रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८६ रसतरङ्गिणी अस्य आमयिकः प्रयोगः बिन्दुत्क्षेपकयन्त्रेण द्रवोऽयं लोचनार्पितः । विनिहन्त्यचिरादेव नेत्राभिष्यन्दजां रुजम् ॥ १६० ॥ मेढ्रमूलं दृढं बध्वा स्फीतकेन विधानतः । यत्नादुत्तरबस्त्युक्तविधानेन ह्यनारतम् ॥ १६१ ॥ गन्धकाम्लीययशदद्रवोऽयं विनियोजितः । सप्ताहद्वितयेनैव व्रणमेहं व्यपोहति ॥ १६२ ॥ भा.टी.—उक्त द्रव को बिन्दुत्क्षेपक यन्त्र (Dropper) से नेत्रों में डालने से शीघ्र ही नेत्राभिष्यन्द रोग में लाभ होता है। सुजाक में जब मूत्रेन्द्रिय से पूय आता हो तो मूत्रेन्द्रिय के मूल प्रदेश को स्फीतक (पट्टी) से बाँध कर सावधानी से उत्तरबस्ति द्वारा यदि इस द्रव को मूत्रेन्द्रिय में निरन्तर दो सप्ताह तक डाला जाय अर्थात् दिन में दो-तीन बार इस द्रव की उत्तरबस्ति दी जाय तो सुजाक का व्रण अच्छा हो जाता है ॥ १६०-१६२ ॥ गन्धकाम्लीययशदद्रवस्य द्वितीयो निर्माणप्रकारः गन्धकाम्लोययशदं षट्त्रिंशद्रक्तिकोन्मितम् । परिस्रुते तु सलिले षष्टितोलकसंमिते ॥ १६३ ॥ संद्राव्य खलु यत्नेन काचकुप्यां निधापयेत् । गन्धकाम्लीययशदद्रवोऽयं भाषितो बुधैः ॥ १६४ ॥ भा.टी.—छत्तीस रत्ती शुद्ध गन्धकाम्लीय यशदचूर्ण को साठ तोला शुद्ध परिस्रुत जल में घोलकर एक स्वच्छ काँच की शीशी में रख लें। इसको भी गन्धकाम्लीय यशदद्रव (Zinc Sulphate lotion) कहते हैं ॥ १६३, १६४॥ अस्य गुणाः गन्धकाम्लीययशदद्रवोऽयं व्रणरोपणः । संकोचकृद्विशेषेण श्वेतप्रदरमुल्बणम् ॥ १६५ ॥ भा. टी.—यह द्वितीय प्रकार का गन्धकाम्लीय यशदद्रव, व्रणरोपक (भरनेवाला) संकोचक और विशेष रूप से श्वेतप्रदरनाशक होता है ॥ १६५ ॥ अस्य प्रयोगविधिः यत्नादुत्तरबस्त्युक्तरीत्या तु विनियोजितः । द्रवोऽयं नाशयत्याशु श्वेतप्रदरमुल्बणम् ॥ १६६ ॥