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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

भस्म, अभ्रकभस्म और पिप्पलीचूर्ण मिला शहद के साथ चटाने से शीघ्र ही आराम आने लगता है। यशदभस्म को पूर्वोक्त स्वर्णवङ्ग में मिलाकर कुछ दिन सेवन करने से मानसिक खिन्नतायुक्त स्वप्नप्रमेह में आराम आता है। अशोक- त्वक्कषाय अनुपान से यशदभस्म सेवन करने से तीन चार मास रुकने के बाद अतिप्रबलरूप से होनेवाले और तीव्र वेदनायुक्त भयंकर मासिकस्राव में शीघ्र ही आराम आ जाता है। मासिकस्राव रुकने के कारण होनेवाले श्वेतप्रदर रोग में यशदभस्म को लोहभस्म और रालचूर्ण के साथ सेवन करने से श्वेतप्रदर में आराम आता है। सान्निपातिक ज्वर में, जिसमें रोगी के हाथ-पैर काँपने लगे हों और वह प्रलाप करता हो, यशदभस्म में रससिन्दूर और भीमसेनी कपूर मिलाकर सेवन कराने से आराम आता है। बड़ी कठिनाई से कफ निकलनेवाले श्वास में यशदभस्म को सुहागा, अभ्रकभस्म और वंशलोचनचूर्ण के साथ मिलाकर देने से शीघ्र आराम आने लगता है। यशदभस्म में रससिन्दूर मिलाकर शहद के साथ कुछ दिन सेवन करने से बेचैनी या थकावट युक्त मस्तिष्क की दुर्बलता में लाभ होता है। हिस्टीरिया-रोग को दूर करने के लिये यशदभस्म का स्वर्णभस्म के साथ मिलाकर सेवन करने से शीघ्र लाभ होता है। आधासीसी के दर्द तथा सूर्यावर्त शिरोरोग में यशदभस्म को रजतभस्म तथा स्वर्णमाक्षिकभस्म मिलाकर चित्रकमूलत्वक्- अनुपान से सेवन करने पर शीघ्र आराम आता है ॥ १२६-१४५ ॥ अथ यशदामृतमलहरः त्रिकर्षं सिक्थतैलन्तु पूर्वोक्तविधिसोधितम् । तोलकैकमितं दद्यात् यशदं वह्निजारितम् ॥ १४६ ॥ खल्वेऽतिमसृणे क्षुद्रे मर्दयेदतियत्नतः । समाख्यातो मलहरो यशदामृतसंज्ञकः ॥ १४७ ॥ यशदामृतमलहरः—वह्निजारितमिति चतुर्थमारणप्रकारेण साधितम् ॥ १४७॥ भा.टी.—तीन कर्ष सिक्थतैल ( मोम और तैल ) एक तोला अग्निजारित यशद अर्थात् जस्त का फूला लेकर दोनों को एकत्र खरल में अच्छी तरह मर्दन करके मलहम बना लें। इसको यशदामृतमलहम कहते हैं ॥ १४६, १४७ ॥ अस्य गुणाः मतो मलहरोऽयं तु विविधव्रणरोपणः । विचर्चिकाहरः काममग्निदग्धव्रणापहः ॥ १४८ ॥

४८४ रसततरङ्गिणी भा.टी.—यह यशद मलहर विविध प्रकार के व्रणों को रोपण करता और विचर्चिका में लाभदायक है तथा अग्निदग्ध व्रणों के लिये विशेष रूप से लाभदायक है ॥ १४८ ॥ अथ गन्धकाम्लीययशदस्य निर्माणप्रकारः विमलयशदचूर्णं काचपात्रे तु पूर्वं विशदविपुलबुद्धिः स्थापयेद्वैद्यवर्यः । तदनु खलु सनीरं गन्धकाम्लं क्षिपेद्वै द्रवति यशदचूर्णं यावता द्रावकेण ॥ १४६ ॥ ततः सारकपत्रेण सारयेत्तु विधानतः । काचपत्रे निधायाथ पचेन्मन्दाग्निना भिषक् ॥ १५० ॥ द्रवांशं शोषयेद्यत्नाद्रसकर्मविचक्षणः । किञ्चिद्द्रवाविशेषे च पात्रं भूमौ निधापयेत् ॥ १५१ ॥ समुज्ज्वलं सुधवलं काचपात्रतलस्थितम् । गन्धकाम्लीययशदचूर्णं शुद्धं समाहरेत् ॥ १५२ ॥ गन्धकाम्लीययशदः—अस्य च द्रुतस्यैव प्रायः प्रयोग इत्युक्तं रसवेदिभिः नव्यरासायनिकैः ॥ १४६–१५२ ॥ भा.टी —एक काँच के पात्र में पहिले शुद्ध यशदचूर्ण डालें, अब उसमें सजल (हल्का) गन्धकाम्ल थोड़ा-थोड़ा करके डालते जायँ, जब सम्पूर्ण यशद- चूर्ण इस गन्धकाम्ल से गल जाय तो इस द्रव को सारकपत्र (Filler Paper) से छानकर छने हुए द्रव को फिर एक काँचपत्र में डालें और मन्द-मन्द अग्नि से पकायें । जब उसमें से द्रवांश सूख जाय और यह किञ्चित् गीला-सा रहे, तो इस पात्र को नीचे उतार ठंडा कर लें । ठंडा होने पर पात्रतल में श्वेत वर्ण का शुद्ध गन्धकाम्ल यशदचूर्ण प्राप्त होता है । इसको यशदगन्धित् अथवा Zinc Sulphate) कहते हैं ॥ १४६–१५२ ॥ गन्धकाम्लीययशदस्य गुणाः गन्धकाम्लीययशदचूर्णं पूयघ्नमुत्तमम् । व्रणसंस्त्रावशमनं नेत्राभिष्यन्दनाशनम् ॥ १५३ ॥ व्रणमेहहरं चैव श्वेतप्रदरकप्रणुत् । सङ्कोचकृद्विशेषेण कीर्तितं रसवेदिभिः ॥ १५४ ॥ शुष्कं गन्धाम्लयशदं क्षारकर्मकरं परम् । क्षारकर्मप्रयोगाथेमतस्तद् विनियुज्यते ॥ १५५ ॥

एकोनविंशस्तरङ्गः ४८५ गन्धकाम्लीययशदं शुष्कं प्रायो न युज्यते । योजयेद्विधिना वैद्यो द्रवीकृत्य विधानतः ॥१५६॥ भा.टी.—गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण (Zinc Sulphate) उत्तम पूय- नाशक और व्रणस्रावशोषक द्रव्य है । इसके प्रयोग से नेत्राभिष्यन्द रोग दूर हो जाता है । व्रणमेह (सुजाक) तथा श्वेतप्रदर में उसको उत्तरबस्ति विधान से देने पर शीघ्र लाभ होता है । इसमें संकोचक शक्ति विशेष रूप से होती है । अर्थात् जिंकसल्फेट के द्रव को उक्त रोगों में प्रयोग किया जाता है । इसका शुष्क चूर्ण उत्तम क्षारकर्म ( दाह ) करनेवाला होता है। अतः इसे क्षारकर्म प्रयोगार्थ काम में लिया जाता है । परन्तु गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण शुष्क चूर्णा- वस्था में बहुत कम ही प्रयोग में लिया जाता है । अतः इसको द्रवरूप में उक्तरोगों में प्रयोग करना चाहिये ॥ १५३-१५६ ॥ वक्तव्य—यद्यपि यहाँ पर गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण को दाहक माना है, परन्तु इसकी अपेक्षा यशदहरिद् (Zinc Chloride) अधिक दाहक होता है, उसे दाहकयशद भी कहते हैं । यह तीव्रदाहक और प्रबल जीवाणुहर होता है । अथ गन्धकाम्लीययशदद्रवस्य प्रथमो निर्माणप्रकारः गन्धकाम्लीययशदं रक्तिकैकमितं शुभम् । सार्द्धद्वितोलकमिते सलिले तु परिश्रुते ॥१५७॥ संद्राव्य खलु यत्नेन काचकुप्यां निधापयेत् । गन्धकाम्लीययशदद्रवोऽयं नामतो मतः ॥१५८॥ भा.टी.—एक रत्ती शुद्ध गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण को ढाई तोले शुद्ध परिश्रुत जल (Distilled water) में घोलकर छान लें । अब इसे एक काँच की शीशी में रख लें । इसी को गन्धकाम्लीय यशद द्रव कहा जाता है ॥ १५७, १५८ ॥ अस्य गुणाः गन्धकाम्लीययशदद्रवोऽयं व्रणमेहहृत् । नेत्राभिष्यन्दशमनो रोपणो भूतनाशनः ॥१५६॥ भा.टी.—उक्त प्रकार से बनाया हुआ गन्धकाम्लीय यशदद्रव व्रणमेह (सुजाक) में उत्तरबस्ति के रूप में देने से शीघ्र लाभ करता है । यह नेत्राभि- ष्यन्दरोगनाशक, व्रणरोपक और कृमिनाशक है ॥ १५६ ॥

४. तरंग १६-२०: रत्न, उपरत्न, क्षार व द्रावक वर्ग निर्माण

४८६ रसतरङ्गिणी अस्य आमयिकः प्रयोगः बिन्दुत्क्षेपकयन्त्रेण द्रवोऽयं लोचनार्पितः । विनिहन्त्यचिरादेव नेत्राभिष्यन्दजां रुजम् ॥ १६० ॥ मेढ्रमूलं दृढं बध्वा स्फीतकेन विधानतः । यत्नादुत्तरबस्त्युक्तविधानेन ह्यनारतम् ॥ १६१ ॥ गन्धकाम्लीययशदद्रवोऽयं विनियोजितः । सप्ताहद्वितयेनैव व्रणमेहं व्यपोहति ॥ १६२ ॥ भा.टी.—उक्त द्रव को बिन्दुत्क्षेपक यन्त्र (Dropper) से नेत्रों में डालने से शीघ्र ही नेत्राभिष्यन्द रोग में लाभ होता है। सुजाक में जब मूत्रेन्द्रिय से पूय आता हो तो मूत्रेन्द्रिय के मूल प्रदेश को स्फीतक (पट्टी) से बाँध कर सावधानी से उत्तरबस्ति द्वारा यदि इस द्रव को मूत्रेन्द्रिय में निरन्तर दो सप्ताह तक डाला जाय अर्थात् दिन में दो-तीन बार इस द्रव की उत्तरबस्ति दी जाय तो सुजाक का व्रण अच्छा हो जाता है ॥ १६०-१६२ ॥ गन्धकाम्लीययशदद्रवस्य द्वितीयो निर्माणप्रकारः गन्धकाम्लोययशदं षट्त्रिंशद्रक्तिकोन्मितम् । परिस्रुते तु सलिले षष्टितोलकसंमिते ॥ १६३ ॥ संद्राव्य खलु यत्नेन काचकुप्यां निधापयेत् । गन्धकाम्लीययशदद्रवोऽयं भाषितो बुधैः ॥ १६४ ॥ भा.टी.—छत्तीस रत्ती शुद्ध गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण को साठ तोला शुद्ध परिस्रुत जल में घोलकर एक स्वच्छ काँच की शीशी में रख लें। इसको भी गन्धकाम्लीय यशदद्रव (Zinc Sulphate lotion) कहते हैं ॥ १६३, १६४॥ अस्य गुणाः गन्धकाम्लीययशदद्रवोऽयं व्रणरोपणः । संकोचकृद्विशेषेण श्वेतप्रदरमुल्बणम् ॥ १६५ ॥ भा. टी.—यह द्वितीय प्रकार का गन्धकाम्लीय यशदद्रव, व्रणरोपक (भरनेवाला) संकोचक और विशेष रूप से श्वेतप्रदरनाशक होता है ॥ १६५ ॥ अस्य प्रयोगविधिः यत्नादुत्तरबस्त्युक्तरीत्या तु विनियोजितः । द्रवोऽयं नाशयत्याशु श्वेतप्रदरमुल्बणम् ॥ १६६ ॥

विंशस्तरङ्गः ४८७ भा.टी.—इसे सावधानी के साथ उत्तरबस्ति विधान (डूस) से प्रयोग में लाया जाय तो इससे श्वेतप्रदर में शीघ्र आराम आता है ॥ १६६ ॥ अथ यशदामृतद्रवस्य निर्माणप्रकारः गन्धकाम्लं ययशदं युगरक्तिकसंमितम् । टङ्कणाम्लद्रवे रम्ये पञ्चतोलकसंमिते ॥१६७॥ निक्षिप्य खलु यत्नेन काचकुप्यां तु विन्यसेत् । समाख्यातो द्रवोऽयं तु यशदामृतसंज्ञकः ॥१६८॥ गन्धकाम्लीययशदद्रवः भूतनाशनः जीवाणुध्वंसी। अस्य च द्वितीयः प्रकारो व्रणरोपणादिगुणः सुगमपाठः । युगरक्तिसम्मितमिति द्विरक्तिप्रमाणमित्यर्थः ॥१६८॥ भा.टी.—चार रत्ती शुद्ध गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण को पाँच तोला शुद्ध टंकणाम्ल द्रव में मिलाकर एक स्वच्छ काँच की शीशी में रख लें । इसी को यशदामृत द्रव नाम से कहा जाता है ॥ १६७, १६८ ॥ अस्य गुणाः यशदामृतसंज्ञोऽयं द्रवः शोथप्रणाशनः । शिशिरश्चैव रक्तार्माभिष्यन्दादिनिपूदनः ॥१६६॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः बिन्दुक्षेपकयन्त्रेण द्रवोऽयं नेत्रयोजितः । विनिहन्त्याशु रक्तार्माभिष्यन्दाद्यक्षिगामयान् ॥१७०॥ इति सीसकादिविज्ञानीयो नाम एकोनविंशस्तरङ्गः । भा.टी.—उक्त यशदामृत द्रव व्रण आदि के शोथ को शान्त करता है और शीत गुण होता है । अतएव यह रक्तार्म तथा रक्तप्रकोपजन्य नेत्राभिष्यन्द आदि रोगों को नष्ट करता है । यशदामृत द्रव को विन्दुक्षेपकयन्त्र से नेत्रों में दो-तीन बार डालने से शीघ्र ही रक्तार्म नेत्राभिष्यन्द आदि नेत्ररोगों में लाभ होने लगता है ॥ १६६, १७० ॥ यह सीसकादिविज्ञानीय नाम एकोनविंश तरङ्ग समाप्त हुआ । अथ लोहादिविज्ञानीयो नाम विंशस्तरङ्गः अथ लौहस्य भेदास्तेषां वैशिष्टयञ्च मुण्डं तीक्ष्णं तथा कान्तं लौहं त्रिविधमुच्यते । मुण्डात्तीक्ष्णं ततः कान्तं प्रशस्तं परिकीर्तितम् ॥१॥

४८८ रसतरङ्गिणी

तत्रादौ लोहभेदाः यद्यपि प्राचीनाचार्यैः बहुविधाः सन्ति निर्दिष्टास्तथापि उपलभ्यमानप्रायिकलोहभेदाभिप्रायेणैव मुण्डं तीक्ष्णं कान्तमिति त्रेधा लोह- संख्यानमुक्तमाचार्यैरिति । जातिभेदेन लोहगुणविनिर्णयविस्तरस्तु लोहसर्व- स्वादावनुसन्धेयः । प्रकृते तु यथाप्राप्तं लौहत्रिकमेवादाय समन्वय इति । एषु चोत्तरोत्तरं गुणप्रकर्ष इत्याह मुण्डात्तीक्ष्णं ततः कान्तमिति ॥ १ ॥ भा.टी.—मुण्डलोह, तीक्ष्णलौह तथा कान्तलौह भेद से लौह के तीन भेद माने जाते हैं। इनमें मुण्डलोह की अपेक्षा तीक्ष्णलौह और तीक्ष्णलौह की अपेक्षा कान्तलौह उत्तम माना जाता है ॥ १ ॥ मुण्डलोहस्य नामानि मुण्डं तथा मुण्डलोहं कृषिलोहं शिलात्मजम् । कृष्णायसं दृप्तसारमायसञ्च निगद्यते ॥ २ ॥ भा.टी.—मुण्डलोह को मुण्ड, कृषिलौह (खेती के काम आनेवाला लोहा), शिलात्मज, कृष्णायस, दृप्तसार तथा आयस नाम से व्यवहार किया जाता है॥२॥ तीक्ष्णलौहस्य नामानि लोहो लौहं लोहकञ्च शस्त्रलोहञ्च तीक्ष्णकम् । सारलोहं काललोहं त्रयश्च तदिहोच्यते ॥ ३ ॥ भा.टी.—लोह, लौह, लोहक, शस्त्रलोह (औजारों के काम आनेवाला), तीक्ष्णक, सारलोह, काललोह और अयः, ये सब नाम तीक्ष्णलौह (फौलाद) के कहे जाते हैं ॥ २ ॥ कान्तलोहस्य नामानि कान्तलोहं तथा कान्तं त्वयस्कान्तञ्च तन्मतम् । कान्तायसं महालोहं तदेव विनिगद्यते ॥ ४ ॥ एतेषां नामानि कानिचित्स्वरूपनिर्णायकानि तन्त्रे व्यवहारार्थञ्चेति ॥ ४ ॥ भा.टी.—कान्तलोह, कान्त, अयस्कान्त, कान्तायस और महालोह, ये सब नाम कान्तलौह के कहे जाते हैं ॥ ४ ॥ मुण्डलोहादीनां परिचयः कटाहपिष्टपचनखल्वादीनां विशेषतः । निर्माणाय मुण्डलोहं साम्प्रतं विनियुज्यते ॥ ५ ॥ कृपाणादिविनिर्माणे तीक्ष्णलोहं प्रयुज्यते । कान्तलोहञ्च कथितं बुधैः परमदुर्लभम् ॥ ६ ॥

विंशस्तरङ्गः ४८६ एतेषां परिचयः साम्प्रतमुपयोगद्वारा निर्णीतरूप इत्याह कटाहेत्यादि । कान्त- लोहञ्च यद्यपि भक्षणद्वारा गुणैरुत्तमं तथापि यन्त्राद्यनुपयुक्तत्वादनुद्धृतप्रायं खनेः इति दुर्लभं प्रायः। कान्तपाषाणध्मानविनिर्गतन्तु क्वचित् प्राप्यत एवाधुनापि इति । आहुश्च रसमाधवाः—"मुण्डन्तु वर्तुलं भूमौ पर्वतेषु च जायते। गजवल्ल्यादितीक्ष्णं स्यात् कान्तं चुम्बकसंभवम् ॥" इति। "मुण्डात् कटाहपात्रादि जायते तीक्ष्णलोहः। खड्गादिशस्त्रभेदाः स्युः कान्तलोहन्तु दुर्लभम् ॥ मुण्डात् शतगुणं तीक्ष्णं तीक्ष्णात् कान्तं शताधिकम् । तस्मान्मुण्डं परित्यज्य तीक्ष्णं वा कान्तमुत्तमम् ॥" इति च । तदिदमुक्तं समलं मुण्डलोहमित्यादिना ॥ ५, ६ ॥ भा.टी.—आजकल बड़े-बड़े कटाह, कड़ाही, खरल, फावड़े, कुदाली आदि बनाने के काम में मुण्डलोह लिया जाता है । अर्थात् ये चीजें जिससे बनायी जाती हैं उसे मुण्डलोह कहा जाता है । छुरी, चाकू, तलवार आदि अस्त्र के बनाने में जो लोहा काम आता है उसे तीक्ष्णलोह ( फौलाद ) कहते हैं । किन्तु कान्तलौह अत्यन्त दुर्लभ माना जाता है ॥ ५, ६ ॥ वक्तव्य—कान्तलोह यद्यपि अन्तःप्रयोग में सब लोहों की अपेक्षा उत्तम गुण करता है। परन्तु आजकल उसकी खोज अस्त्र-शस्त्रादिकों के बनाने में विशेष उपयोगी न होने से नहीं की जाती है । परन्तु कान्त पाषाण ( चुम्बक पत्थर ) को तपाने पर उसमें से इसको कहीं-कहीं प्राप्त भी किया जाता है । मारणोचितं लौहम् समलं मुण्डलोहं तु मारणाय न योजयेत् । तीक्ष्णलोहं कान्तलोहं यथालाभं प्रयोजयेत् ॥ ७ ॥ भा.टी.—भस्म करने के लिये मुण्डलोह को नहीं लेना चाहिये, क्योंकि यह अनेक प्रकार के मलों से मिश्रित होता है । इसके विपरीत तीक्ष्णलोह तथा कान्तलोह को यथासम्भव भस्म करने के लिये ग्रहण करना चाहिये ॥ ७ ॥ वक्तव्य—लोहा कार्वन द्विअम्लजित् के साथ मिला हुआ अम्लजित् के रूप में खानों से निकलता है । इन खानों में से प्राप्त होनेवाले पत्थरों को खूब भूना जाता है । जिससे वह पूरी तरह लोहओषित् बन जाता है । फिर इसमें से लोह को पृथक् करने के लिये भुने हुए कोयले ( जिन्हें कोक कहते हैं ) तथा चूने के पत्थरों के साथ भट्ठी में तपाते हैं। इस क्रिया से लोहओषित् की ओषजन बन जाती है, शेष लोहा पृथक् हो जाता है । परन्तु साधारण अग्नि से यह क्रिया सिद्ध नहीं होती है । अतः इसकी कच्ची धातु को पिघलाने के लिये ६० से १०० फुट ऊँची

४६० | रसतरङ्गिणी

तीव्र अग्नि को सहन करनेवाली ईंटों की कोष्ठी (भट्ठी) बनायी जाती है। इस कोष्ठी में चूने के पत्थर इसलिए रखे जाते हैं कि यह लोहे में विद्यमान अन्य अशुद्धियों को फास्फेट, सिलिकेट गन्धित आदि से मिलकर उन्हें कैल्शियम के फास्फेट आदि के रूप में परिवर्तित कर देता है। वह कैल्शियम सिलिकेट आदि नीचे गिरते-गिरते पिघल जाते हैं। किन्तु हल्के होने से लोह के ऊपर तैरते हैं और लोहे का मैल कोष्ठी के पार्श्व में कुछ ऊँचाई पर बने हुए छिद्र से बाहर निकलता रहता है, इसे ही लोहकिट्ट या मण्डूर कहा जाता है। इस विधि से प्राप्त लोहे को ढलवालोह या मुण्डलोह कहते हैं। इसमें समभाग २½% प्रति- शत कार्बन होती है। यह मुंडलोह भंगुर, कठोर, भूरा सा और अपेक्षाकृत शीघ्र द्रवणशील होता है। इसके खंड को गरम कर पीट करके दूसरे टुकड़े से नहीं मिलाया जा सकता है। शुद्ध लोह—उपर्युक्त प्रकार से प्राप्त लोह को फिर कोष्ठी में रखते हैं जिसमें धौंकनी द्वारा अन्दर हवा पहुँचायी जाती है। इस क्रिया से लोह में विद्य- मान सारा कार्बन जल जाती है। फिर वह लोहा मृदु तथा अभंगुर हो जाता है और शीघ्र नहीं पिघलता है। इसके दो खण्डों को गरम करके मिलाया जा सकता है। इसमें २ प्रतिशत कार्बन होती है। इसी को मृदुलोह भी कहते हैं। तीक्ष्ण लौह—यदि भट्ठी में पिघले हुए पूर्वोक्त लौह में ढलवे लोहे की उचित मात्रा डाल दी जाय तो वह तीक्ष्णलोह या फौलाद बन जाता है। यह ढलवे लोह के समान कठोर और मृदुलोह के समान मृदु भी होता है। किन्तु ढलवे लोह के सदृश भंगुर नहीं होता और मृदुलोह की अपेक्षा शीघ्र पिघल जाता है और इसके दो खंडों को गर्म करके मिलाया भी जा सकता है। इसकी विशे- षता यह है कि इसकी कठोरता को न्यूनाधिक कर सकते हैं। यदि इसे लाल ताप तक पहुँचा कर शीघ्र ही शीतल जल में डाल दें तो यह अत्यन्त कठोर होकर काँच को भी काटनेवाला बन जाता है। परन्तु साथ ही भंगुर होता है। और गर्म करके धीरे-धीरे ठंडा होने दें तो यह मृदुलोह के समान मृदु तथा अभंगुर हो जाता है। लोहे का द्रवणांक (Melting Point) 15250 Centi- grade, Atomics भार 56.0, Density (पानी से कितना गुना भारी है) 7.45 है। लोह में जितना अधिक भाग Carbon (कोयला) का होगा उतना न्यून उसका द्रवणांक हो जाता है।

विंशस्तरङ्गः ४६१ ग्राह्यतीक्ष्णलोहस्य लक्षणम् उज्ज्वलं लोहफलकं धात्रीकाशीसलेपितम् । गिरिशृङ्गांकितं यत्स्यात्तीक्ष्णलोहं तदुत्तमम् ॥ ८ ॥ उज्ज्वलमित्यादि ग्राह्यतीक्ष्णलोहलक्षणम् । प्राञ्चस्तु-“कासीसामलकल्काक्ते- लोहेऽङ्गं दृश्यते स्फुटम् । तीक्ष्णलोहं तदुद्दिष्टम्” इत्याहुः । “क्ष्माभृच्छिखराका रायद्यङ्गान्याम्लेन लेपिते। लोहे स्युर्यत्र सूक्ष्माणि तत्सारममिश्रीयते ।।”इति च॥८॥ भा. टी.-जिस लोह के फलक (चौड़े पत्र ) में आंवला और कसीस का लेप कर देने से उसमें कुछ देर बाद पर्वत के शिखराकार उभार से उठ आयें तो उक्त लोह को तीक्ष्ण लोह कहा जाता है ॥ ८ ॥ कान्तलोहस्य लक्षणम् कान्तपाषाणजं लोहं कान्तलोहं प्रकीर्तितम् । आध्मातकान्तपाषाणसत्त्वभूतं तु तन्मतम् ॥ ६ ॥ कान्तलोहन्तु आध्मातकान्तपाषाणसत्त्वभूतमेवेति तत्परिचयः केवलमुक्तः । यद्यपि च प्राचीनतन्त्रेषु तत्र तत्र “यत्पात्रे न प्रसरति जले तैलबिन्दुर्निक्षिप्तो हिंगुर्गन्धं त्यजति च निजां तिक्ततां निम्बकल्कः । तप्तं दुग्धं भवति शिखरा कारकं नैति भूमिं कृष्णाङ्गः स्यात् सजलचणकः कान्तलोहं तदुक्तम् ॥” इति कान्तलोहलक्षणमुक्तम् । तथापि एतलक्षणलक्षितलोहस्यानुपलभ्यत्वात् उपल- भ्यमानकान्तपाषाणसत्त्वभूतं च लोहे उक्तलक्षणानुपलम्भात् यथाप्राप्तं तत्त्वस्व- रूपमात्रमुक्तमिति विचित्रं लक्षणं नोपश्लोकितमाचार्यैरित्यवधेयम् ॥६॥ भा.टी.-कान्तपाषाण को तपाने से प्राप्त होनेवाले सत्त्वस्वरूप लोह को कान्तलोह कहा जाता है ॥ ६ ॥ वक्तव्य--आगे लिखे जानेवाले प्राचीन मत से कान्तलोह के लक्षणों से युक्त लोह आज तक कहीं भी प्राप्त नहीं हो सका है । साथ ही यहाँ पर कान्त, पाषाणसत्वरूप कान्तलोह में भी प्राचीनमत के लक्षण नहीं मिलते हैं । इसी कारण से यहाँ अपना विचार दिखाकर इस वाद-विवाद को छोड़ दिया है। और प्राचीन मत भी कान्तलोह के विषय में दिखा दिया है कि कोई अन्वेषक इस तरह यदि खोज करना चाहे तो इस प्रकार कर सकता है । जिस लोह के पात्र में भरे हुए जल में तेल बूँद डालने से वह न फैले, और उस लोहपात्र में यदि नीम के पत्तों को पीस कर लेप कर दिया जाय तो उसमें कड़वापन न रहे। इसी तरह इस लोहपात्र में स्वच्छ चनों को जल के

४६२ रसतरङ्गिणी साथ भिगो दिया जाय तो वे काले पड़ जायँ और उस पर हींग का लेप कर दिया जाय तो उसमें हींग की गन्ध न रहे तो इस लोह को कान्तलौह समझना चाहिये। १ भ्रामक, २ चुम्बक, ३ कर्षक, ४ द्रावक, ५ रोमक, ये कान्तलोह के पाँच भेद माने जाते हैं। जिस लोह के मुख में किसी धातु को डालने पर वह धातु लोह के चारों तरफ चक्रवत् घूमता रहे तो उसे निःसन्देह भ्रामक कान्तलोह कहा जाता है और जिस लोह पर किसी धातु को लगा ( छुवा ) देने से यह लोह उस धातु को अपनी तरफ खींचता और छोड़ता जाय तो उसे चुम्बक कान्तलोह कहा जाता है। जो लौह धातु को दूर से अपनी ओर खींचकर अपने में चिपका ले और न छोड़े तो उसे कर्षक कान्तलोह कहा जाता है। जिस लौह के योग से स्वर्ण आदि पिघल जायँ तो उसे द्रावक कान्तलोह कहते हैं। और जिस लौह को अग्नि में तपाने पर लोह के फटने से चमकीले बाल जैसे रेशे निकल आयें या दिखायी दें तो इसे रोमक कान्त लौह कहते हैं। कान्तलोह के भेदों को ठीक-ठीक निर्णय कर अन्वेषण करने के लिये रसरत्न समुच्चय, आयुर्वेदप्रकाश आदि प्राचीन ग्रन्थों का अच्छी तरह अध्ययन करना चाहिए जिससे दुर्लभ द्रव्य की प्राप्ति से आयुर्वेदजगत् में विज्ञान की पक्की मोहर लगा सकें। उक्त पञ्चविध कान्तलोहभेदों में से भ्रामक संज्ञक कान्तलोह अधम, चुम्बक कान्तलौह मध्यम, कर्षककान्तलौह उत्तम और द्रावक कान्तलौह इन सब से उत्तम माना जाता है। यहाँ पर रोमककान्तलौह का वर्णन न करने से इसे भी उत्तम गुणयुक्त माना जायगा। कान्तलोह पीतवर्ण, कृष्णवर्ण तथा रक्तवर्ण का इस तरह वर्णभेद से तीन प्रकार का माना जाता है। इसमें से पीतवर्ण कान्तलोह का ब्रह्मा देवता, कृष्ण- वर्ण का विष्णु देवता और रक्तवर्ण कान्तलौह का शिव देवता माना जाता है। इसी पीतवर्ण से कृष्णवर्ण और कृष्णवर्ण से रक्तवर्ण कान्त उत्तम माना जाता है। एकमुख कान्तलोह, द्विमुख कान्तलोह, त्रिमुख कान्त, चतुर्मुखकान्त और पञ्चमुख तथा सर्वतोमुख कान्त, इस प्रकार मुखभेद से द्विमुख से त्रिमुख, त्रिमुख से चतुर्मुख और चतुर्मुख से पञ्चमुख और पञ्चमुख से भी सर्वतोमुख कान्तलोह उत्तम माना जाता है।

विंशस्तरङ्गः ४६३

हृदामयं पापरुजञ्च शूलं दाहं गुरुत्वं खलु षण्ढभावम् । प्रगाढवित्कत्वमथाश्मरीञ्च त्वशुद्धलोहं जनयत्यवश्यम् ॥१०॥ लोहशोधनप्रयोजनं हृदामयमिति--पापरुजं कुष्ठम् । उक्तं हि--"षण्ढत्व- कुष्ठामयमृत्युदं भवेद् हृद्रोगशूलौ कुरुतेऽश्मरीञ्च । नानारुजानाञ्च तथा प्रकोपं करोति हृल्लासमशुद्धलोहम् ॥" इति । अपिच--"गुरुता दृढतोत्क्लेशः कश्मलं दाहकारिता । अश्मदोषः सदुर्गन्धो दोषाः सप्तायसः स्मृताः ॥" इत्यप्याहुः । इदमशुद्धस्य दोषकीर्तनम् । असम्यङ्मारितन्तु “जीवहारि भदकारि चायसं देहशूलकृदसंस्कृतं ध्रुवम् । पाटवं न तनुते शरीरके दारुणां हृदि रुजाञ्च यच्छति ।" इत्युक्तदोषम् ॥ १० ॥ भा.टी.--क्योंकि अशुद्ध लोह सेवन से हृदयरोग, कुष्ठरोग, उदरशूल; नाड़ीशूल, दाह, शरीरगौरव तथा नपुंसकता, भयंकर मलबद्धता ( कब्ज ) और अश्मरी रोग उत्पन्न होने का डर रहता है, अतः लोह को शुद्ध करके ही अन्तः- प्रयोग में काम लाना चाहिये ॥ १० ॥ शोधनाय ग्राह्यलौहनिरूपणम् तीक्ष्णलोहस्य फलकान्यादाय भिषजां वरः । रेतयेल्लोहकारैस्तच्चूर्णं शुद्धयै प्रयोजयेत् ॥ ११ ॥ भा.टी.--तीक्ष्णलोह ( फौलाद ) के फलक ( चौड़े पत्र ) को लेकर लोहार से रेती से रेतवा कर उसका चूर्ण बना लें । अब इस चूर्ण का शोधन करना चाहिये ॥ ११ ॥ अथवा-- कृपाणादिविनिर्माणमुख्ययन्त्रालयोदितः । सुरेतितं तीक्ष्णलोहचूर्णं शुद्धयै नियोजयेत् ॥ १२ ॥ भा.ट.--जिन कारखानों में तलवार, चाकू, बन्दूक की नाल आदि बनाये जाते हैं वहाँ से अस्त्र-शस्त्र बनाने में रेती से रेतने पर सूक्ष्म रूप में निकलनेवाले, तीक्ष्ण लोहचूर्ण को शोधन के काम लाना चाहिये ॥ १२ ॥ अपि वा-- सूक्ष्मकण्टकवेधीनि पत्राणि खलु कारयेत् । लोहस्य लौहकारैस्तु तानि शुद्धयै नियोजयेत् ॥ १३ ॥ शोधनाय ग्राह्यलोहरूपम्--यथायोग्यलाभं चूर्णितं पत्रीकृतं वेति विकल्पः ।

४६४ रसतरङ्गिणी सूक्ष्मकटकवेधीने इति पत्रस्थूलतापरिमाणम् । प्राञ्चस्तु—"चतुरङ्गुलविस्ती- र्णमायामैश्चतुरङ्गुलम् । तिलोत्सेधतनुं चैव लोहपत्रं प्रचक्षते" ॥ १३ ॥ भा.टी.—यदि कारखाने से स्वयं रिता हुआ लोहचूर्ण न मिल सके तो लोहार से तीक्ष्णलोह के सूक्ष्म कटकवेधी पत्र बनवाकर उनको शोधन के काम लाना चाहिये ॥ १३ ॥ शोधनाय लोहपरिमाणम् एकसेटकतस्तीक्ष्णं समारभ्य भिषग्वरः । सेटकत्रयपर्यन्तं शोधयेन्मारयेत्तथा ॥ १४ ॥ मारणार्थे परिमाणन्तु एकसेटकतः इत्यादिनोक्तम् । प्राञ्चस्तु—"नायः पचेत् पञ्चपलादर्वागूर्ध्वं त्रयोदशात्" इत्याहुः । एतन्मानगणना च अनायास- सम्पादनार्थम्, अत्यल्पमानमारणसंमतिस्तु बहुआयासाल्पफलत्वादुक्तेति ॥ १४ ॥ भा.टी.—लौह को शुद्ध करना हो तो कम से कम एक सेर और अधिक से अधिक तीन सेर लोहचूर्ण अथवा पत्र लेकर शुद्ध करना चाहिये ॥ १४ ॥ वक्तव्य—प्राचीनरसग्रन्थों में पाँच पल से कम और तेरहपल से अधिक लोहशोधन नहीं करने को लिखा है। पाँच पल लोह के शोधन-मारण में अत्यन्त सुभीता होता है, अतः कम से कम यह परिमाण लिखा है। अथ लौहशोधनस्य प्रथमः प्रकारः तीक्ष्णलोहोन्मितं सूक्ष्मसूक्ष्मं रजो दर्विकासंस्थितं वह्निसन्तापितम् । सप्तधा स्नापितं त्रैफलेनाम्भसा लौहमेवं द्रुतं याति शुद्धिं पराम् ॥ १५ ॥ लौहशोधनस्य प्रथमः प्रकारः—त्रिफलाजले निर्वापणात्, एतेन गिरिदोष- शान्तिः इति प्राञ्चः ॥ १५ ॥ भा.टी.—तीक्ष्णलोह का अत्यन्त बारीक रेता हुआ चूर्ण लेकर उसको एक लोहे की करछी में डालकर तीव्र अग्नि में तपायें । जब अच्छी तरह तप्त हो जाय तो इसको एक पात्र में भरे हुए त्रिफलाक्वाथ में बुझा दें । इस विधि को सात बार दुहराने से लोहचूर्ण अच्छी तरह शुद्ध हो जाता है ॥ १५ ॥ वक्तव्य—प्राचीन ग्रन्थों में लिखा है कि त्रिफलाक्वाथ में लोहे को तपाकर बुझाने से गिरिदोष शान्त हो जाता है। अत्र जलक्वाथ्यनिक्षेप्यानां परिमाणम् त्रैफलं वल्कलं वै कलाभागिकं नागनेत्रक्षपानाथभागं जलम् ।

विंशस्तरङ्गः ४६५ पाचितं शोषितं वेदभागान्निमतं सेचनीयं त्वयः पञ्चभागोन्मितम् ॥ १६ ॥ अत्र परिभाषापानम्-त्रिफलायाः १६ भागाः, पाकार्थं जलम् १२८ भागि- कम्, चतुर्थांशशेषभागेन सेचनीयलोहम् ५ भागिकम् इत्युक्तम् । प्राञ्चोऽप्याहुः “वरा चतुर्गुणं लोहात् ततो वारि चतुर्गुणम् । दत्त्वा निष्क्वाथयेत्तावत् यावत् पादस्थितं भवेत् ॥” इति । “त्रिफलाष्टगुणे तोये त्रिफलाषोडशं पलम् । तत्क्वाथे पादशेषे तु लोहस्य पलपञ्चकम् ॥ कृत्वा पात्राणि तप्तानि सप्तवारं निषेचयेत् । एवं प्रलीयते दोषो गिरिजो लोहसम्भवः ॥” इति च ॥१६॥ भा.टी.—समभाग में लिये हुए हरड़ बहेड़ा और आँवलों का मिश्रित यव- कुटचूर्ण सोलह भाग लें । इसका कषाय बनाने के लिये एक सौ अट्ठाईस भाग जल लें । अब इसको पकाकर चतुर्थांश शेष अर्थात् बत्तीस भाग रखें । इस बत्तीस भाग अवशिष्ट कषाय में सेचन करने के लिये (गरम कर बुझाने के लिये) पाँच भाग लोहचूर्ण लेना चाहिये ॥१६॥ वक्तव्य—अन्यत्र भी इसी प्रकार क्वाथ, जल और निषेच्य (लोह) का परिमाण लिखा हुआ है—“त्रिफलाष्टगुणे तोये त्रिफलाषोडशं पलम् । तत्क्वाथे पादशेषे तु लोहस्य पलपञ्चकम् ॥ कृत्वा पत्राणि तप्तानि सप्तवारं निषेचयेत् ॥” लोहचूर्ण को गरम करके त्रिफलाकषाय में बुझाने के लिये प्रति वार नवीन क्वाथ काम में लाना चाहिए; न कि पहिली बार का बुझाया हुआ त्रिफलाकषाय काम में लाना चाहिए । प्रत्येक वार के लिए लोह समान भाग बनाया हुआ कषाय लेना चाहिये । द्वितीयः शोधनप्रकारः अतिसूक्ष्मरजस्त्वयसा ज्वलने परितप्तमलं मुनिवारमिह । कदलीनवमूलजले नियतं विमलत्वमुपैति निषेचनतः ॥ १७ ॥ अपरः प्रकारः—कदलीमूलजलेन सप्तधा सेचनात् सम्पाद्यः । उक्तं हि— “तप्तानि सर्वलोहानि कदलीमूलवारिणि । सप्तधामिनिषिक्तानि शुद्धिमायान्त्य- नुत्तमाम् ॥” इति ॥१७॥ भा.टी.—लोह के सूक्ष्मचूर्ण करछी में रख तीव्र अग्नि में गरम करके सात बार केले के नवीन कन्द के जल से बुझा देने से लोह की शुद्धि हो जाती है ॥१७॥ तृतीयः शोधनप्रकारः वराकषायसंयुते समे गवान्तु मूत्रके । निषेचितं तु सप्तधा त्वयो विशुद्धिमाप्नुयात् ॥ १८ ॥

४६६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—लोह चूर्ण को करछी में रखकर अति तीव्र अग्नि में तपाकर समभाग त्रिफलाक्वाथ और गोमूत्र को एकत्र मिला उसमें सात बार बुझाने से वह शुद्ध हो जाता है ॥१८॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः शशासृजा प्रलेपितं त्वयोऽर्कदुग्धतोऽपि वा । वराजले निषेचनाद् विशुद्धिमेत्यनुत्तमाम् ॥ १६ ॥ चतुर्थः शशरुधिरेण लेपनादर्कदुग्धलेपनाद्वा साध्यः । एतच्च कान्तलोहस्य प्रायः । उक्तं हि—“शशरक्तेन संलिप्तं किम्बार्कपयसायसम् । दलं हुताशने तप्तं सिक्तं त्रैफलवारिणि ॥ त्रिंशः कान्तस्य संशुद्धिरित्येवं परमा भवेत्” इति । यद्वा “तप्तं क्षाराम्लसंयुक्तं शशरक्तेन भावितम् । कान्तलोहं भवेच्छुद्धं सर्वदोषवि- वर्जितम् ॥” इत्याहुः । अपि च “तत्तद्व्याध्युपयुक्तानामौषधानां जलेऽयसः । प्रक्षेपं प्राह तत्त्वज्ञः सिद्धो नागार्जुनः पुरा ॥” इति रसमाधवे ॥१६॥ भा.टी.—तीक्ष्णलौह के बारीक पत्रों को लेकर उन पर खरगोश के रक्त का अथवा अर्कदुग्ध का लेप करके सुखा लें । अब इन पत्रों को अग्नि में तपा- कर त्रिफलाक्वाथ में सात बार बुझा देने से लोह शुद्ध हो जाता है ॥१६॥ अथ लौहशुद्ध्यनन्तरं तत्पाकक्रमः प्रथमं भानुपाकेन स्थालीपाकात्ततः परम् । पुटपाकेन पक्वञ्च लौहं सुमृतिमाप्नुयात् ॥ २० ॥ भा.टी.—लोहचूर्ण को शुद्ध करने पर पहिले उसका भानुपाक करना चाहिये । भानुपाक के बाद स्थालीपाक और इसके बाद लोह का पुटपाक करने से लोह उत्तम रूप से भस्म हो जाता है ॥२०॥ तत्रादौ भानुपाकलक्षणम् वराक्वाथयुतं लौहं भानोः प्रखरभानुभिः । शुष्यन् विपच्यते यस्माद् भानुपाकस्ततः स्मृतः ॥ २१ ॥ भा.टी.—त्रिफला के क्वाथ के साथ लौहचूर्ण को तीव्र धूप में सुखा लेते हैं, इसलिए इसे भानुपाक कहते हैं ॥२१॥ अथ भानुपाकविधानम् विमलं खलु लौहन्तु सलिलक्षालितं भिषक् । त्रिफलाक्वाथसंयुक्तं ततः खल्वे निधापयेत् ॥ २२ ॥ निदाघे तु निधायाथ भानोः प्रखरभानुभिः ।

३२ विंशस्तरङ्गः ४६७ शोषयेद्भिषजां वर्यः कुर्यादेवं तु सप्तधा ॥ २३ ॥ भानुपाके लौहतुल्या त्रिफला द्विगुणं जलम् । पादावशेषितक्वाथं वराक्वाथं प्रयोजयेत् ॥ २४ ॥ सोऽयं भानुपाकप्रक्रियाभेदो नागार्जुनादिसंमतः साम्प्रतमप्रचलितोऽपि गुणबहुलतयाऽऽदृत आचार्यैः ॥ २२-२४ ॥ भा.टी.—शुद्धलोहचूर्णं को लेकर पहिले उसे जल से अच्छी तरह धो लें। अब इस लोहचूर्णं में त्रिफलाकषाय मिलाकर किसी खरल में डालकर धूप में रख दें। जब त्रिफलाकषाय धूप से सूख जाय तो उसमें पुनः त्रिफलाकषाय डाल दें। इस विधि को सात बार दुहराने से लौह का भानुपाक हो जाता है। भानुपाक करने के लिये त्रिफलाकषाय बनाना हो तो लौह के समभाग त्रिफला लेकर उसमें द्विगुण जल डालकर पकायें, जब चतुर्थांश जल शेष रह जाय तो उसे छानकर लोह में डालकर धूप में रख दें ॥ २२–२४ ॥ स्थालीपाकस्य लक्षणम् त्रिफलाक्वथितोपेतं लौहं स्थाल्यां खराग्निना । शुष्यन् विपच्यते यस्मात् स्थालीपाकस्ततः स्मृतः ॥ २५ ॥ भा.टी.—लौहचूर्णं का उक्त विधान से सात बार भानुपाक करने पर उसे फिर त्रिफलाकषाय के साथ एक स्थाली (पतेली, लोहे की कड़ाही) में अतितीव्र अग्नि से पकाते हुए जल को सुखा लेने को स्थालीपाक कहा जाता है ॥२५॥ वक्तव्य—उक्त विधि से अच्छी तरह लौह का भानुपाक करके उसे जल से खूब अच्छी तरह धोकर साफ करलें। अब इस लोह को एक (लोहे के) पात्र में डालकर इसमें त्रिफलाक्वाथ मिलाकर चूल्हे पर अति तीव्र अग्नि से पकायें। जब त्रिफलाजल सूख जाय तो पुनः उसमें त्रिफलाजल डालकर पकायें। इस विधि से जितने त्रिफलाकषाय में उसे पकाना हो पका लें। स्थालीपाक करने के लिए त्रिफलाकषाय बनाना हो तो लोहचूर्णं से त्रिगुण त्रिफलाचूर्णं लें और इसमें त्रिफलाचूर्णं से सोलहगुना जल डालकर पकायें। जब आठवां भाग जल अवशेष रह जाय तो उसे उतारकर छान लें। इस क्वाथ में लोहचूर्णं डालकर स्थालीपाक करना चाहिए। स्थालीपाकविधानम् भानुपाकविपक्वन्तु लोहं प्रक्षालयेदलम् । ततः स्थाल्यां तु विन्यस्य चुल्लिकायां निधापयेत् ॥ २६ ॥

४६८ रसतरङ्गिणी वराक्वाथेन सुपचेदतिवेलं खराग्निना । शोषयेत्सलिलं यत्नात् लौहकर्मविचक्षणः ॥ २७ ॥ स्थालीपाके त्रिगुणिता वरा, षोडशिकं जलम् । अष्टभागावशिष्टञ्च क्वाथमानं विधीयते ॥ २८ ॥ शतमूलीभृङ्गराजहस्तिकर्णशिफोत्थितैः । रसैः समैर्वापि भिषक् स्थालीपाकं समाचरेत् ॥ २९ ॥ यथादोषौषधेनापि स्वरसं वा कषायकम् । आदाय क्वाथमानज्ञः स्थालीपाकं समाचरेत ॥ ३० ॥ भा.टी.—त्रिफलाकषाय के अतिरिक्त लौहचूर्ण को शताबार, भृंगराज, हस्तिकर्ण, पलास की मूल के स्वरस लौहचूर्ण के बराबर भाग में लेकर इनके साथ भी स्यालोपाक किया जाता है। इसके अतिरिक्त जिस दोष, (वात, पित्त अथवा कफ ) को विशेष रूप से शान्त करने के अभिप्राय से लोहभस्म बनानी हो उस दोष की शामक औषधि के स्वरस अथवा कषाय के साथ भी लोह का स्थालीपाक किया जा सकता है ॥ २६–३० ॥ पुटपाकस्य स्वरूपम् रसादिभिर्भेषजानां खल्वे लौहं विमर्दितम् । पुटस्थं पच्यते यस्मात् पुटपाकस्ततः स्मृतः ॥ ३१ ॥ भा.टी.—स्थालीपाक करने के उपरान्त लोहचूर्ण को (लोहे के) खरल में डालकर उसमें विभिन्न औषधियों का स्वरस, कपाय मिलाकर खूब मर्दन करके सुखा लें और एक सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक देने को पुटपाक विधान कहते हैं ॥ ३१ ॥ पुटपाकविधानम् स्थालीपाकविपक्वन्तु लोहं प्रक्षालयेत्ततः । यथादोषौषधोत्थेन रसेन क्वथितेन वा ॥ ३२ ॥ लोहखल्वे सुसम्पेष्य चक्रिकाः कारयेत्ततः । आतपे खलु संशोष्य मृच्छरावे तु विन्यसेत् ॥ ३३ ॥ शरावेण विधायथ दृढसन्धि प्रलेपयेत् । वनानीतैः करीषैर्वा ह्युत्पलैर्हस्तपिण्डदैः ॥ ३४ ॥ पुटेद् गजपुटेनेह पुटपाकक्रियापटुः । स्वाङ्गशीतं ततो ज्ञात्वा सम्पुटन्तु समाहरेत् ॥ ३५ ॥

एकोनविंशस्तरङ्गः ४६६ पुनः पूर्ववदेवेह दत्त्वा क्वाथोदकं पुनः । सम्पेष्य सम्पुटे कृत्वा पुटेत्पुटविधानवित् ॥३६॥ सहस्रधाशथवा शतवारमथापि वा । षष्टिवारं पुटेद्वापि लौहं गुणविवृद्धये ॥३७॥ गुणोदयो भवत्येवं पुटनादुत्तरोत्तरम् । एवं पुटविपक्वन्तु लोहं सुमृतिमाप्नुयात् ॥३८॥ पुटपाकविधानन्तु स्थालीपाकप्रक्रियोत्तरं सहस्रधा षष्टिधा वा सम्पाद- नीयम् । प्रतिपुटं गुणतारतम्यसम्पत्त्यै । उक्तं हि—"पुटाद्दोषविनाशः स्यात् पुटादेव गुणोदयः । म्रियते च पुटाल्लोहं पुटांस्तस्मात्समाचरेत् ॥” अपि च “यथा यथा प्रदीयन्ते पुटाश्च बहवोऽयसि । तथा तथा प्रवर्धन्ते गुणाः शतसहस्रशः” इति । तदेतदभिप्रेत्याह—यथा यथा पुटान्‍यत्र दीयन्ते सुविधानत इत्यादि ॥ ३२-३८ ॥ भा.टी.—स्थालीपाक विधि से पकाये हुए लोहचूर्ण को पहिले अच्छी तरह जल से धो लेवें । अब इस चूर्ण को खरल में डालकर तत्तद्-दोषहर औषधियों के स्वरस अथवा कषाय के साथ खूब घोंटकर टिकिया बना लें । इन टिकियाओं को धूप में सुखा एक हाँडी में भर हाँडी के मुख में एक मिट्टी के पात्र (शराव) का ढक्कन रखकर उसकी अच्छी तरह सन्धि लेप कर दें और सुखा लें । अब गजपुट में जंगली अथवा हाथ के बनाये हुए सूखे उपले भर उसके बीच में उक्त लोहचूर्ण की हाँडी को रख दें और अग्नि जलाकर पुटपाक करें । जब गजपुट स्वांगशीतल हो जाय तो उसमें से लोहचूर्ण की हाँडी को निकाल फिर उस चूर्ण को खरल में डालें और उस औषधि का कषाय या स्वरस मिलाकर पहिले की भाँति ही मर्दन कर टिकिया बना लें । अब इन टिकियाओं को एक शराव- सम्पुट में बन्द करके पुनः गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार भिन्न-भिन्न औष- धियों के स्वरस अथवा कषाय के साथ पीसकर लोह को एक हजार या एक सौ बार अथवा साठ बार गजपुट में फूँक देवें । इस तरह अनेक पुट देने से लौह- भस्म में अधिकाधिक गुणोदय होने लगता है अर्थात् साठ पुटों की अपेक्षा सौ पुटों में और सौ पुटों की अपेक्षा हजार पुट देने में उत्तरोत्तर गुणवृद्धि होती जाती है । इस विधि से पुटपक्व लोह अच्छी तरह भस्मे हो जाती है ॥३२–३८॥ वक्तव्य—लौहचूर्ण को सौ बार अथवा हजार बार औषधि कषाय या स्वरस से पीस कर सम्पुट देने से लोहचूर्ण में दो क्रियायें होती हैं । १–औषधियों

५०० रसतरङ्गिणी का सूक्ष्मातिसूक्ष्म अंग लोह के साथ मिश्रित होकर उसमें रासायनिक परिवर्तन करता है। २-हर बार औषधि के कषाय आदि में लोहचूर्ण को खूब मर्दन किया जाता है जिससे लोह सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप में विभक्त होकर इस रूप में आ जाता है। उसे अन्तःप्रयोग करने में आमाशय आदि अंगों को आत्मसात् करने में देर नहीं लगती है और शीघ्र ही शरीर में लाभ होने लगता है । इसके अतिरिक्त लोहभस्म में औषधियों के क्षारीय भाग रह जाते हैं जो यकृत् तथा आँतों से स्राव अधिक उत्पन्न करते हैं और लोह के ग्राही प्रभाव को कम कर देते हैं । पुटपाके भेषजानां परिमाणम् पुटपाके वरादीन यथादोषौषधानि तु । लोहतुल्यानि गृह्णीयात् पुटपाककलापटुः ॥३६॥ यथा यथा पुटान्‍‍यत्र दीयन्ते सुविधानतः । भवेत्तथा तथावश्यमतिवेलं गुणोदयः ॥४०॥ न चैवं जनयत्येतल्लोहजं कोष्ठबद्धताम् । खरविट्कत्वमपि वा सुचिरं त्वस्य सेवनात् ॥४१॥ भा.टी.-पुटपाक के लिए काम में आनेवाली त्रिफला अथवा दोषानुसार विदार्यादिगण, किरातादिगण अथवा शट्यादिगण, दशमूल आदि औषधियाँ लोहचूर्ण के समभाग लेनी चाहिए । उक्त त्रिफला आदि औषधियों के साथ जितने अधिक पुट लोह को दिये जायेंगे उतना ही इसमें अधिक गुणोदय होता रहेगा । अधिक पुट देने से लोहभस्म में मलबन्ध करने का दोष भी बहुत ही कम रह जाता है । यदि उक्त विधि से अनेक पुट देकर लोहभस्म बनायी गयी हो तो उसे चिरकाल तक सेवन करने से भी सूखा पाखाना नहीं होने पाता है ॥ ३६-४१ ॥ लौहमारको गणः त्रिफला शतमूली च सिंहिका तालमूलिका । नीलोत्पलञ्च ह्रीवेरं दशमूलं पुनर्नवा ॥४२॥ वृद्धदारकमूलञ्च भृङ्गं विश्वं विडङ्गकम् । करञ्जशिग्रुनिर्गुण्डीमुस्तैरण्डमूलकम् ॥४३॥ हस्तिकर्णपलाशश्च पर्पटश्चन्दनं तथा । समाख्यातो गणोऽयन्तु लोहमारकसंज्ञकः ॥४४॥ भा.टी.—हरड़, बहेड़ा, आँवला, शतावर, अडूसा, मूसली, नीलकमल (निलोफर) सुगन्धबाला, दशमूल (बेल, अरलु, गाम्भारी, पाडल और अरणी

की छाल, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, छोटी कटैली, बड़ी कटैली और गोखरू) पुनर्नवा, विधारे की मूल, भांगरा, सोंठ, वायविडङ्ग, करञ्ज, सहजना, सम्भालू, तुलसी और एरण्डमूलत्वक्, हस्तिकर्णपलाश (बड़े चौड़े पत्तोंवाला ढाक), पित्तपापड़ा, चन्दन, इन औषधियों के समुदाय को लोहमारकगण कहा जाता है। अर्थात् इन औषधियों के योग से लोहभस्म अपेक्षाकृत शीघ्र और अधिक गुणकारी होती है ॥ ४२–४४ ॥ अथ वातहरो गणः एरण्डमूलं रास्नाथ दशमूलं प्रसारणी । मुद्गपर्णी माषपर्णी शतमूलो पुनर्नवा ॥ ४५ ॥ अश्वगन्धामृता मांसी बला नागबला तथा । गणो वातहरोऽयन्तु वातामयहरः परम् ॥ ४६ ॥ भा.टी.—एरण्ड की त्वचा, रास्ना, दशमूल, प्रसारणी, माषपर्णी, शतावर, पुनर्नवा, असगन्ध, गिलोय, जटामांसी, बला (खरेटी), नागबला (सहदेई), इन औषधियों को वातहरगण के नाम से कहा जाता है। क्योंकि इनके सेवन से वायुप्रकोपजन्य रोग शान्त हो जाते हैं ॥ ४५, ४६ ॥ पित्तनाशको गणः उशीरनीरसिंहिकाकिरातभूरिपुत्रिकाः । पटोलचन्दनामृतासरोजतालमूलिकाः ॥ ४७ ॥ सुतिक्तशाल्मलीशिखासितामहीरुहामयाः । गणस्तु पित्तनाशको ह्ययं तु पित्तरोगहृत् ॥ ४८ ॥ पित्तनाशकगणः नीरं बालकम्, भूरिपुत्रिका शतावरी, सुतिक्तः, पर्पटः, महीरुहामयो लाक्षा ॥ ४७, ४८ ॥ भा.टी. – खश, सुगन्धबाला, अडूसा, चिरायता, पटोलपत्र, चन्दन, गिलोय, नील कमल, मुसली, पित्तपापड़ा, सेमर की मूसली, मिश्री और लाख, ये औषधियाँ पित्त के रोगों को नष्ट करती हैं। अतः इन औषधियों के इस समुदाय को पित्तनाशकगण नाम से कहा गया है ॥ ४७, ४८ ॥ कफनाशको गणः रास्न मरिच चविका नागिनी विश्वभेषजम् । एरण्ड. पिप्पलीमूलं तुलसी शृङ्गवेरकम् ॥ ४६ ॥ भार्गी रञ्जाककुसुमं मूर्वा शिग्रु बिभीतकम् ।

५०२ रसतरङ्गिणी परं बलासगदजित् गणोऽय कफनाशकः ॥ ५० ॥ कफघ्नगणः—नागिनी ताम्बूलम् । बलासगदजित् कफरोगघ्न इत्यर्था । अत्र व्याधिभेदेन मारकभेषजभेदो लोहसर्वस्वादावनुसन्धेयो विस्तरभयान्न नोक्तः । त्रिफलापुटनन्तु सर्वत्र प्रशस्तमेवेति ॥ ४६, ५० ॥ भा.टी.—रास्ना, कालीमिर्च, चव्य, पान, सोंठ, एरण्डमूल, पिप्पलीमूल, तुलसी, अदरक, भारंगी, लाल आक के फूल, मूर्वा, संहजना की छाल, बहेड़ा, ये सब औषधियाँ कफप्रकोप को शान्त करती हैं, अतः इनको कफना- शकगण नाम से कहा गया है ॥ ४६-५० ॥ अथ लौहमारकगणे विशेषवक्तव्यम् तत्तद्रोगघ्नभैषज्यैस्तत्तद्रोगापनुत्तये । यथालाभं पुटेत्कामं प्राणाचार्यो विचक्षणः ॥ ५१ ॥ पुटितस्यायसोऽभावे तत्तद्रोगघ्नभेषजैः । त्रिफलापुटितं लोहं सर्वत्र विनियोजयेत् ॥५२॥ भा.टी.—लोहभस्म को जिस-जिस रोग को नष्ट करने के लिए, उपयुक्त भस्म बनाना हो, उस-उस रोग को नष्ट करनेवाली औषधियाँ जहाँ तक मिल सकती हों लेकर उनके साथ लोह भस्म को घोटकर पुटपाक करना चाहिए । यदि कहीं तत्तद्-रोगनाशक औषधियाँ न मिल सकें तो केवल त्रिफलाकषाय में सौ अथवा हजार पुट दी हुई लोहभस्म ही सर्वत्र काम में ला सकते हैं । ५१, ५२॥ अथ लौहस्य द्वितीयो मारणप्रकारः निर्मलं त्वायसं तत्समं हिंगुलं कन्यकावारिणा निर्भरं पेषयेत् । घर्मसंशोधितञ्चाथ चूर्णीकृतं वारणाख्ये पुते सम्पुटस्थं पुटेत् ॥५३॥ स्वांगशीते पुनः खाब्धिसंख्यांशकं हिंगुलं मेलयेत् त्रैफलेनाम्भसा । भृङ्गवाराशथवा पेषयेदायसं पूर्ववद्वै पुटेत् वृत्तसंचक्रिकम् ॥ ५४॥ इत्थमेवायसं खान्धिसंख्यैः पुटैर्निश्चितं जायके रक्तपद्मप्रभम् । तीक्ष्णं कान्तकञ्चापि लोहद्वयं यात्यवश्यं मृतिं त्वाशु चात्युत्तमाम् ५५॥ अपरः प्रकारः हिङ्गुलकन्यकावारिभ्यां निर्वाणीयः तत्र प्रथमं लोहसमानं दरदं परतश्च विंशांशकमिति कृत्वा चत्वारिंशत्पुटानि सन्ति देयानि । क्वचित्तु “प्रक्षिपेद् द्वादशांशेन दरदं तीक्ष्णचूर्णकम् । मर्दयेत्कन्यकाद्रावैर्यामयुग्मं ततः पुटेत् ॥ एवं सप्तपुटैर्मृत्युं लोहचूर्णमवाप्नुयात्” इत्युक्तम् । परमयं प्रकारो नाति समीचीनः ॥ ५३-५५