रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 471, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशस्तरङ्गः ४४५ मानसिक विकृतिजन्य सर्वाङ्गीण प्रसादवायु का प्रकोप भी शीघ्र ही शान्त हो जाता है ॥ ४३, ४४ ॥ वक्तव्य—वंगभस्म अन्तःप्रयोग में शरीर के बहुमूत्र, शुक्रमेह, श्वेतप्रदर आदि अनेकविध स्रावों को बन्द करती है । अतः अन्तःप्रयोग में इसका ग्राही प्रभाव देखा जाता है । इसके प्रयोग से स्वेदवाहिनियों का क्षोभ शांत होता है और स्वेदाधिक्य कम हो जाता है । इसी तरह शरीर के किसी भाग से होने वाले अतिशय स्रावों तथा योनिभाग के स्रावों को भी वंगभस्म बन्द करती हैं । मूत्र तथा उत्पादक अङ्गों पर वङ्गभस्म का उत्तम बल्य प्रभाव होता है। शुक्रक्षय, स्वप्नमेह और इनसे होनेवाले रोगों में वंग सर्वोत्तम औषधि है—“वंगं भक्षयतां नरस्य न भवेत्स्वप्नेऽपि शुक्रक्षयः ।” तथा “सिंहो यथा हस्तिगणं निहन्ति तथैव वंगोऽखिलमेहवर्गम् ।” स्त्री सम्बन्धी विषय का अधिक चिन्तन आदि करने से जिन पुरुषों को वातनाड़ीजन्य उत्तेजना बढ़ जाने से स्त्री के स्पर्श से ही शुक्रस्ख- लन हो जाता है या पुरुष में घोर नपुंसकता आ जाती है उस अवस्था में वंग- भस्म वातकनाड़ियों के क्षोभ को शांतकर उनमें बल पैदा करती है। आजकल की गवेषणा ने वंग को स्रावी पामा ( ऐग्जीमा ) के लिये उत्तम औषधि निश्चित किया है । इस रोग में वङ्ग का योग “टिन् ओक्सीन” नामक औषधि अधिक व्यवहार में लायी जाती है। यदि वङ्गभस्म में शुद्ध गन्धक मिलाकर प्रयोग किया जाय तो “टिन् ओक्सीन” के सदृश ही लाभ होता है । वृद्धावस्था के कारण वृक्क, मूत्रवाही स्रोत, मूत्राशय आदि अंगों की निर्बलता होने पर अधिक मूत्रस्राव में वङ्गभस्म इन अंगों को बल देती है और मूत्र की मात्रा को कम करती है । वङ्गस्य औष्ण्यशैत्यजनने हेतुः वङ्गं गन्धादियोगेन मारितं तूष्णतां व्रजेत् । क्षारादिना मृतञ्चेह शीततां याति निर्भरम् ॥४५॥ वङ्गस्यौष्ण्यशैत्यभावहेतुस्तु अनुक्तपूर्वः स्फुटीकृत आचार्यैः ॥ ४५ ॥ भा.टी.—गन्धक, हरिताल आदि उष्णद्रवों के सहयोग से बनायी हुई वङ्गभस्म उष्ण प्रकृति की पायी जाती है। इसके विपरीत यवक्षार चिञ्चाक्षार आदि द्रव्यों के सहयोग से बनी हुई वङ्गभस्म शीत गुणयुक्त होती है। अतः आवश्यकता- नुसार इसको दोनों प्रकार की औषधियों से बनाकर प्रयोग में लाना चाहिये ॥४५॥ अस्य मात्रानिरूपणम् रक्तिकातः समारभ्य रक्तिकद्वितयसंमिताम् । पूणमात्रां प्रयुञ्जीत मृतवङ्गस्य कोविदः ॥४६॥