रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८४ रसततरङ्गिणी भा.टी.—यह यशद मलहर विविध प्रकार के व्रणों को रोपण करता और विचर्चिका में लाभदायक है तथा अग्निदग्ध व्रणों के लिये विशेष रूप से लाभदायक है ॥ १४८ ॥ अथ गन्धकाम्लीययशदस्य निर्माणप्रकारः विमलयशदचूर्णं काचपात्रे तु पूर्वं विशदविपुलबुद्धिः स्थापयेद्वैद्यवर्यः । तदनु खलु सनीरं गन्धकाम्लं क्षिपेद्वै द्रवति यशदचूर्णं यावता द्रावकेण ॥ १४६ ॥ ततः सारकपत्रेण सारयेत्तु विधानतः । काचपत्रे निधायाथ पचेन्मन्दाग्निना भिषक् ॥ १५० ॥ द्रवांशं शोषयेद्यत्नाद्रसकर्मविचक्षणः । किञ्चिद्द्रवाविशेषे च पात्रं भूमौ निधापयेत् ॥ १५१ ॥ समुज्ज्वलं सुधवलं काचपात्रतलस्थितम् । गन्धकाम्लीययशदचूर्णं शुद्धं समाहरेत् ॥ १५२ ॥ गन्धकाम्लीययशदः—अस्य च द्रुतस्यैव प्रायः प्रयोग इत्युक्तं रसवेदिभिः नव्यरासायनिकैः ॥ १४६–१५२ ॥ भा.टी —एक काँच के पात्र में पहिले शुद्ध यशदचूर्ण डालें, अब उसमें सजल (हल्का) गन्धकाम्ल थोड़ा-थोड़ा करके डालते जायँ, जब सम्पूर्ण यशद- चूर्ण इस गन्धकाम्ल से गल जाय तो इस द्रव को सारकपत्र (Filler Paper) से छानकर छने हुए द्रव को फिर एक काँचपत्र में डालें और मन्द-मन्द अग्नि से पकायें । जब उसमें से द्रवांश सूख जाय और यह किञ्चित् गीला-सा रहे, तो इस पात्र को नीचे उतार ठंडा कर लें । ठंडा होने पर पात्रतल में श्वेत वर्ण का शुद्ध गन्धकाम्ल यशदचूर्ण प्राप्त होता है । इसको यशदगन्धित् अथवा Zinc Sulphate) कहते हैं ॥ १४६–१५२ ॥ गन्धकाम्लीययशदस्य गुणाः गन्धकाम्लीययशदचूर्णं पूयघ्नमुत्तमम् । व्रणसंस्त्रावशमनं नेत्राभिष्यन्दनाशनम् ॥ १५३ ॥ व्रणमेहहरं चैव श्वेतप्रदरकप्रणुत् । सङ्कोचकृद्विशेषेण कीर्तितं रसवेदिभिः ॥ १५४ ॥ शुष्कं गन्धाम्लयशदं क्षारकर्मकरं परम् । क्षारकर्मप्रयोगाथेमतस्तद् विनियुज्यते ॥ १५५ ॥