भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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४४० रसतरङ्गिणी शङ्खकुन्देन्दुधवलं वङ्गभस्म भवेद् ध्रुवम् । इत्थं मृतं वङ्गकन्तु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥२४॥ अपामार्गचूर्णात्क्षेपाद् वङ्गभस्मनिर्माणं द्वितीयम् । वीतशङ्कः अपक्वताशङ्का- रहितः । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ १६-२४ ॥ भा.टी.—एक लोहे की कड़ाई को चूल्हे पर रखकर उसमें खुरकवंग डाल दें और चूल्हे में अग्नि जलायें । जब अग्निताप से वंग पिघल जाय तो उसमें वंग से चतुर्थांश अपामार्ग का चूर्ण थोड़ा-थोड़ा करके डालते जायं और लोहदण्ड या लोहे की करछी से उसे अच्छी तरह रगड़ते जायँ जब तक कि वंग की भस्म न हो जाय । वंग भस्म होने पर उसको कढ़ाही के तल प्रदेश में एकत्र करके एक मिट्टी के सकोरे से औंधा मुँह ढक दें और उसके नीचे एक दिन तक अग्नि जलायें जिसमें कढ़ाही की भस्म ढक्कन उठाकर देखने में जलते हुए अंगारों के समान लाल हो जाय । अत्र अग्नि देना बन्द कर दें और कढ़ाही को स्वांगशीत होने दें । स्वांगशीत होने पर कढ़ाही में से शंख, चन्द्रमा के समान श्वेतवर्ण की वंगभस्म को निकाल लें और इसको निःशंक होकर प्रयोग में लायें ॥१६-२४॥ तृतीयो मारणप्रकारः विशुद्धं वंगमादाय कटाहे गालयेद्भिषक् । पादांशिकविशुद्धञ्च तत्र सूतं विनिक्षिपेत् ॥ २५ ॥ दत्त्वा सम्मर्द्य यत्नेन द्रुतमेवावतारयेत् । वंगार्द्धं तालकं दत्त्वा खल्वे सम्पेपयेत्ततः ॥ २६ ॥ श्लक्ष्णचूर्णं ततः कृत्वा रविदुग्धेन मर्दयेत् । पिप्पलत्वक्समुत्थाच्छक्षारमध्यगतं भिषक् ॥ २७ ॥ शरावसम्पुटे न्यस्य र्लावकाख्यपुटे पुटेत् । इत्थं पुटद्वयेनैव वंगं तु मृतिमप्नुयात् ॥ २८ ॥ तृतीयः प्रकारः पारदतालकयोगसाध्यः-पिप्पलत्वक्समुत्थनिर्मल क्षारमध्ये स्थापनप्रकारश्च तालभस्मीकरणप्रकरणे भणितपरिभाषः ॥ २५–२८ ॥ भा.टी.-स्वच्छ खुरक वंग को डालकर उसको अग्नि पर चूल्हे में रख- कर पिघलायें और वंग में वंग से चतुर्थांश शुद्ध पारद भी डाल दें । पिघले हुए वंग में पारद डालकर मर्दन करके दोनों एक हो जाने पर शीघ्र ही कढ़ाही