भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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भस्म, अभ्रकभस्म और पिप्पलीचूर्ण मिला शहद के साथ चटाने से शीघ्र ही आराम आने लगता है। यशदभस्म को पूर्वोक्त स्वर्णवङ्ग में मिलाकर कुछ दिन सेवन करने से मानसिक खिन्नतायुक्त स्वप्नप्रमेह में आराम आता है। अशोक- त्वक्कषाय अनुपान से यशदभस्म सेवन करने से तीन चार मास रुकने के बाद अतिप्रबलरूप से होनेवाले और तीव्र वेदनायुक्त भयंकर मासिकस्राव में शीघ्र ही आराम आ जाता है। मासिकस्राव रुकने के कारण होनेवाले श्वेतप्रदर रोग में यशदभस्म को लोहभस्म और रालचूर्ण के साथ सेवन करने से श्वेतप्रदर में आराम आता है। सान्निपातिक ज्वर में, जिसमें रोगी के हाथ-पैर काँपने लगे हों और वह प्रलाप करता हो, यशदभस्म में रससिन्दूर और भीमसेनी कपूर मिलाकर सेवन कराने से आराम आता है। बड़ी कठिनाई से कफ निकलनेवाले श्वास में यशदभस्म को सुहागा, अभ्रकभस्म और वंशलोचनचूर्ण के साथ मिलाकर देने से शीघ्र आराम आने लगता है। यशदभस्म में रससिन्दूर मिलाकर शहद के साथ कुछ दिन सेवन करने से बेचैनी या थकावट युक्त मस्तिष्क की दुर्बलता में लाभ होता है। हिस्टीरिया-रोग को दूर करने के लिये यशदभस्म का स्वर्णभस्म के साथ मिलाकर सेवन करने से शीघ्र लाभ होता है। आधासीसी के दर्द तथा सूर्यावर्त शिरोरोग में यशदभस्म को रजतभस्म तथा स्वर्णमाक्षिकभस्म मिलाकर चित्रकमूलत्वक्- अनुपान से सेवन करने पर शीघ्र आराम आता है ॥ १२६-१४५ ॥ अथ यशदामृतमलहरः त्रिकर्षं सिक्थतैलन्तु पूर्वोक्तविधिसोधितम् । तोलकैकमितं दद्यात् यशदं वह्निजारितम् ॥ १४६ ॥ खल्वेऽतिमसृणे क्षुद्रे मर्दयेदतियत्नतः । समाख्यातो मलहरो यशदामृतसंज्ञकः ॥ १४७ ॥ यशदामृतमलहरः—वह्निजारितमिति चतुर्थमारणप्रकारेण साधितम् ॥ १४७॥ भा.टी.—तीन कर्ष सिक्थतैल ( मोम और तैल ) एक तोला अग्निजारित यशद अर्थात् जस्त का फूला लेकर दोनों को एकत्र खरल में अच्छी तरह मर्दन करके मलहम बना लें। इसको यशदामृतमलहम कहते हैं ॥ १४६, १४७ ॥ अस्य गुणाः मतो मलहरोऽयं तु विविधव्रणरोपणः । विचर्चिकाहरः काममग्निदग्धव्रणापहः ॥ १४८ ॥

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