भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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४४४ रसतरङ्गिणी भा.टी.-विधिपूर्वक बनाई हुयी वंगभस्म लघु, शीतल और रूक्ष गुणयुक्त होती है । यह बुद्धिवर्धक और रसों में तिक्त, कषाय और किञ्चित् लवणतायुक्त होती है । रोग और दोषों के विषय में वंगभस्म मेदोविकारनाशक, भोजन में रुचिकारक, रसायनगुणधर्मी, कफप्रकोपजन्य रोगशामक होती है । इसके प्रयोग से वमन शान्त होती हैं, व्रणविकार तथा सब प्रमेहविकार नष्ट होते हैं । इससे नेत्रोंकी शक्ति बढ़ती है और अच्छे विचार उत्पन्न होते हैं । यह क्षयरोगहर और अद्वितीय रूप से शुक्रवर्धक है । इसके सेवन से स्त्रियों का श्वेतप्रदर, व्रण, उदरकृमि नष्ट होते हैं । इसको कुछ काल नियमपूर्वक सेवन करने से कामशक्ति बढ़ती है, शरीर में साहस की मात्रा उत्पन्न होती है और सब शरीर का वर्ण निखर आता है तथा त्वचा सुन्दर हो जाती है । स्वप्न में होनेवाला वीर्यस्राव बन्द हो जाता है, जीर्ण कास तथा श्वास शान्त हो जाते हैं । प्रतिदिन सूखनेवाले मनुष्य इसके सेवन से मोटे होने लगते हैं । इसके द्वारा मैथुनिक बल तथा शारीरिक बल बढ़ता है । प्रसादसंज्ञक वायु (Vitality) का क्षोभ शान्त हो जाता है, पाण्डु रोग शीघ्र ही शांत हो जाता है । वंगभस्म के गुणों के विषय में बहुत कहने की आव- श्यकता नहीं; यह मनुष्यों के लिये हर प्रकार से सुख देनेवाली औषधि है । इसके सेवन से अपने स्थान से हटा हुआ गर्भाशय अपने स्थान पर आ जाता है, श्वास लेने में होनेवाला कष्ट नहीं रहता । राजयक्ष्मा रोग में उत्पन्न होनेवाला रात्रिखेद तथा अत्यन्त मात्रा में बढ़ा हुआ कफप्रकोप इसके द्वारा शान्त हो जाता है ॥ ३६-४२ ॥ विशिष्टा गुणा: मृतं तु वङ्गं परिशीलितन्तु विनाशयेन्नातिचिरेण नूनम् । चिरोत्थितं श्वासनलीविलग्नं कफं प्रवृद्धं मलनामधेयम् ॥४३॥ अपि च मृतन्तु वङ्गं परिशीलितं वै निवारयेन्नातिचिरेण कामम् । सर्वाङ्गगं मानसवैकृतोत्थं प्रसादसंज्ञं पवनं वृद्धम् ॥ ४४ ॥ नूनमिति दृढानुभवव्यापकम् । एवञ्च प्राचीनतन्त्रानुक्तमपि अनुभवविशेषात् शिष्यबुद्धिवैशद्यार्थमुक्तमिति । एवमेव प्रसादवातशान्तिरपि वङ्गाज्जायमाना नवाविष्काररूपैवेति विशेषः ॥ ४३-४४ ॥ भा.टी.-सम्यक् प्रकार मारित वङ्ग के सेवन करने से शीघ्र ही श्वासनली में चिपका हुआ पुरातन मलभूत कफप्रकोप अवश्य ही नष्ट हो जाता है । और