रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशस्तरङ्गः ४८५ गन्धकाम्लीययशदं शुष्कं प्रायो न युज्यते । योजयेद्विधिना वैद्यो द्रवीकृत्य विधानतः ॥१५६॥ भा.टी.—गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण (Zinc Sulphate) उत्तम पूय- नाशक और व्रणस्रावशोषक द्रव्य है । इसके प्रयोग से नेत्राभिष्यन्द रोग दूर हो जाता है । व्रणमेह (सुजाक) तथा श्वेतप्रदर में उसको उत्तरबस्ति विधान से देने पर शीघ्र लाभ होता है । इसमें संकोचक शक्ति विशेष रूप से होती है । अर्थात् जिंकसल्फेट के द्रव को उक्त रोगों में प्रयोग किया जाता है । इसका शुष्क चूर्ण उत्तम क्षारकर्म ( दाह ) करनेवाला होता है। अतः इसे क्षारकर्म प्रयोगार्थ काम में लिया जाता है । परन्तु गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण शुष्क चूर्णा- वस्था में बहुत कम ही प्रयोग में लिया जाता है । अतः इसको द्रवरूप में उक्तरोगों में प्रयोग करना चाहिये ॥ १५३-१५६ ॥ वक्तव्य—यद्यपि यहाँ पर गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण को दाहक माना है, परन्तु इसकी अपेक्षा यशदहरिद् (Zinc Chloride) अधिक दाहक होता है, उसे दाहकयशद भी कहते हैं । यह तीव्रदाहक और प्रबल जीवाणुहर होता है । अथ गन्धकाम्लीययशदद्रवस्य प्रथमो निर्माणप्रकारः गन्धकाम्लीययशदं रक्तिकैकमितं शुभम् । सार्द्धद्वितोलकमिते सलिले तु परिश्रुते ॥१५७॥ संद्राव्य खलु यत्नेन काचकुप्यां निधापयेत् । गन्धकाम्लीययशदद्रवोऽयं नामतो मतः ॥१५८॥ भा.टी.—एक रत्ती शुद्ध गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण को ढाई तोले शुद्ध परिश्रुत जल (Distilled water) में घोलकर छान लें । अब इसे एक काँच की शीशी में रख लें । इसी को गन्धकाम्लीय यशद द्रव कहा जाता है ॥ १५७, १५८ ॥ अस्य गुणाः गन्धकाम्लीययशदद्रवोऽयं व्रणमेहहृत् । नेत्राभिष्यन्दशमनो रोपणो भूतनाशनः ॥१५६॥ भा.टी.—उक्त प्रकार से बनाया हुआ गन्धकाम्लीय यशदद्रव व्रणमेह (सुजाक) में उत्तरबस्ति के रूप में देने से शीघ्र लाभ करता है । यह नेत्राभि- ष्यन्दरोगनाशक, व्रणरोपक और कृमिनाशक है ॥ १५६ ॥