रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशस्तरङ्गः ७३६ वङ्गात् कलांशकं सूतं विशुद्धं तत्र निक्षिपेत् । विशुद्धं हरितालञ्च स्वल्पं स्वल्पं मुहुर्मुहुः ॥ १५ ॥ निक्षिप्य वनकार्पासदण्डेन परिचालयेत् । यावद्भस्म भवेत्तावत्तालचूर्णं समापयेत् ॥ १८ ॥ ततः शरावेणाच्छाद्य पचेत्तीव्राग्निना भिषक् । अनेन विधिना वङ्गं पञ्चतां यात्यनुत्तमाम् ॥ १८ ॥ मारणस्य प्रथमः प्रकारः—कलांशिकं षोडशभागिकम् । हरितालं यथा- योग्यमानम् । तालचूर्णस्य भस्मपर्यन्तं समापनम् । भस्मोत्तरमपि शरावेणाच्छाद्य तीव्राग्निदानं निरुत्थताकरणार्थमित्यनुसन्धेयम् । एवमग्रेऽपि ज्ञेयम् । पञ्चतां मृत्युम् ॥ १५-१८ ॥ भा.टी.—एक लोहे की कड़ाही को अग्नि के ऊपर चूल्हे पर रखकर उसमें खुरकवंग डाल दें और वंग के साथ ही वंग से सोलहवाँ भाग शुद्ध पारा भी डाल दें और अग्नि को तेज कर दें। जब वंग पिघलने लगे तो उसमें थोड़ा-थोड़ा करके हरताल का चूर्ण डालें और जंगली कपास की गीली लकड़ी से वंग को चलाते जायें। जब तक वंग की भस्म न हो जाय तब तक हरतालचूर्ण डालते हुए कपास के डंडे से उसे चलाते रगड़ते जायें। जब वंग की भस्म हो जाय तो उसे कड़ाही के तले में एकत्र करके एक मिट्टी के सकोरे से ढककर फिर तेज अग्नि से पकायें। इस विधि से वङ्ग की भस्म बन जाती है ॥ १५-१८ ॥ वक्तव्य—हरतालचूर्ण डालते हुए रगड़ने पर वंग की भस्म होने पर फिर उसे ढककर तेज अग्नि देने से वह निरुत्थ हो जाती है। द्वितीयो मारणप्रकारः विमलं वङ्गमादाय चुल्लिकोपरिसंस्थिते । विनिक्षिपेत् कटाहे तु ततो वह्निं प्रदीपयेत् ॥१९॥ विद्रुतं वङ्गकं ज्ञात्वा रसकर्मविशारदः । पादांशापामार्गचूर्णं स्वल्पं स्वल्पं मुहुर्मुहुः ॥२०॥ निक्षिप्य लोहदण्डेन यत्नतः परिचालयेत् । वङ्गभस्म भवेद्यावच्चूर्णं तावत्समापयेत् ॥२१॥ राशीकृत्य ततो भस्म शरावेण पिधापयेत् । ततो दिनैकपर्यन्तं तथा वह्निं प्रदीपयेत् ॥२२॥ धवलदङ्गारवर्णं स्याद् वङ्गभस्म यथा ध्रुवम् । स्वतः शीतं ततो ज्ञात्वा वङ्गभस्म समाहरेत ॥२३॥