भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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४६४ रसतरङ्गिणी सूक्ष्मकटकवेधीने इति पत्रस्थूलतापरिमाणम् । प्राञ्चस्तु—"चतुरङ्गुलविस्ती- र्णमायामैश्चतुरङ्गुलम् । तिलोत्सेधतनुं चैव लोहपत्रं प्रचक्षते" ॥ १३ ॥ भा.टी.—यदि कारखाने से स्वयं रिता हुआ लोहचूर्ण न मिल सके तो लोहार से तीक्ष्णलोह के सूक्ष्म कटकवेधी पत्र बनवाकर उनको शोधन के काम लाना चाहिये ॥ १३ ॥ शोधनाय लोहपरिमाणम् एकसेटकतस्तीक्ष्णं समारभ्य भिषग्वरः । सेटकत्रयपर्यन्तं शोधयेन्मारयेत्तथा ॥ १४ ॥ मारणार्थे परिमाणन्तु एकसेटकतः इत्यादिनोक्तम् । प्राञ्चस्तु—"नायः पचेत् पञ्चपलादर्वागूर्ध्वं त्रयोदशात्" इत्याहुः । एतन्मानगणना च अनायास- सम्पादनार्थम्, अत्यल्पमानमारणसंमतिस्तु बहुआयासाल्पफलत्वादुक्तेति ॥ १४ ॥ भा.टी.—लौह को शुद्ध करना हो तो कम से कम एक सेर और अधिक से अधिक तीन सेर लोहचूर्ण अथवा पत्र लेकर शुद्ध करना चाहिये ॥ १४ ॥ वक्तव्य—प्राचीनरसग्रन्थों में पाँच पल से कम और तेरहपल से अधिक लोहशोधन नहीं करने को लिखा है। पाँच पल लोह के शोधन-मारण में अत्यन्त सुभीता होता है, अतः कम से कम यह परिमाण लिखा है। अथ लौहशोधनस्य प्रथमः प्रकारः तीक्ष्णलोहोन्मितं सूक्ष्मसूक्ष्मं रजो दर्विकासंस्थितं वह्निसन्तापितम् । सप्तधा स्नापितं त्रैफलेनाम्भसा लौहमेवं द्रुतं याति शुद्धिं पराम् ॥ १५ ॥ लौहशोधनस्य प्रथमः प्रकारः—त्रिफलाजले निर्वापणात्, एतेन गिरिदोष- शान्तिः इति प्राञ्चः ॥ १५ ॥ भा.टी.—तीक्ष्णलोह का अत्यन्त बारीक रेता हुआ चूर्ण लेकर उसको एक लोहे की करछी में डालकर तीव्र अग्नि में तपायें । जब अच्छी तरह तप्त हो जाय तो इसको एक पात्र में भरे हुए त्रिफलाक्वाथ में बुझा दें । इस विधि को सात बार दुहराने से लोहचूर्ण अच्छी तरह शुद्ध हो जाता है ॥ १५ ॥ वक्तव्य—प्राचीन ग्रन्थों में लिखा है कि त्रिफलाक्वाथ में लोहे को तपाकर बुझाने से गिरिदोष शान्त हो जाता है। अत्र जलक्वाथ्यनिक्षेप्यानां परिमाणम् त्रैफलं वल्कलं वै कलाभागिकं नागनेत्रक्षपानाथभागं जलम् ।