भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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४६८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—शुद्ध मैनसिल द्वारा बनायी हुई उत्तम सीसकभस्म दो तोला, कान्तपाषाणभस्म दो तोला, चन्द्रिका रहित स्वर्णभस्म, खर्परभस्म, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म, प्रत्येक एक तोला और सबसे आधा भाग अर्थात् चार तोला शुद्ध- गन्धक लेकर सबको एकत्र खरल में घीकुआर के गूदे से मर्दन कर गोला-सा बना शरावसम्पुट में बन्द करके वराहपुट में फूँक दें। स्वांगशीत होने पर सम्पुट से द्रव को निकाल पुनः घीकुआर के गूदे में घोटकर सम्पुट में बन्द करके वराह- पुट में फूँक दें। पुनः तीसरी बार भी उक्त विधि से वराहपुट में फूँक दें। अन्त में सम्पुट से औषधि को निकाल खरल में पीस कर कांच की शीशी में रख लें। इसको अन्त्रशोषान्तक रस कहा जाता है। इस रस का आविष्कार श्री स्व० गुरुवर कविराज नरेन्द्रनाथ मित्रजी ने किया और यह अत्यन्त उपयोगी रस है ॥ ५६–६० ॥ अस्य गुणाः अन्त्रशोषापहरणो ग्रहणीविनिवारणः । जीर्णाजीर्णप्रहरणो यक्ष्मलक्ष्मनिबर्हणः ॥ ६१ ॥ अरोचकाद्युपगतं दारुणं दीर्घकालजम् । अतीसारं निहन्त्याशु कामं यक्ष्मसमाश्रयम् ॥ ६२ ॥ आध्मानापहमत्यन्तं गुल्मप्लीहनिषूदनम् । जीर्णज्वरप्रशमनं बलसञ्जननं परम् ॥ ६३ ॥ गुञ्जार्द्धतः समारभ्य गुञ्जैकप्रमितं परम् । प्राणाचार्यः प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ६४ ॥ अस्य गुणाः—जीर्णाजीर्णं पुराणमजीर्णम्, तस्य प्रहरणो नाशक इत्यर्थः । यक्ष्मणोक्ष्म लक्षणं तस्य निबर्हणो नाशकः । स्पष्टमन्यत् ॥ ६१–६४ ॥ भा.टी.—उक्त अन्त्रशोषान्तक रस आन्त्रशोथ (क्षय) को नष्ट करता है और ग्रहणी रोग को मिटाता है। इसके कुछ दिन सेवन से पुरातन अजीर्ण रोग मिट जाता है और यह राजयक्ष्मा के लक्षणों को नष्ट करता है। राजयक्ष्मा रोग में होनेवाले दीर्घकालीन अरुचि आदि अनेक उपद्रव युक्त अतीसार में इससे शीघ्र ही आराम आता है। वातप्रकोपजन्य उदराध्मान तथा गुल्म और प्लीहा- रोग को नष्ट करता है। जीर्णज्वरनाशक और शरीरबल वर्धक है। इस रस को रोग तथा रोगी का बल देखकर काल आयु प्रकृति आदि का विचार करके आधी रत्ती से एक रत्ती तक की मात्रा में प्रयोग करना चाहिये ॥ ६१–६४ ॥