भवति इति। अत्र च वंगपारदा- दिमानतारतम्यं मित्रवंशावतंसैराविष्कृतमिति विशेषः ॥७७-८०॥ भा.टी.—शुद्धवंग बारह भाग लेकर उसको करछी में पिघला कर उसमें छः भाग शुद्ध पारद मिलाकर तत्काल खरल में डालकर खूब रगड़ें। अब इसको नींबू रस आदि किसी अम्लरस द्रव से अच्छी तरह धोकर उसमें आठ भाग शुद्ध गन्धक और छः भाग नौसादर मिलाकर अच्छी तरह मर्दन करके कज्जली-सी बना लें। अब इस कज्जली को एक कपड़मिट्टी की हुई कांच की शीशी में भरकर उसे पूर्वोक्त विधि से बालुकायन्त्र में पकायें। ठीक पक जाने पर शीशी को निकाल उसमें से सोने के समान सुन्दर वर्णवाले स्वर्णवंग को निकाल लें। इस विधि से भी उत्तम स्वर्णवंग बनता है ॥ ७७-८० ॥ अस्य गुणाः सुवर्णवंगं शिशिरञ्च रूक्षं सरं सतिक्तं लवणञ्च साम्लम्। रसायनं मेहहरञ्च मेध्यं बल्यञ्च नेत्र्यं परमं प्रदिष्टम् ॥८१॥ लावण्यदं वह्निविवर्धनञ्च श्लेष्मामयघ्नं परमञ्च वृष्यम्। मेदोहरं शुक्रकरं निकामं सुवर्णवंगं कथितं रसज्ञैः ॥८२॥
४५२ रसतरङ्गिणी अस्य गुणा:—शिशिरं गन्धमारितमपि क्षारसंयोगात् शीतवीर्यम्। लवणं सङ्घारत्वात्। नेत्र्यं प्रदिष्टं कैश्चित् ॥ ८१, ८२ ॥ भा.टी.—स्वर्णवंग शीतवीर्य शीतगुण, रूक्ष, सर, तिक्त, लवण और अम्ल- रस होता है। यह सब शरीर को बल देने के कारण रसायन, प्रमेहहर, बुद्धि- वर्धक, बल्य और नेत्रों के लिये परम लाभदायक है। इसको कुछ काल सेवन करने से शारीरिक शोभा बढ़ जाती है और भूख लगने लगती है। ऊर्ध्वजत्रु तथा श्वास नली आदि स्थानों में होनेवाले कफप्रकोपजन्य रोग दूर होते हैं और उत्पादक अंगों के लिए उत्तम बल्य (वृष्य) है। इसके सेवन से मेदो- विकार नष्ट हो जाते हैं और शरीर में शुक्र धातु की उत्पत्ति होती है॥८१, ८२॥ अस्य मात्रानिरूपणम् गुञ्जैकतः समारभ्य गुञ्जा द्वितयसंमितम् । सुवर्णवंगं युञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ८३ ॥ मात्रादिकं वंगभस्मवत् सर्वम् ॥ ८३ ॥ भा.टी.—रोग तथा रोगी का बल तथा काल आयु आदि का विचार करके एक रत्ती से दो रत्ती तक मात्रा में स्वर्णवंग का सेवन किया जा सकता है ॥८३॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः स्वर्णवंगं विशेषेण वंगोक्तेरनुपानकैः । तत्तद्रोगेषु नियतं प्रयुंजीत भिषग्वरः ॥ ८४ ॥ [ गीतिका ] बहुलारजोविमिश्रं त्वपि नागकेसराह्वयम् । यशदोत्थभूतियुक्तं सुविभं सुवर्णवंगम् ॥ ८५ ॥ परिशीलितं सपथ्यं दिनसप्तकं प्रयत्नान् । विनिवारयेद्धि शुक्लप्रदरोत्थितां तु बाधाम् ॥ ८६ ॥ परिशीलितं तथेदं खलु मासमात्रयोगात् । विनिहन्ति शुक्रमेहं सुचिरोत्थितं प्रकामम् ॥ ८७ ॥ सममाधवोचिताढ्यं सुविभं सुवर्णवंगम । परिशीलितं द्विगुञ्जं व्रणमेहहत्प्रदिष्टम् ॥ ८८ ॥ मधुना सुवर्णवंगं रजनीरप्रगाढम् । अशितं ह्यमोघशस्त्रं व्रणमेहनाशनाय ॥ ८६ ॥
अष्टादशस्तरङ्गः ४५३ सितसारिवास्टतेन ह्यशितं सुवर्णवंगम् । व्रणमेहमुग्रवेगं खलु नाशयेन्निकामम् ॥ ६० ॥ ससुरप्रियोत्थचूर्णं ह्यशितं सुवर्णवंगम् । विनिवारयेद्विशेषात् द्रुतमेव रात्रिमेहम् ॥ ६१ ॥ लघुशाल्मलीशिफाया रजसा समन्वितन्तु । ह्यशितं सुवर्णवंगं बलवीर्यदं प्रदिष्टम् ॥ ६२ ॥ अपि च— प्रतनुमधुविमिश्रं मासमेकं सपथ्यं मृतयशदसमेतं शीलितं स्वर्णवंगम् । अपनयति विशेषाच्छुक्रतारल्यमारा- ज्जनयति बलवृद्धिं भूयसीं भावुकानाम् ॥ ६३ ॥ समभागिकसिन्दूररससम्मिश्रितं तथा । सुवर्णवंगं मधुना वासरे तु द्विवारकम् ॥ ६४ ॥ सततं मासमात्रेण शीलितं पथ्यभोजिभिः । अवश्यं नाशयत्याशु शुक्रदौर्बल्यमुल्बणम् ॥ ६५ ॥ बहुला स्थूलैला, सुविमं शोभनचाकचक्यम्, सपथ्यं पथ्यरक्षायुक्तं यथा स्या- त्तथा । माधवोचितं कङ्कोलम्, शीतलचीनी इति हिन्दीभाषायाम् । “कङ्कोलंकं कृतफलं कोलकं कटुकं फलम् । चूर्णं कन्दफलं द्वीपं मारीचं माधवोचितम्।” इति धन्वन्तरीयनिघण्टुः । सुरप्रियं कङ्कोलम् । सपथ्यं पथ्यभोजनयुक्तम् । आरात् सत्वरमेवेत्यर्थः ॥ ८४-६५ ॥ भा.टी—स्वर्णवङ्ग को वङ्गभस्म के अनुपानों के साथ भिन्न-भिन्न रोगों में सेवन करने से वङ्गभस्म के समान ही गुण देखे जाते हैं । उत्तम स्वर्णवंग को, जटामांसीचूर्णं और यशद ( जस्ता ) भस्म के साथ मिलाकर अशोकक्वाथ अथवा खरेंटीकषायानुपान से सात दिन तक पथ्यपूर्वक सेवन करने से श्वेतप्रदररोग का कष्ट निश्चित दूर हो जाता है । यदि इसी वंग योग को नियमपूर्वक पथ्य के साथ एक मास तक निरन्तर सेवन किया जाय तो बहुत दिनों का पुराना शुक्रमेह रोग नष्ट हो जाता है । व्रणमेह (सुजाक) को दूर करने के लिये दो रत्ती उत्तम स्वर्णवंग को समभाग शीतलचीनीचूर्णं में मिला- कर शीतल जल अथवा बलास्वरस अनुपान से सेवन किया जाता है । स्वर्णवंग को दो रत्ती मात्रा में लेकर उसमें कच्ची हल्दी का स्वरस और शहद मिलाकर सेवन
४५४ रसतरङ्गिणी कराना व्रणमेह की अचूक औषधि है। नूतन उग्रवेग व्रणमेह को नष्ट करने के लिये स्वर्णवंग को श्वेतसारिवा (अनन्तमूल) के शीत कषाय के साथ सेवन कराने से शीघ्र लाभ होता है। रात्रिमेह (स्वप्नदोष) को दूर करने के लिये स्वर्ण वंग को शीतलचीनीचूर्ण के साथ मिलाकर सेवन कराना चाहिये। शरीर में बल और वीर्यशक्ति बढ़ाने के लिये स्वर्णवंग को छोटे सेमर की जड़ के चूर्ण के साथ कुछ दिन सेवन कराना चाहिये। स्वर्णवंग को यशदभस्म में मिलाकर शहद के साथ पथ्य पूर्वक एक मास तक नियम पूर्वक सेवन करने से शुक्रतारल्य (वीर्य का पतला होना) नष्ट होकर शरीर में अत्यन्त बलवृद्धि होती है। शुक्र की दुर्बलता (अल्प-परिमाण होना, गठीला दुर्गन्धित आदि दोष युक्त होने से सन्तानोत्पादन में असमर्थता) को दूर करने के लिये स्वर्णवंग एक रत्ती, रससिन्दूर एक रत्ती; दोनों को एकत्र पीसकर इसको शहद के साथ सुबह चाटें और इसी तरह शाम को एक मास तक चाटने से और पथ्य पूर्वक रहने से शुक्र की दुर्बलता शीघ्र ही दूर हो जाती है ॥८४-६५॥ अथ सुवर्णवंगपञ्चकरसायनम् सुवर्णवंगमुज्ज्वलं तु तोलकद्वयोन्मितम् । विशोधितं शिलामयं सुवर्णवंगसंमितम् ॥ ६६ ॥ मृतं तु तीक्ष्णलोहकं शिलामयार्द्धभागिकम् । सुशोभनं तथाभ्रकं मतं तु तोलकार्द्धकम् ॥ ६७ ॥ स्मरध्वजाङ्कपूर्वकं ध्वजाह्वयं तथा रसम् । विमर्द्य खल्वके भृशं वटीं त्रिगुञ्जसंमिताम् ॥ ६८ ॥ विधाय काचकूपके न्यसेत्ततो भिषग्वरः । यथानुपानयोगतो द्विवारमेकवासरे ॥ ६९ ॥ प्रयोजयेद्विशेषविद्वलाबलाचपेक्षया । रसायनं मतं त्विदं सुवर्णवंगपञ्चकम् ॥ १०० ॥ वंगीयैः श्रीरमानाथसेनवैद्यमहोदयैः । विचार्याविष्कृतमिदं सुरम्यन्तु रसायनम् ॥ १०१ ! प्रकाशितं खलु मया लोकानुग्रहकाम्यया । अमोघास्त्रमिदं ख्यातं शुक्रमेहस्य नाशने ॥ १०२ ॥ बलवर्णकरं वृष्यं परं बुद्धिविवर्द्धनम् । समाख्यातं विशेषेण शुक्रतारल्यनाशनम् ॥ १०३ ।:
एकोनविंशस्तरङ्गः ४५५ सितासराज्यसंयुक्तं प्रतप्तदुग्धयोगतः । सुवर्णवङ्गपञ्चकं निषेवितं द्विमासकम् ॥ १०४ ॥ निहन्ति वै चिरोत्थितं तु शुक्रमेहमुल्बणम् । तथा करोति कामिनीमदापनाशनक्षमम् ॥ १०५ ॥ सुवर्णवंगपञ्चकरसायनम्—शिलामयं, शिलाजतु । स्मरः कामदेवस्तस्य ध्वजाङ्को ध्वजचिह्नं मकरः, तत्पूर्वकं मकरपूर्वकं ध्वजाह्वयं रसं मकरध्वजसंज्ञकं रसम् अभ्रतुल्यं दद्यादिति शेषः । सिता खण्डम्, सरः सन्तानिका ॥६६-१०५॥ इति वंगविज्ञानीयो नाम अष्टादशस्तरङ्गः भा.टी.—उत्तम स्वर्णवंग दो तोला, अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ सूर्य- तापी शिलाजीत दो तोला, तीक्ष्णलोह ( फौलाद ) भस्म एक तोला, उत्तम वज्राभ्रक भस्म आधा तोला और उत्तम षड्गुणबलिजारित मकरध्वजरस आधा तोला लेकर सबको खरल में एकत्र जल के साथ मर्दन करके तीन-तीन रत्ती की गोली बना लें । इनको सुखाकर काँच की शीशी में रख लें । अब इन गोलियों में एक गोली सुबह और एक शाम को बल काल आदि का पूर्ण विचार कर दिन में दो बार योग्य अनुपान से सेवन करना चाहिये । इस योग को सुवर्णवंगपञ्चक रसायन कहते हैं । शुक्रमेह रोग को नष्ट करने में यह एक अचूक शस्त्र है । इसके सेवन से शरीर में बल और वर्ण की वृद्धि होती है, उत्पादक अंग सबल होते हैं, बुद्धिशक्ति बढ़ने लगती है शुक्र की तरलता को दूर करने में यह विशेष रूप से लाभदायक है । स्वर्णवंग को दो मास तक घी और मिश्री मिश्रित मलाईवाले गरम दूध के साथ सेवन किया जाय तो भयंकर शुक्रमेह दूर हो जाता है ॥ ६६-१०५ ॥ यह वङ्गविज्ञानीय नाम अष्टादशतरङ्ग समाप्त हुआ । —०— अथ सीसकादिविज्ञानीय एकोनविंशस्तरङ्गः अथ सीसकस्य नामानि सीसकं शीषकं सीसं नागकं नागनामकम् । कुवङ्गकं कुरङ्गञ्च तथा सिन्दूरकारणम् ॥ १ ॥ क्रमप्राप्तसीसकनामानि तन्त्रे व्यवहारार्थम् । सिन्दूरकारणं सिन्दूरहेतुत्वात् नागस्य, सिन्दूरं हि नागसम्भवमिति ॥ १ ॥
४५६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—सीसक, शीपक, सीस, नागक, सर्प के नाम—भुजंग, फणि, आशीविष, सर्प आदि, कुवङ्गक, कुरंग तथा सिन्दूरकारण, ये सब नाम सीसा धातु के कहे जाते हैं। क्योंकि इसमें से सिन्दूर प्राप्त किया जाता है, अतः इसको सिन्दूरयोनि लिखा है ॥ १ ॥ वक्तव्य—सीसक नैसर्गिक तौर से सीसकगन्धित (Lead sulphide) के रूप में मिलता है। काले सुरमे में सीसा अधिक पाया जाता है। सीसक की कच्ची धातु (सीसकगन्धित) को भूनकर उसमें से इसको पृथक् किया जाता है। यह चमकीली नीली भूरी-सी धातु है। स्पर्श में कोमल घिसने पर कागज पर लिखती है। खुली हवा में रखने से इसमें जंग नहीं लगता है, किन्तु गीली हवा में लग जाता है। सीसक काँर्बानित् होता है। सीसक को खूब तपाकर श्वेत कर दिया जाय तो इसका उर्ध्वपातन भी हो जाता है। भभके से शुद्ध किये हुए जल का सीसक पर कोई प्रभाव नहीं होता है, क्योंकि इसमें हवा नहीं होती। परन्तु अन्य कोमल जल जैसे वर्षाजल का इस पर शीघ्र प्रभाव होता है। वर्षा- जल में घुली हुई हवा की ओषजन सीसे के साथ मिलकर सीसे का ओषित् (oxide) बना देती है, यह ओषित् जल में घुलकर सीसक का उद्रित (Hybrate) बन जाती है। यद्यपि यह उद्रित बहुत थोड़ी होती है, तथापि इससे जल का स्वाद तथा प्रभाव बिगड़ जाता है। इसीलिए वर्षाजल को सीसे की बाल्टियों तथा टबों में नहीं रखा जाता है। नदी तथा कुओं के कठोर जल पर इसका बिलकुल प्रभाव नहीं होता है। सीसे का आपेक्षिक गुरुत्व 11.34 से लेकर 11.37 तक है। Atomic भार 207.22 है, सीसक 325°c तापांश पर उबलने लगता है। ग्राह्यसीसकस्य स्वरूपम् सुगौरवं मृदु स्निग्धं छेदने मलिनोज्ज्वलम् । बहिःश्यामं द्रुतद्रावं सीसकं जात्यमादिशेत् ॥ २ ॥ ग्राह्यसीसकस्वरूपं सुगौरवंमिति—मलिनोज्ज्वलं मलिनं कृष्णं, उज्ज्वलं किचक्ययुतम् । तथाऽतो विपरीतं हेयसीसकमिति ॥ २ ॥ भा.टी.—अच्छा वजनदार, कोमल, स्निग्ध, छैनी से काटने पर कुछ मलिन साफ (चमकदार), बाहर से देखने पर श्यामवर्ण, अन्य धातुओं की अपेक्षा अग्नि पर रखने से शीघ्र पिघलनेवाले सीसे को उत्तम समझना चाहिये ॥२॥
एकोनविंशस्तरङ्गः ४५७ अग्राह्यसीसकस्य स्वरूपम् बहिः शुक्लं भारहीनं रूक्षं छेदे च निष्प्रभम् । समलं कठिनद्रावं सीसकं हेयमादिशेत् ॥ ३ ॥ भा.टो.—बाहर से देखने पर सफेद, अल्पभार, खुश्क, काटने पर चमक- रहित, धात्वन्तरयोगयुक्त और देर में पिघलनेवाला सीसक औषधि-कार्य में अग्राह्य समझना चाहिये ॥ ३ ॥ सीसकशोधनस्य प्रयोजनम् सीसं निहन्ति विमलां तु शरीरशोभां कुष्ठं किलासकमलं जनयेच्च नूनम् । सन्धीन् प्रपीडयति पक्षवधं प्रकुर्यात् संशुद्धिहीनमिह चेत् खलु मारितं स्यात् ॥ ४ ॥ शुद्धिपाकविहीनन्तु सीसकं परिशीलितम् । गुल्मं प्रमेहमानाहं श्वयथुञ्च भगन्दरम् ॥ ५ ॥ वह्निमान्द्यं त्वंसशोथं बाह्रोर्निश्चेष्टतां तथा । शूलं क्षयादिकान् रोगान् जनयेदविकल्पतः ॥ ६ ॥ सीसकशोधनप्रयोजनम्—स्पष्टप्रायम् । अंसशोथबाहुनिश्चेष्टतादि प्राचीना- नुक्तमपि स्फुटप्रतीयमानत्वादुक्तम् । अविकल्पतः सन्देहराहित्येन आवश्यक- मित्यर्थः । पाकविहीनमिति दोषाश्चैते मनःशिलातालगन्धकमन्तरा मारितनाग- सेवनादप्युपजायन्त इति ज्ञेयम् ॥ ४–६ ॥ भा.टी.—बिना शुद्ध किये सीसक की भस्म का सेवन करने से शरीर में रक्त विकृत होने से सारे शरीर की शोभा नष्ट हो जाती है और शरीर में सफेद कोढ़ तथा त्वक्रोग उत्पन्न हों जाते हैं । इसके सेवन से सन्धियों में कष्ट हो जाता है और पक्षाघात रोग हो जाता है । इसी तरह अशुद्ध सीसकभस्म सेवन से गुल्म, प्रमेह, आनाह, शोथ, भगन्दर, अग्निमान्द्य, अंस (कन्धा) शोथ, भुजाओं में अकर्मण्यता, उदरशूल तथा क्षय आदि अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं । अतः सीसक को अवश्य ही अच्छी प्रकार से शुद्ध कर भस्म करना चाहिये ॥ ४–६ ॥ सीसकस्य प्रथमः शोधनप्रकारः सीसकं दर्विकासंस्थं चुल्लिकायां निधापयेत् । विद्रुतञ्चाथ विज्ञाय रसतन्त्रविचक्षणः ॥ ७ ॥
४५८ रसतरङ्गिणी सिन्दुवारशिफाजातस्वरसापूरितोदरे । क्षिपेद् घटे तु सच्छिद्रपिधानपिहितास्यके ॥ ८ ॥ निर्वापयेत्सप्तवारं विधानज्ञो भिषग्वरः । इत्थं विशोधितं सीसं मारणाय प्रयोजयेत् ॥ ९ ॥ सीसकस्य प्रथमः शोधनप्रकारः — निर्गुण्डीमूलद्रवे परिषेचनं सप्तधा विधाय सम्पाद्यः ॥ ७-९ ॥ भा.टी.—उत्तम सीसे को एक लोहे की करछी में डालकर इसको चूल्हे के ऊपर कोयलों या लकड़ी की अग्नि में तपायें, जब शीशा पिघल जाय तो इसे एक पात्र में भरे हुए निर्गुण्डीमूलस्वरस में बुझा दें, परन्तु इस निर्गुण्डीमूलस्वरसवाले पात्र के मुख पर बीच में छिद्रयुक्त एक सिकोरा रखा हुआ होना चाहिए। इसी पात्रमुख पर रखे हुए सिकोरे के छिद्र से पिघले हुए सीसक को निर्गुण्डीस्वरस में डालना चाहिये । इस प्रकार सात बार निर्गुण्डीस्वरस में बुझाने से सीसक शुद्ध हो जाता है । इसी शुद्ध सीसक को भस्म करने के काम में लाना चाहिये ॥७-९॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः सीसकं द्रावयेल्लोहदर्वीगतं स्वच्छचूर्णोदके चाथ निर्वापयेत् । पूर्वमार्गेण वै शेषकर्माचरेत् सीसकं सत्वरं याति शुद्धिं पराम् ॥ १० ॥ द्वितीयः प्रकारः चूर्णोदके निर्वापणादुक्तः । पूर्वमार्गेण अव्यवहितप्रदर्शितेन सीसकशोधनोक्तप्रथममार्गेण शेषकर्म कुम्भे स्वच्छचूर्णोदकस्य प्रक्षेपणाम्, सच्छिद्र- सुदृढपिधानेन कुम्भमुखस्याच्छादनमित्यादिकमिहानुक्तं कर्म समाचरेदिति भावः । केचित्तु अर्कदुग्धे त्रिधा निर्वापणादपि शुद्धयति इत्याहुः ॥ १० ॥ भा.टी.—सीसक को लोहे की करछी में डाल अग्नि में तपाकर पिघलाने के बाद इसको उक्त विधि से स्वच्छ चूने के जल में सात बार बुझा देने से सीसक उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ १० ॥ वक्तव्य—कई वैद्य आक के दूध में बुझाकर शुद्ध कर लेने को कहते हैं । कई वैद्य निर्गुण्डीस्वरस में एक बार रेणुकाचूर्ण, दूसरी बार में हरिद्राचूर्ण और तीसरी बार में अर्कमूलचूर्ण मिलाकर उसमें सीसक बुझाने से शुद्ध कर लेते हैं । अथ सीसकस्य प्रथमो मारणप्रकारः सीसकं शुद्धमादाय कटाहे गालयेद्भिषक् । विशुष्काश्वत्थवल्कोत्थं समं चूर्णं विनिक्षिपेत् ॥ ११ ॥
स्वल्पं स्वल्पं मुहुश्चाथ लोहदर्व्या प्रचालयेत् । सीसभस्म भवेद्यावच्चूर्णं तावत्समापयेत् ॥ १२ ॥ राशीकृत्य ततो भस्म शरावेण पिधापयेत् । ज्वलदङ्गारवर्णं स्यात्सीसभस्म यथा चिरम् ॥ १३ ॥ स्वाङ्गशीतं ततो ज्ञात्वा मृतं सीसं समाहरेत् । बहुशः क्षालयेत्तोयैः क्षारहीनं यथा भवेत् ॥ १४ ॥ सीसतुल्यां रोगशिलां विमलां तत्र निक्षिपेत् । निम्बूकवारिणा वापि काञ्जिकेनाथ पेषयेत् ॥ १५ ॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा पुटयेदतियत्नतः । इत्थं त्रिभिः पुटैरेव सीसकं मृतिमाप्नुयात् ॥ १६ ॥ द्वितीयादिपुटे वैद्यस्तुल्यामेव शिलां क्षिपेत् । इत्थं मृतं सीसकन्तु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ १७ ॥ भस्म सञ्जायते श्लक्ष्णं विशदं कज्जलप्रभम् । पक्षाघातादिकान् नागदोषान् नैव करोति च ॥ १८ ॥ अथास्य मारणप्रकारः प्रथमः । अश्वत्थवल्कलचूर्णप्रक्षेपात् प्रथमं सीसक- मारणम् । ततो दोषनिरासाय मनःशिलया त्रिधा पुटनमिति । पुटनञ्च मध्यपुटै- रेव न महापुटैः । अन्यथा गलितो नागो दुर्बिनश्यतीति अनुसन्धेयम् । भस्म चास्य श्लक्ष्णमपि तु पिच्छिलम् । वर्णतस्तु कज्जलप्रभम् । पक्षाघातादिकान् दोषान् न करोति च मनःशिलायाः पक्वत्वादिति शेषः ॥ १२-१८ ॥ भा.टी.-उक्त विधि से शुद्ध सीसा लेकर उसको एक लोहे की कड़ाही में डालकर चूल्हे पर रखकर पिघलायें। जब सीसा पिघल जाय तो उसमें थोड़ा- थोड़ा करके पीपलवृक्ष की शुष्क त्वचा का चूर्ण सीसकसमभाग डालते जायें और लोहे की करछी से इसे चलाते जायें। जब तक सीसे की भस्म न हो जाय तब तक थोड़ा-थोड़ा करके चूर्ण डालते जायें और चलाते जायें। जब सीसे की भस्म हो जाय तो उसे उसी कड़ाही के बीच में इकट्ठा करके एक मिट्टी के सिकोरे से अच्छी तरह ढक दें और तीव्र अग्नि से तब तक पकायें जब तक कि सीसकभस्म जलते हुए लाल अंगारों की भाँति न हो जाय। अग्नि देना बन्द करके स्वांगशीत होने पर सीसकभस्म को कड़ाही से निकाल लें। इस भस्म को फिर जल से अच्छी तरह तब तक धोयें जब तक क्षार का अंश बिल्कुल न रहे। अब उस क्षारहीन सीसकभस्म में समभाग शुद्ध मैनसिल मिलाकर नींबू के रस से