रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविंशस्तरङ्गः ४८६ एतेषां परिचयः साम्प्रतमुपयोगद्वारा निर्णीतरूप इत्याह कटाहेत्यादि । कान्त- लोहञ्च यद्यपि भक्षणद्वारा गुणैरुत्तमं तथापि यन्त्राद्यनुपयुक्तत्वादनुद्धृतप्रायं खनेः इति दुर्लभं प्रायः। कान्तपाषाणध्मानविनिर्गतन्तु क्वचित् प्राप्यत एवाधुनापि इति । आहुश्च रसमाधवाः—"मुण्डन्तु वर्तुलं भूमौ पर्वतेषु च जायते। गजवल्ल्यादितीक्ष्णं स्यात् कान्तं चुम्बकसंभवम् ॥" इति। "मुण्डात् कटाहपात्रादि जायते तीक्ष्णलोहः। खड्गादिशस्त्रभेदाः स्युः कान्तलोहन्तु दुर्लभम् ॥ मुण्डात् शतगुणं तीक्ष्णं तीक्ष्णात् कान्तं शताधिकम् । तस्मान्मुण्डं परित्यज्य तीक्ष्णं वा कान्तमुत्तमम् ॥" इति च । तदिदमुक्तं समलं मुण्डलोहमित्यादिना ॥ ५, ६ ॥ भा.टी.—आजकल बड़े-बड़े कटाह, कड़ाही, खरल, फावड़े, कुदाली आदि बनाने के काम में मुण्डलोह लिया जाता है । अर्थात् ये चीजें जिससे बनायी जाती हैं उसे मुण्डलोह कहा जाता है । छुरी, चाकू, तलवार आदि अस्त्र के बनाने में जो लोहा काम आता है उसे तीक्ष्णलोह ( फौलाद ) कहते हैं । किन्तु कान्तलौह अत्यन्त दुर्लभ माना जाता है ॥ ५, ६ ॥ वक्तव्य—कान्तलोह यद्यपि अन्तःप्रयोग में सब लोहों की अपेक्षा उत्तम गुण करता है। परन्तु आजकल उसकी खोज अस्त्र-शस्त्रादिकों के बनाने में विशेष उपयोगी न होने से नहीं की जाती है । परन्तु कान्त पाषाण ( चुम्बक पत्थर ) को तपाने पर उसमें से इसको कहीं-कहीं प्राप्त भी किया जाता है । मारणोचितं लौहम् समलं मुण्डलोहं तु मारणाय न योजयेत् । तीक्ष्णलोहं कान्तलोहं यथालाभं प्रयोजयेत् ॥ ७ ॥ भा.टी.—भस्म करने के लिये मुण्डलोह को नहीं लेना चाहिये, क्योंकि यह अनेक प्रकार के मलों से मिश्रित होता है । इसके विपरीत तीक्ष्णलोह तथा कान्तलोह को यथासम्भव भस्म करने के लिये ग्रहण करना चाहिये ॥ ७ ॥ वक्तव्य—लोहा कार्वन द्विअम्लजित् के साथ मिला हुआ अम्लजित् के रूप में खानों से निकलता है । इन खानों में से प्राप्त होनेवाले पत्थरों को खूब भूना जाता है । जिससे वह पूरी तरह लोहओषित् बन जाता है । फिर इसमें से लोह को पृथक् करने के लिये भुने हुए कोयले ( जिन्हें कोक कहते हैं ) तथा चूने के पत्थरों के साथ भट्ठी में तपाते हैं। इस क्रिया से लोहओषित् की ओषजन बन जाती है, शेष लोहा पृथक् हो जाता है । परन्तु साधारण अग्नि से यह क्रिया सिद्ध नहीं होती है । अतः इसकी कच्ची धातु को पिघलाने के लिये ६० से १०० फुट ऊँची