रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकानविंशस्तरङ्गः ४६७ भा.टी.—एक रत्ती उत्तम सीसकभस्म में हरिद्राचूर्ण और आमलों का चूर्ण दो रत्ती मिलाकर शहद के साथ चटाने से बहुत शीघ्र प्रमेह रोग में आराम आता है । सीसकभस्म को अशोकत्वक्कषाय के साथ कुछ दिन सेवन करने से शीघ्र ही पुरातन रक्तप्रदर रोग में आराम आ जाता है । एक रत्ती सीसकभस्म में ४ रत्ती नागकेसरचूर्ण मिला सेवन करने से रक्तार्श रोग नष्ट हो जाता है । गुडूचीसत्त्व में सीसकभस्म मिलाकर शहद के साथ चाटने से कुछ दिनों में वात- प्रकोपजन्य प्रमेह रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । सीसकभस्म में स्वर्णभस्म, रससिन्दूर तथा ताम्रभस्म मिलाकर उचित अनुपान के साथ सेवन करने से आन्त्रशोथ (आन्त्रक्षय) में शीघ्र ही आराम आता है । वृक्कों में शोथ के कारण उत्पन्न विष द्वारा होनेवाले आक्षेप में सीसकभस्म का कौंच के बीज, बलामूल तथा जटामांसी कषाय के साथ सेवन करने से अवश्य आराम आता है । सर्वांग में कम्पन के साथ उत्पन्न होनेवाले पक्षाघात (लकवा) में सीसकभस्म को रस- सिन्दूर तथा ताम्रभस्म मिलाकर सेवन करने से आराम आता है । प्रसारिणी बला (करैंटी), रास्ना और कौंच के बीज या मूल के कषाय अनुपान से सीसक- भस्म में रजत तथा यशदभस्म मिलाकर सेवन करने से हस्तपाद आदि अंगों की प्रसारक मांसपेशीगत विकार के कारण उत्पन्न भयानक पक्षाघात में विशेषरूप से आराम आता है ॥ ४७-५५ ॥ अन्त्रशोषान्तकरः शिलया निहतं सीसं तोलकद्वयसंमितम् । कान्तपाषाणमसितं सीसकप्रमितं शुभम् ॥ ५६ ॥ निश्चन्द्रिकं सुवर्णं तु तथा यशदकारणम् । गगनं रविलोहं च पृथक् तोलकसंमितम् ॥ ५७ ॥ सर्वार्द्धं गन्धकं दत्त्वा पेषयेत्कन्यकाम्भसा । त्रिधा वराहाख्यपुटे पुटयेद्भिषजां वरः ॥ ५८ ॥ खल्वे सञ्चूर्ण्य च ततः काचकूप्यां तु विन्यसेत् । समाख्यातो रसोऽयं तु ह्यन्त्रशोषान्तकाभिधः ॥ ५९ ॥ श्रीमद्भिर्गुरुवर्यैस्तु ह्ययमाविष्कृतो रसः । प्रकाशितः खलु मया लोकानुग्रहकाम्यया ॥ ६० ॥ अन्त्रशोषान्तकरसो नवाविष्कृतः—यशदकारणं खर्परम् । रविलोहं ताम्रम् निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ५६-६० ॥