भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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पृष्ठ 507

४८२ रसतरङ्गिणी तस्योन्मादौपयिकत्वेऽपि सर्वत्र भक्षणानर्हत्वात् इत्याचक्षीरन् नव्याः, तस्मात् वार्षिकं द्वित्रिवार्षिकं वा पुराणमादेयं स्यादिति, पुराणं हि स्वल्पश्लेष्मलं भवति, तदेतत् ध्वनितं यत्नादित्यनेन पदेन इति, तन्न सम्यक् । तथाहि यद्यपि “योजयेन्नवमेवाज्यं भोजने तर्पणे श्रमे । बलक्षये पाण्डुरोगे कामलानेत्ररोगयोः ॥” इति प्राचीनसंवादात् नेत्ररोगे नवीनघृतप्रयोगः साधुः तथापि पुराणघृतस्यैव तिमिरापहत्वम्, नवीनस्य तु सामान्यतो नेत्ररोगनाशकत्वम्, पुरा- णत्वं च घृतस्य वर्षादूर्ध्वं भवत्येव उक्तं हि—“वर्षादूर्ध्वं भवेदाज्यं पुराणं तत् त्रि- दोषनुत् । मूर्च्छाकुष्ठविषोन्मादापस्मारतिमिरापहम् ॥” इति । अपि च “यथा यथाऽ- खिलं सर्पिः पुराणमधिकं भवेत् । तथा तथा गुणैः स्वैः स्वैरधिकं तदुदाहृतम् ॥” इत्यप्याहुः । तस्मात् प्रकृते तिमिररोगे पुराणस्यैव घृतस्योपयोग इति सिद्धम् । प्रवालभस्मसहितमिति प्रवालभस्म गुञ्जार्धं गुञ्जैकं वा मृतं यशदं गुञ्जैकमेतद्वयं सम्मेल्य मधुना प्राशयेदिति सम्प्रदायः । राजरोगो यक्ष्मा, तत्समुत्पन्नं कासम् । आत्म- गुप्ताशिफा मर्कटीमूलम् । कषायत इति सार्वविभक्तिकस्तसिः, तेन कषायेण सहे- त्यर्थः । चित्तावसादः आलस्यं, खेदः । टङ्कः टङ्कणम्, वंशजा वंशरोचना ॥१४५॥ भा.टी.-इलायचीबीजचूर्ण, दालचीनीचूर्ण, तेजपत्रचूर्ण के साथ यशदभस्म मिलाकर सेवन करने से त्रिदोषप्रकोप शान्त हो जाता है । जाठराग्नि को दीप्त करने के लिये यशदभस्म को अरणीमूलत्वक्चूर्ण के साथ कुछ दिन प्रयोग करना चाहिये । दृष्टिशक्ति की दुर्बलता में यशदभस्म को एक वर्ष के पुराने घी के साथ सेवन करने से शीघ्र ही नेत्रों की ज्योति बढ़ने लगती है बार-बार प्रतिश्याय हो जाने के कारण उत्पन्न होनेवाली नासिका की श्लैष्मिक कला की दुर्बलता में एक मास तक आधी रत्ती यशदपुष्प को घी में मिलाकर नस्य लेने से शीघ्र आराम आता है । क्षय रोग में होनेवाले रात्रिखेद में यशदभस्म को प्रवालभस्म के साथ सेवन करने से शीघ्र ही रात्रिस्वेद बन्द हो जाता है । विचर्चिका रोग में यशदभस्म या पुष्प को गोघृत में मिलाकर सात दिन तक प्रतिदिन लेप करने से शीघ्र ही विच- र्चिका में आराम आता है। एक रत्ती यशदभस्म को अभ्रकभस्म में मिलाकर शहद के साथ चटाने से शीघ्र ही उग्रवेग श्वास तथा कास में विशेषतः क्षयजन्य कास में आराम आता है। यशदभस्म को अदरखरस और शहद में मिला दिन में दो बार सेवन करने से भयंकर श्वास रोग में शीघ्र ही आराम आ जाता है। यशदभस्म को कौंच की जड़, रास्ना, बला तथा एरण्डमूल कषाय के साथ सेवन करने से कंपयुक्त पक्षाघात में आराम आ जाता है। प्रतमक श्वास में यशदभस्म को लोह-