भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५१० रसतरङ्गिणी आदौ नतोऽपरम्। ततः पादौ ततोऽङ्गानि चालयेत्ताण्डवामयी ॥ मुष्टिना किमपि द्रव्यं सम्यग्धारयितुं क्षमः। समर्पयितुमास्ये वाप्यदनीयं न ताण्डवी ॥” इति लक्षितं। आशु अवश्यमिति नियतानुभवज्ञापनं। प्रायोभाविनीं बहुधा जायमानाम्। पांडुरोगोपद्रवा- मनिद्रामिति संबन्धः। अवघूर्णतां विषादम्। वातसंस्थानं नाडिकाजातं। बहूत्थान- समुत्थितं बहुहेतुजनितम्। विशेषतस्तु पित्तनाशकं भवति लौहमिति ॥८७-९६॥ भा.टी.—लोह पुरातन अतीसार, नवीन कण्ठमाला रोग, स्त्रियों के मासिक अवरोध, वृक्कशोथ, हृदयरोग, विषमज्वर, फिरंगरोगजन्य पाण्डुरोग, कामला, हली मकरोग, योषपस्मार, श्वेतप्रदर, मधुमेह, मांसतान (खुनाक डिप्थेरिया), भयंकर त्रिविध प्रकार के क्षय, ताण्डवरोग, सूतिकाज्वर, गले में होनेवाले क्षतव्रण, आम- वात, यकृत् के रोग, भगन्दर, पीनस (जुकाम) और अम्लपित्त रोग को निश्चित ही नष्ट करती है। कान, नासिका तथा गर्भाशय आदि से प्रायः निकलनेवाले सामान्य रक्तस्राव को रोकती है। यौवन आरम्भ के समय होनेवाले स्त्रीपाण्डुरोग (हलीमक) आमाशय तथा पक्वाशयगत क्षतव्रणों के रक्तस्राव को रोकती है। इसके सेवन से नाड़ीशूल तथा पाण्डु (रक्ताल्पता) के कारण निद्रानाश और आमवात के कारण होनेवाली अस्थिविकृति दूर हो जाती है। इसके सेवन से वृद्धावस्था में रजःक्षय के कारण होनेवाली शरीरिक पीड़ा व मानसिक शिथिलता दूर हो जाती है। लोहभस्म के सेवन से विभिन्न कारणों से उत्पन्न वातसंस्थान की दुर्बलता शीघ्र ही दूर हो जाती है। किसी रोग की शान्ति के बाद होनेवाली दुर्बलता को दूर करने के लिए लोहभस्म विशेष लाभदायक होती है ॥८७-९६॥ वक्तव्य—मांसतान के लक्षण इस प्रकार लिखे हैं “प्रतानवान् यः श्वयथुः सुकष्टो गलोपरोधं कुरुते क्रमेण। स मांसतानः कथितोऽवलम्बी प्राण- प्रणुत् सर्वकृतो विकारः ॥”। ताण्डवरोग में रोगी अपने हाथ-पैरों को इस तरह हिलाता हुआ नजर आता है जैसे कि एक विशेष प्रकार से नाच रहा हो। यदि उससे किसी चीज को हाथ में लेकर मुँह में डालने को कहें तो वह मुँह में चीज को नहीं रख सकता है—“वामबाहुं समारभ्य प्राय आदौ ततोऽपरम्। ततः पादौ ततोऽङ्गानि चालयेत्ताण्डवामयी। मुष्टिना किमपि द्रव्यं सम्यग् धार- यितुं क्षमः। समर्पयितुमास्ये वाप्यदनीयं न ताण्डवी ॥”। लोह भस्म का प्रभाव—लोह या लोह के सभी समास (योग) आँतो में पहुँच कर लोहगन्धिद् (Iron sulphide) के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। अत-