भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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अष्टादशतरङ्गः ४४१ को नीचे उतार कर वंग को एक खरल में डालें और उसमें वंग से आधा भाग शुद्ध हरताल का चूर्ण मिला खूब अच्छी तरह पीस लें । अब इस सूक्ष्मचूर्ण में आक का दूध मिला मर्दन करके छोटी-छोटी टिकिया बनाकर सुखा लें । अब एक हांडी में आधे भाग तक पीपल वृक्ष की त्वचा की राख भरकर उसपर वंग की टिकियों को रखकर फिर अवशिष्ट भाग में उक्त पीपल की राख अच्छी तरह दबा-दबा कर भर दें और चूल्हे पर पकायें अथवा एक सम्पुट में पीपल राखके बीच में वंग को रखकर उसको बन्द करके लावकपुट में फूँक दें । इस प्रकार दो पुटों में ही वंग की उत्तम भस्म हो जाती है ॥२७, २८॥ चतुर्थो मारणप्रकारः विशुद्धं वङ्गमादाय कटाहे गालयेद्भिषक् । शुष्कपिप्पलवल्कोत्थं चूर्णं तुल्यं विनिक्षिपेत् ॥ २६ ॥ स्वल्पं स्वल्पं मुहुश्चैव लोहदर्व्या प्रचालयेत् । ० ङ्गभस्म भवेद्यावच्चूर्णं तावत्समापयेत् ॥ ३० ॥ राशीकृत्य ततो भस्म शरावेण पिधापयेत् । ज्वलदङ्गारवर्णा स्याद् वङ्गभस्म यथा चिरम् ॥३१॥ तथा प्रदापयेदग्निं दिनमेकं भिषग्वरः । स्वतःशीतं ततो ज्ञात्वा सुमृतं वङ्गमाहरेत् ॥ ३२ ॥ बहुशः क्षालयेत्तोयैः क्षारहीनं यथा भवेत् । ततः सर्वप्रयोगेषु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ ३३ ॥ अस्य च क्षारांशबहुलतया प्रक्षालनम् । रक्तं वर्णकपत्रं आङ्गलभाषायां “Red Litmus Paper” इति नाम्ना प्रसिद्धम् वङ्गभस्म धावनाम्भसि निक्षिप्तं, चेन्नीलवर्णतां नोपेयात्तदा वंगभस्म धावनाम्भसि निक्षिप्तं चेन्नील- वर्णतां नोपेयात्तदा वङ्गभस्म क्षारशून्यं संजातमिति जानीयात्, अन्यथा सक्षा- रमिति व्यवस्येत् ॥ २६-३३ ॥ भा.टी.—शुद्ध खुरकवंग को एक लोहे की कड़ाही में डालकर चूल्हे पर अग्नि से तपायें । जब वंग पिघल जाय तो उसमें वंग के बराबर भाग पीपलवृक्ष की छाल के चूर्ण ( शुष्क ) को थोड़ा-थोड़ा करके डालते जायँ और वङ्ग को लोहे की करछी से रगड़ते या चलाते रहें । इस प्रकार जब वंग की भस्म हो जाय तो उसे कड़ाही के तलप्रदेश में इकट्ठा करके एक मिट्टी के सिकोरे से ढक दें और उसके नीचे एक दिन की तीव्र अग्नि जलायें । जब देखें कि